छैला संदू (झारखंड)

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झारखंड की राजधानी रांची के आसपास कई झरने हैं. लेकिन इन सबसे अलग है दशमफॉल. कई लोग कहते हैं कि यहां झरने से गिरने वाले पानी के प्रवाह से संगीत की ध्वनि निकलती है. कुछ को बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ती है तो कइयों को बंसी के साथ नगाड़े-ढोल की थाप का भी एहसास होता है. इस धुन और ध्वनि के पीछे एक प्रेम कहानी को जोड़ा जाता है.

लोकमानस में रची-बसी कहानी यह है कि एक आदिवासी युवक था छैला संदू. देखने में बेहद आकर्षक. गीत-संगीत में महारत रखनेवाला. उसकी बांसुरी की धुन सुनकर एक राजकुमारी (बूंदी) उस पर फिदा हो गई. राजा को प्रेम मंजूर नहीं था. राजकुमारी जिद कर बैठी कि वह उसी से विवाह करेगी. राजा ने एक शर्त रखी कि संगीत की एक प्रतियोगिता होगी. उसमें छैला का राजदरबार के संगीत विशेषज्ञ से मुकाबला होगा. जीत छैला की ही होती है. मजबूरन राजा को हामी भरनी पड़ती है. राजकुमारी के जंगल में रहने और गरीबी में दुख सहन करने की बात सोच छैला इस विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देता है. छैला की शादी दूसरी जगह करवा दी जाती है.

दूसरी ओर छैला की भाभी भी उससे बेपनाह मोहब्बत करती है. अपने पति की मृत्यु के बाद वह उससे विवाह करना चाहती है. लेकिन छैला नदी पार के गांव में नारो नाम की लड़की से प्रेम करने लगता है. वह रोज शाम को ढोल, नगाड़ा और बांसुरी पीठ पर बांध कर गोरार नामक एक जंगली लता से लटककर नदी पार करता है और रात भर नारो के साथ नाचता-गाता है. छैला की भाभी को यह नागवार गुजरता है. एक दिन जब छैला नदी पार कर रहा होता है तो उसकी भाभी के इशारे पर कुछ लोग वह लता काट देते हैं.  बरसात का मौसम. नदी अपने पूरे उफान पर. अपने वाद्ययंत्रों के साथ नदी में गिरकर छैला मर जाता है. इससे अनजान नारो उसका बिना खाए-पीए उसका इंतजार करती है और सातवें दिन उसकी भी मौत हो जाती है. कहा जाता है कि छैला आज भी बंसी और नगाड़ा बजाकर नारो को बुलाता है.

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