चमक में छिपा अंधेरा

ताजमहल के बारे में कहा जाता है कि इसे बनवाने वाले मुख्य कारीगर के हाथ कटवा दिए गए थे ताकि वह फिर कोई ऐसी सुंदर इमारत न बना सके. ताजमहल से लेकर चीन की दीवार तक हुए बेहतरीन निर्माणों की जब भी बात होती है तो इन्हें बनाने वाले शिल्पियों के साथ हुए अन्याय के बहुत-से किस्से मिलते हैं. यह अन्याय 21वीं सदी तक भी जारी है. राजधानी दिल्ली की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली दिल्ली मेट्रो के कामगारों की एक बड़ी संख्या भी अन्याय का शिकार है. मेट्रो की अहम सेवाओं का जिम्मा अपने कंधों पर ढोने वाले ये लोग अपने तमाम वाजिब हकों से वंचित हैं.

करीब दशक पहले तक दिल्ली की सूरत ऐसी नहीं थी जैसी आज दिखती है. रोजगार से लेकर दूसरे कामों के लिए देश भर से लोगों का हुजूम यहां जिस चक्रवृद्धि रफ्तार से उमड़ा उसके चलते दमघोंटू परिस्थितियां बनने लगीं. साल 2000 तक आते-आते दिल्ली में वाहनों की संख्या इस कदर बढ़ गई कि इन्हें समेटने के लिए दिल्ली की खासी चौड़ी सड़कें कम पड़ने लगीं. तब नए फ्लाइओवरों और अंडरपासों पर काम शुरू हुआ और ठीक इसी वक्त मेट्रो रेल सेवा भी इस शहर के लिए एक वरदान बन कर आई. इसने जैसे वेंटिलेटर पर पड़ी दिल्ली को उसकी सांसें लौटा दीं. मेट्रो ने अपनी बेहतरीन सेवा की बदौलत दिल्ली की लुंजपुंज पड़ चुकी यातायात व्यवस्था का नक्शा ही बदल दिया. इस सेवा को संचालित करने वाले डीएमआरसी का दावा है कि उसने प्रति दिन 90 हजार से अधिक गाड़ियों को दिल्ली की सड़कों से हटाकर उन्हें दबावमुक्त कर दिया है. उसका यह भी दावा है कि औसतन 20 लाख लोग रोजाना मेट्रो से ही आना-जाना करते हैं.

इन दो दावों में दर्ज आंकड़ों को लेकर भले ही कुछ ऊंच-नीच हो सकती है, फिर भी इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि मेट्रो ने दिल्ली के परिवहन की सूरत बदली है. स्टेशन के अंदर दाखिल होते ही वातानुकूलित हवाएं यात्रियों का स्वागत करती हैं और स्वचालित सीढियां उन्हें सामान सहित गाड़ी के डिब्बे तक पहुंचा जाती हैं. यात्रियों को बेहतरीन सेवा देने के चलते आज मेट्रो के मायने ये हैं कि इसे दिल्ली की लाइफलाइन भी कहा जाने लगा है. कई पुरस्कार और प्रशंसापत्र भी मेट्रो के चेहरे को लगातार उजला बनाते जा रहे हैं.

लेकिन दिल्ली मेट्रो के इस चमकीले चेहरे के पीछे एक ऐसी हकीकत भी है जिसका अंधेरा इसकी भूमिगत सुरंगों से भी घना है. यह हकीकत है मेट्रो में काम करने वाले उन ठेका कामगारों की जिनके जिम्मे इस सेवा को सफलतापूर्वक चलाने का अहम दारोमदार है. आठ घंटे के कागजी नियम से कहीं ज्यादा देर तक काम करने और करते रहने को मजबूर इन लोगों को इसके लिए न तो उचित मेहनताना मिलता है और न ही दूसरे वे अधिकार जिनकी बुनियाद पर श्रम कानूनों का ताना- बाना टिका है. तहलका ने दिल्ली मेट्रो में कांट्रैक्ट के जरिए नौकरी करने वाले तमाम कामगारों से मुलाकात की और पाया कि भले ही इनकी मेहनत से मेट्रो के डिब्बे दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर तक बेरोकटोक दनदना रहे हों लेकिन इनकी अपनी जीवनगाड़ी हिचकोले खा-खा कर घिसट भर पा रही है.

2011-12 का वित्तीय लेखा-जोखा जो बताता है कि डीएमआरसी की माली हालत काफी मजबूत है

कुल राजस्व– 2,247.77 करोड़ रु

विज्ञापनों पर खर्च- 391.92 लाख रु

पर्यावरणीय बचाव पर खर्च- 638.19 लाख रु

जनजागरण पर खर्च- 401.86 लाख रु

सुरक्षा पर खर्च- 422.14 लाख रु

छपाई तथा स्टेशनरी- 726.22 लाख रु

कानूनी खर्च- 81.69 लाख रु

अन्य खर्च- 646.34 लाख रु

सबसे पहले मेट्रो के तान-बाने को मोटे तौर पर समझ लेते हैं. मेट्रो के तहत अलग-अलग कामों के लिए कई विभाग होते हैं. इन कामों को निपटाने के लिए नीति नियोजन के संदर्भ में डीएमआरसी ने भारी-भरकम मेहनताने पर अधिकारियों और कर्मचारियों को रखा है जबकि मेट्रो ट्रैक बनवाने, यात्रियों को टिकट देने, उन्हें गाड़ियों में चढ़वाने और स्टेशन परिसर की सफाई करने जैसे तमाम कामों के लिए उसने अलग-अलग प्राइवेट कंपनियों के साथ कांट्रैक्ट किया है. कांट्रैक्ट पाने वाली कंपनियां इन कामों के लिए लोगों को ठेके पर रखती हैं. यहीं से शोषण की कहानी शुरू होती है .

डीएमआरसी से कांट्रैक्ट मिलते ही प्राइवेट कंपनियां सीधी भर्ती के अलावा ठेकेदारों की मार्फत भी कामगारों की नियुक्ति करती हंै. ये ठेकेदार उपठेकेदारों से संपर्क करते हैं जिन्हें जॉबर (नौकरी दिलाने वाला) भी कहा जाता है. इनकी भूमिका मुख्यत: कंपनी और कामगारों के बीच बिचौलिये की होती है जिसके लिए ये कंपनी और कामगार दोनों तरफ से पैसे पाते हैं. इस तरह कामगार को नौकरी पाने से पहले ही तीन चार लोगों से होकर गुजरना पड़ता है. इस तरह की स्थितियां निर्माण और सफाई का काम करने वाले कामगारों के मामलों में ज्यादा सामने आती हैं. हालांकि अब टॉम आपरेटर (टिकट काउंटर पर बैठने वाला कर्मचारी) के पद पर नियुक्ति देने वाली कंपनियां भी खुले तौर पर 25,000 रुपये बतौर सिक्योरिटी मांगने लगी हैं. झंडेवालान मेट्रो स्टेशन पर टिकट देने का काम करने वाले मयंक बताते हैं, ‘25,000 रु जमा कराने और फिर बिचौलियों की जेब गरम करने के बाद भी नौकरी जाने का खतरा बना रहता है. अगर नौकरी चली जाए तो सिक्योरिटी के रूप में जमा 25,000 रुपये वापस पाने को लेकर बहुत बड़ी महाभारत लड़नी पड़ती है.’

दिल्ली के नांगलोई इलाके में रहने वाली अनीता इस महाभारत की भुक्तभोगी रह चुकी हैं और लंबी जद्दोजहद के बाद हाल ही में इसके चक्रव्यूह से बाहर निकल पाई हैं. इसी साल मई में टॉम ऑपरेटर की नौकरी पाने वाली अनीता को लगभग तीन महीने बाद ही बिना अग्रिम नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया गया. जब उन्होंने सिक्योरिटी के रूप में जमा अपने 25,000 रु वापस मांगे तो कंपनी की तरफ से उन्हें 10 दिन बाद पैसा लौटाने की बात कही गई. लेकिन दो महीने से भी ज्यादा लम्बे समय तक माथापच्ची करने के बाद उनका यह काम पिछले महीने किसी तरह पूरा हो पाया. अनीता की अगस्त माह की तनख्वाह भी अभी तक नहीं मिली है जिसके लिए उन्हें इंतजार करने को कहा गया है.

वे कहती हैं कि, ‘इस तरह के मामलों को समझने के लिए मैनें कुछ दूसरी प्राइवेट कंपनियों के अधिकारियों से भी बात की तो उनका कहना था कि इतना वक्त लगना मामूली बात है.’ उधर, मेट्रो मजदूरों के हितों को लेकर काम करने वाले स्वयंसेवी सुनील कुमार इसे कंपनियों का मुनाफा कमाने का उपक्रम बताते हैं. वे कहते हैं कि सिक्योरिटी मनी रखने के सवाल पर कंपनियों का तर्क होता है कि यात्रियों को टिकट देने वाले टॉम ऑपरेटरों का कामकाज सीधे-सीधे रुपये-पैसों से जुड़ा होता है, जिसमें हेराफेरी होने पर सिक्योरिटी मनी से रिकवरी की जा सकती है. लेकिन हकीकत यह है कि इन पैसों से ये कंपनियां भारी-भरकम ब्याज कमाती हैं. सुनील कुमार सवाल करते हैं, ‘रेलवे, परिवहन और तमाम दूसरे सरकारी विभागों में भी कई कर्मचारी इसी प्रकृति के काम से जुड़े होते हैं तो फिर उन सबसे सिक्योरिटी मनी क्यों नहीं ली जाती?’ यह तर्क ठीक भी लगता है क्योंकि सवाल अगर वाकई में पैसों की हेराफेरी होने की सूरत में रिकवरी का है तो कामगारों के वेतन से भी यह राशि काटी जा सकती है.

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यहां भी है अंधियारा

डीएमआरसी के लिए ठेके पर काम करने वाले कामगारों की एक बहुत बड़ी जमात निर्माणस्थल यानी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले मजदूरों की भी है. पहचान के नाम पर हेलमेट और जैकेट पहने ये मजदूर हर रोज आठ से दस घंटे तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद मामूली पगार पाते हैं. अंधेरे गड्ढों को और गहरा करने या फिर ऊंचे-ऊंचे खंभों पर लटके रहने वाले इन कामगारों के लिए आजादी के यही मायने हैं कि अगर जिंदा रहे तो पगार मिल जाएगी. मरने के बाद इनके परिजनों का क्या होगा यह सब सोचने तक का इनके पास न ही वक्त है और न ही परिस्थितियां इसकी इजाजत इन्हें देती हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर मजदूर वे हैं जिनके पास इस काम के अलावा और कुछ करने का विकल्प ही नहीं है. तीन महीने पहले मेट्रो की रोहिणी साइट पर काम पाने वाले बलिया जिले के संतोष कुमार पिछले साल फेज टू के निर्माण के दौरान भी डेढ़ साल तक अलग-अलग निर्माणस्थलों पर मजदूरी कर चुके हैं. वे बताते हैं कि रोजगार का कोई और साधन न होने की बेबसी उन्हें और उनके जैसे बहुत लोगों को इस शहर में खींच लाई है.

मामूली वेतन पाने वाले इन मजदूरों के लिए काम करने की परिस्थितियां बेहद असुरक्षित हैं जिनमें हादसे होते रहते हैं. 2010 तक मेट्रो की कंस्ट्रक्शन साइटों पर जान गंवाने वाले मजदूरों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर चुकी थी. यह बात डीएमआरसी ने हाईकोर्ट में दायर किये गए एक हलफनामे में मानी थी. तब से लेकर अब तक कई हादसे और भी हो चुके हैं. इन्होंने मजदूरों की जान तो ली ही है, घायल मजदूरों को हमेशा के लिए अपंग भी बना दिया है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में भी डीएमआरसी की कई लापरवाहियां उजागर हो चुकी हैं. कैग ने अपनी रिपोर्ट में मेट्रो रेल परियोजना के निर्माणाधीन स्थलों पर गुणवत्ता नियंत्रण में खामियां भी पाई थीं. निर्माण से जुड़े  मजदूरों के लिए काम की नारकीय परिस्थितियों का मुद्दा कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भी सामने आया था. उस वक्त भीषण गर्मी के बीच दिन-रात काम करने वाले बहुत सारे मजदूर पूरी तरह से जॉबरों के रहमो करम पर रहने को मजबूर थे. आलम यह था कि इनके रहने के लिए टीन की चादरों वाले शेड बना दिए गये थे जिनमें रहना लगभग असंभव था.

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प्राइवेट कंपनियों द्वारा ठेके पर रखे जाने वाले कामगार मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं. पहले, जो यात्रियों को टिकट और मेट्रोपास जारी करते हैं. दूसरे वे जो यात्रियों को पंक्तिबद्ध तरीके से गाड़ी से उतरवाते और उसमें चढ़वाते हैं और तीसरे वे जो स्टेशन परिसर की सफाई करते हुए उसे साफ-सुथरा बनाए रखते हैं. क्रमश: टॉम ऑपरेटर, वॉच एंड वार्ड तथा हॉस्पिटैलिटी के नाम से जाने जाने वाले ये लोग सीधे तौर पर यात्री सुविधा से जुड़े और मेट्रोसेवा को संचालित करने के क्रम में बेहद महत्वपूर्ण हैं. लेकिन पिछले लंबे समय से ये कामगार अपनी सेवा प्रदाता कंपनियों और डीएमआरसी से कई बातों को लेकर नाखुश हैं.

यूं तो ठेके पर काम करने वाले सभी श्रेणियों के कामगार तमाम परेशानियों से जूझ रहे हैं, लेकिन सबसे बुरी हालत सफाई का काम करने वाले लोगों की है. साढ़े पांच हजार रु की पगार पाने वाले इन लोगों को कई बार 12-15 घंटे तक भी ड्यूटी करनी होती है. इन्हें न तो साप्ताहिक अवकाश दिया जाता है और न ही ओवरटाइम का पैसा. यहां तक कि इनकी ड्यूटी का कोई निश्चित समय भी नहीं होता. दिल्ली सरकार द्वारा कामगारों के लिए तय किए गए न्यूनतम वेतन के मुताबिक अकुशल श्रमिकों को 307, कुशल श्रमिकों को 377 और उच्च कुशल श्रमिकों को 410 रुपये रोज के हिसाब से मेहनताना मिलना चाहिए.  मजाक देखिए कि डीएमआरसी ने इस बाबत मेट्रो स्टेशनों पर बोर्ड भी लगाए हैं. यही नहीं, इनमें उसने अधिकारियों के नाम और पते भी लिखे हैं ताकि कम वेतन मिलने की स्थिति में कामगार डीएमआरसी तक अपनी शिकायत पहुंचा सके. लेकिन कामगारों की नजर में ऐसे बोर्ड लगाने का कोई मतलब नहीं है. उनकी मानें तो न्यूनतम वेतन की मांग करने पर पहले तो उनके काम के घंटे बढ़ा दिए जाते हैं और फिर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है.

अजय स्वामी का मामला इसका उदाहरण है. अजय कहते हैं कि उन्हें कंपनी द्वारा इसलिए नौकरी से निकाल दिया गया था कि वे न्यूनतम मजदूरी, साप्ताहिक छुट्टी, बोनस और स्थायी नियुक्ति की मांगों को लेकर लगातार आवाज उठा रहे थे. अपनी कहानी बताते हुए अजय कहते हैं कि 2009 में उन्होंने 3,900 रुपये पगार पर नौकरी शुरू की थी. बाद में उन्हें मालूम हुआ कि न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से यह राशि बहुत कम है. बकौल अजय, ‘मैंने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर डीएमआरसी की अधिकृत अधिकारी को चिट्ठी लिखी, लेकिन उन्होंने इस पत्र पर कार्रवाई करने के बजाय मुझे नियुक्ति देने वाली कंपनी को इसके बारे में बता दिया. इसके बाद मेरी कंपनी के लोगों ने मुझे धमकाया और हद में रहने की नसीहत दी. लेकिन मैंने अपना विरोध जारी रखा और चुपचाप दूसरे कामगारों को संगठित करने की मुहिम शुरू कर दी. इसकी भनक जब कंपनी को लगी तो उसने मुझे बिना कोई नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया.’ नौकरी से निकाले जाने के बावजूद अजय कामगारों के अधिकारों को लेकर लगातार सक्रिय हैं. दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के बैनर तले ठेका कामगारों को एकजुट करने की मुहिम में जुटे अजय इन दिनों कुछ और साथियों के साथ इसी नाम से एक मजदूर यूनियन का पंजीकरण करने की कवायद में जुटे हैं.

ठेका मजदूरों की मुख्य रूप से चार मांगें हैं. एक- न्यूनतम वेतन, दो- अन्य सुविधाएं, बोनस और भत्ते, तीन- ऐच्छिक छुट्टियां और चौथी स्थायी नियुक्ति. कामगारों का आरोप है कि कंपनियों द्वारा उन्हें न तो न्यूनतम वेतन दिया जाता है और न ही किसी तरह की अन्य सुविधाएं. यहां तक कि जितना पैसा उन्हें मिलता भी है उसके लिए दो से तीन महीने का इंतजार करना पड़ता है. इन मांगों को लेकर वे विरोध प्रदर्शनों, मांगपत्रों और तमाम दूसरे माध्यमों के जरिए डीएमआरसी से कई बार फरियाद भी लगा चुके हैं. इसी तरह का एक प्रदर्शन बीती मई में जंतर मंतर पर किया गया था जिसमें काफी संख्या में ठेका कामगारों ने भाग लिया था. दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन के बारे में संगठन के अध्यक्ष प्रवीण बताते हैं कि इसके जरिए उनकी सबसे प्रमुख मांग हास्पिटैलिटी का काम करने वाले मजदूरों की वेतन वृद्धि की थी. वे बताते हैं कि फिलहाल टॉम ऑपरेटरों और वॉच एंड वार्ड श्रेणी के कामगारों को ही न्यूनतम मजदूरी मिल रही है जबकि हॉस्पिटैलिटी का काम करने वाले लोग अब भी इससे वंचित हैं. अजय स्वामी कहते हैं कि टॉम ऑपरेटरों और वॉच एंड वार्ड का काम करने वाले लोगों को भी 2011 के बाद से तब न्यूनतम वेतन मिलना शुरू हुआ जब उन्होंने इसके लिए भारी-भरकम प्रदर्शन किया.

ठेका कर्मचारियों की अहम मांग यह भी है कि उन्हें स्थायी नौकरी पर रखा जाए. इसके पक्ष में वे तमाम तरह के तर्क भी रखते हैं. अजय स्वामी कहते हैं कि ठेका मजदूरों द्वारा किए जाने वाले टिकट वितरण से लेकर सफाई तक के सभी काम स्थायी प्रकृति के हैं. जब तक मेट्रो चलती रहेगी, ये सारे काम भी अनिवार्य रूप से चलते रहेंगे. इस तरह देखें तो इनके लिए स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए. लेकिन एक दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कुछ नहीं किया गया और न ही आगे इसको लेकर कोई उम्मीद दिख रही है. अजय स्वामी आने वाले समय को लेकर जिस नाउम्मीदगी की ओर इशारा करते हैं उसके निशान डीएमआरसी के आगामी एजेंडे में साफ देखे जा सकते हैं. डीएमआरसी ने 2011-12 के सालाना प्रतिवेदन में भविष्य की योजनाओं के बारे में लिखा है कि 2021 तक लगभग पूरी दिल्ली को कवर करना मेट्रो का सबसे अहम लक्ष्य है, लेकिन कामगारों की नियुक्ति, उनके वेतन और अन्य हितों को लेकर इस वक्तव्य में कुछ भी नहीं कहा गया है. देखा जाए तो श्रमिक अधिकारों का सामान्य सिद्धांत भी स्थायी प्रकृति के काम के लिए स्थाई नियुक्ति की वकालत करता है. लेकिन दिल्ली मेट्रो में ठेके पर काम करने वाले मजदूरों के संबंध में यह कहीं नहीं दिखता.

आखिर इन कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने, अन्य भत्ते-सुविधाएं देने और इन्हें स्थायी नौकरी देते हुए इन्हें ठेका कंपनियों के दुश्चक्र से बचाने में डीएमआरसी की दिलचस्पी क्यों नहीं है? क्या डीएमआरसी के पास वित्तीय संकट की समस्या है? आखिर क्यों इन कामगारों को खुद संभालने के बजाय वह ठेका कंपनियों पर ज्यादा भरोसा कर रही है?

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सवाल जिन पर खामोश है डीएमआरसी

  • क्या डीएमआरसी कांट्रैक्ट कंपनियों द्वारा रखे गए ठेका कामगारों को अपना कर्मचारी मानती है?
  • प्राइवेट कंपनियों द्वारा रखे जाने वाले ठेका कामगारों की नियुक्ति में डीएमआरसी की क्या भूमिका होती है ?
  •  डीएमआरसी द्वारा प्राइवेट कंपनियों को प्रति कामगार कितनी रकम का भुगतान किया जाता है?
  • ठेका कामगारों को दिए जाने वाले पीएफ, बोनस, मेडिकल सुविधाअओं एवं इंश्योरेंस की नीति क्या है?
  • ठेका कामगारों की शिकायतों के आधार पर कांट्रैक्ट कंपनियों के खिलाफ डीएमआरसी ने क्या कार्रवाइयां की हैं?

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इन दो सवालों का जवाब ढूंढने के लिए तहलका ने डीएमआरसी का सालाना लेखा-जोखा खंगाला. पता चला कि पैसे की डीएमआरसी के पास कोई कमी नहीं है. 2011-12 के अपने वार्षिक प्रतिवेदन में डीएमआरसी ने खुद स्वीकार किया है कि 31 मार्च, 2012 तक उसने कुल 2,247.77 करोड़ रुपए का राजस्व कमाया. यह राशि पिछले साल के मुकाबले 342.92 करोड़ रुपये ज्यादा थी. राजस्व में हुई इस शानदार बढ़ोतरी से उत्साहित डीएमआरसी पहले और दूसरे चरण के बाद अब तीसरे चरण का काम भी शुरू कर चुकी है. इसके लिए उसने समय सीमा और दूसरे महत्वपूर्ण लक्ष्य भी तय कर लिए हैं. इसके अलावा उसने इस साल अपनी उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भी खूब खर्च किया. डीएमआरसी द्वारा इस साल विज्ञापनों पर खर्च की गई राशि करीब चार करोड़ रुपये है जो पिछले साल के मुकाबले लगभग एक करोड़ रुपये ज्यादा है. पर्यावरण से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों पर भी डीएमआरसी ने पिछले साल के मुकाबले करीब पांच करोड़ रुपये ज्यादा खर्च किए. हालांकि जनजागरण और सुरक्षा पर होने वाला खर्च पिछले साल हुए खर्च से कम रहा, लेकिन अधिकतर क्षेत्रों में उसने पिछले साल के मुकाबले ज्यादा रकम लगाई (देखें बाक्स). इस सबसे साफ होता है कि डीएमआरसी की माली हालत ठीक-ठाक है.

अब दूसरी बात पर आते हैं. आखिर कामगारों को सीधे खुद के अधीन रखने के बजाय डीएमआरसी ने उन्हें कंपनियों के हवाले क्यों छोड़ा हुआ है? इसको लेकर कामगारों का आरोप है कि अपने हिस्से के काम कंपनियों को सौंप कर डीएमआरसी मुख्य रूप से दो तरीके से फायदे में रहती है–एक तो उसे सस्ता श्रम मिल जाता है और दूसरा श्रमिकों को हो रही दिक्कतों की जिम्मेदारी से वह काफी हद तक बच जाती है. कामगारों के इस आरोप में भले ही पूरी तरह से सच्चाई न हो इसके बावजूद यह तर्क काफी दमदार नजर आता है. क्योंकि स्थायी नियुक्ति देने को बाद डीएमआरसी को उन सभी कामगारों के वेतन और अन्य सुविधाओं पर अधिक खर्च करना पड़ेगा.

हमने डीएमआरसी से इन अहम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की. लेकिन कई बार संपर्क करने के बाद भी हमें कोई जवाब नहीं मिला. इससे साफ हो जाता है कि इस मुद्दे में उसकी कितनी दिलचस्पी है. वैसे भी पूर्व में कई मौकों पर डीएमआरसी ठेका मजदूरों को अपना कर्मचारी मानने से इंकार कर चुकी है.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में मेट्रोसेवा शुरू होने के बाद यात्रियों को आवागमन के दूसरे साधनों के मुकाबले बहुत अधिक राहत मिली है. कल तक सड़कों पर कछुए की चाल से यात्रा करने को मजबूर आम आदमी को मेट्रो ने रफ्तार दी है. डीएमआरसी भी अपनी इस सफलता पर फूला नहीं समाती और डंके की चोट पर इसे अपने लिए बहुत बड़ी उपलब्धि बताती है. उसके सालाना प्रतिवेदन पत्र में मेट्रो की सफल गाथा का बखान करते हुए लिखा गया है कि ‘प्रेरित, संतुष्ट तथा प्रसन्न कार्यबल संगठनात्मक लक्ष्यों की सफलतापूर्वक प्राप्ति के लिए चाबी है’. सरल भाषा में कहें तो कर्मचारियों की खुशी ही सफलता का मंत्र है. लेकिन डीएमआरसी के इस स्वमहिमामंडन पर तब सवाल खड़े होते हैं जब हम ठेके पर काम कर रहे मजदूरों की हालत देखते हैं. मेट्रो को दिल्ली की लाइफ लाइन से लेकर तरक्की के पैमाने तक न जाने क्या-क्या माना गया हो, लेकिन इन कामगारों की नजर में यह उनके शोषण और तिरस्कार के उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है.

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