चमक में छिपा अंधेरा

प्राइवेट कंपनियों द्वारा ठेके पर रखे जाने वाले कामगार मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं. पहले, जो यात्रियों को टिकट और मेट्रोपास जारी करते हैं. दूसरे वे जो यात्रियों को पंक्तिबद्ध तरीके से गाड़ी से उतरवाते और उसमें चढ़वाते हैं और तीसरे वे जो स्टेशन परिसर की सफाई करते हुए उसे साफ-सुथरा बनाए रखते हैं. क्रमश: टॉम ऑपरेटर, वॉच एंड वार्ड तथा हॉस्पिटैलिटी के नाम से जाने जाने वाले ये लोग सीधे तौर पर यात्री सुविधा से जुड़े और मेट्रोसेवा को संचालित करने के क्रम में बेहद महत्वपूर्ण हैं. लेकिन पिछले लंबे समय से ये कामगार अपनी सेवा प्रदाता कंपनियों और डीएमआरसी से कई बातों को लेकर नाखुश हैं.

यूं तो ठेके पर काम करने वाले सभी श्रेणियों के कामगार तमाम परेशानियों से जूझ रहे हैं, लेकिन सबसे बुरी हालत सफाई का काम करने वाले लोगों की है. साढ़े पांच हजार रु की पगार पाने वाले इन लोगों को कई बार 12-15 घंटे तक भी ड्यूटी करनी होती है. इन्हें न तो साप्ताहिक अवकाश दिया जाता है और न ही ओवरटाइम का पैसा. यहां तक कि इनकी ड्यूटी का कोई निश्चित समय भी नहीं होता. दिल्ली सरकार द्वारा कामगारों के लिए तय किए गए न्यूनतम वेतन के मुताबिक अकुशल श्रमिकों को 307, कुशल श्रमिकों को 377 और उच्च कुशल श्रमिकों को 410 रुपये रोज के हिसाब से मेहनताना मिलना चाहिए.  मजाक देखिए कि डीएमआरसी ने इस बाबत मेट्रो स्टेशनों पर बोर्ड भी लगाए हैं. यही नहीं, इनमें उसने अधिकारियों के नाम और पते भी लिखे हैं ताकि कम वेतन मिलने की स्थिति में कामगार डीएमआरसी तक अपनी शिकायत पहुंचा सके. लेकिन कामगारों की नजर में ऐसे बोर्ड लगाने का कोई मतलब नहीं है. उनकी मानें तो न्यूनतम वेतन की मांग करने पर पहले तो उनके काम के घंटे बढ़ा दिए जाते हैं और फिर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है.

अजय स्वामी का मामला इसका उदाहरण है. अजय कहते हैं कि उन्हें कंपनी द्वारा इसलिए नौकरी से निकाल दिया गया था कि वे न्यूनतम मजदूरी, साप्ताहिक छुट्टी, बोनस और स्थायी नियुक्ति की मांगों को लेकर लगातार आवाज उठा रहे थे. अपनी कहानी बताते हुए अजय कहते हैं कि 2009 में उन्होंने 3,900 रुपये पगार पर नौकरी शुरू की थी. बाद में उन्हें मालूम हुआ कि न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से यह राशि बहुत कम है. बकौल अजय, ‘मैंने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर डीएमआरसी की अधिकृत अधिकारी को चिट्ठी लिखी, लेकिन उन्होंने इस पत्र पर कार्रवाई करने के बजाय मुझे नियुक्ति देने वाली कंपनी को इसके बारे में बता दिया. इसके बाद मेरी कंपनी के लोगों ने मुझे धमकाया और हद में रहने की नसीहत दी. लेकिन मैंने अपना विरोध जारी रखा और चुपचाप दूसरे कामगारों को संगठित करने की मुहिम शुरू कर दी. इसकी भनक जब कंपनी को लगी तो उसने मुझे बिना कोई नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया.’ नौकरी से निकाले जाने के बावजूद अजय कामगारों के अधिकारों को लेकर लगातार सक्रिय हैं. दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के बैनर तले ठेका कामगारों को एकजुट करने की मुहिम में जुटे अजय इन दिनों कुछ और साथियों के साथ इसी नाम से एक मजदूर यूनियन का पंजीकरण करने की कवायद में जुटे हैं.

ठेका मजदूरों की मुख्य रूप से चार मांगें हैं. एक- न्यूनतम वेतन, दो- अन्य सुविधाएं, बोनस और भत्ते, तीन- ऐच्छिक छुट्टियां और चौथी स्थायी नियुक्ति. कामगारों का आरोप है कि कंपनियों द्वारा उन्हें न तो न्यूनतम वेतन दिया जाता है और न ही किसी तरह की अन्य सुविधाएं. यहां तक कि जितना पैसा उन्हें मिलता भी है उसके लिए दो से तीन महीने का इंतजार करना पड़ता है. इन मांगों को लेकर वे विरोध प्रदर्शनों, मांगपत्रों और तमाम दूसरे माध्यमों के जरिए डीएमआरसी से कई बार फरियाद भी लगा चुके हैं. इसी तरह का एक प्रदर्शन बीती मई में जंतर मंतर पर किया गया था जिसमें काफी संख्या में ठेका कामगारों ने भाग लिया था. दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन के बारे में संगठन के अध्यक्ष प्रवीण बताते हैं कि इसके जरिए उनकी सबसे प्रमुख मांग हास्पिटैलिटी का काम करने वाले मजदूरों की वेतन वृद्धि की थी. वे बताते हैं कि फिलहाल टॉम ऑपरेटरों और वॉच एंड वार्ड श्रेणी के कामगारों को ही न्यूनतम मजदूरी मिल रही है जबकि हॉस्पिटैलिटी का काम करने वाले लोग अब भी इससे वंचित हैं. अजय स्वामी कहते हैं कि टॉम ऑपरेटरों और वॉच एंड वार्ड का काम करने वाले लोगों को भी 2011 के बाद से तब न्यूनतम वेतन मिलना शुरू हुआ जब उन्होंने इसके लिए भारी-भरकम प्रदर्शन किया.

ठेका कर्मचारियों की अहम मांग यह भी है कि उन्हें स्थायी नौकरी पर रखा जाए. इसके पक्ष में वे तमाम तरह के तर्क भी रखते हैं. अजय स्वामी कहते हैं कि ठेका मजदूरों द्वारा किए जाने वाले टिकट वितरण से लेकर सफाई तक के सभी काम स्थायी प्रकृति के हैं. जब तक मेट्रो चलती रहेगी, ये सारे काम भी अनिवार्य रूप से चलते रहेंगे. इस तरह देखें तो इनके लिए स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए. लेकिन एक दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कुछ नहीं किया गया और न ही आगे इसको लेकर कोई उम्मीद दिख रही है. अजय स्वामी आने वाले समय को लेकर जिस नाउम्मीदगी की ओर इशारा करते हैं उसके निशान डीएमआरसी के आगामी एजेंडे में साफ देखे जा सकते हैं. डीएमआरसी ने 2011-12 के सालाना प्रतिवेदन में भविष्य की योजनाओं के बारे में लिखा है कि 2021 तक लगभग पूरी दिल्ली को कवर करना मेट्रो का सबसे अहम लक्ष्य है, लेकिन कामगारों की नियुक्ति, उनके वेतन और अन्य हितों को लेकर इस वक्तव्य में कुछ भी नहीं कहा गया है. देखा जाए तो श्रमिक अधिकारों का सामान्य सिद्धांत भी स्थायी प्रकृति के काम के लिए स्थाई नियुक्ति की वकालत करता है. लेकिन दिल्ली मेट्रो में ठेके पर काम करने वाले मजदूरों के संबंध में यह कहीं नहीं दिखता.

आखिर इन कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने, अन्य भत्ते-सुविधाएं देने और इन्हें स्थायी नौकरी देते हुए इन्हें ठेका कंपनियों के दुश्चक्र से बचाने में डीएमआरसी की दिलचस्पी क्यों नहीं है? क्या डीएमआरसी के पास वित्तीय संकट की समस्या है? आखिर क्यों इन कामगारों को खुद संभालने के बजाय वह ठेका कंपनियों पर ज्यादा भरोसा कर रही है?

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सवाल जिन पर खामोश है डीएमआरसी

  • क्या डीएमआरसी कांट्रैक्ट कंपनियों द्वारा रखे गए ठेका कामगारों को अपना कर्मचारी मानती है?
  • प्राइवेट कंपनियों द्वारा रखे जाने वाले ठेका कामगारों की नियुक्ति में डीएमआरसी की क्या भूमिका होती है ?
  •  डीएमआरसी द्वारा प्राइवेट कंपनियों को प्रति कामगार कितनी रकम का भुगतान किया जाता है?
  • ठेका कामगारों को दिए जाने वाले पीएफ, बोनस, मेडिकल सुविधाअओं एवं इंश्योरेंस की नीति क्या है?
  • ठेका कामगारों की शिकायतों के आधार पर कांट्रैक्ट कंपनियों के खिलाफ डीएमआरसी ने क्या कार्रवाइयां की हैं?

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इन दो सवालों का जवाब ढूंढने के लिए तहलका ने डीएमआरसी का सालाना लेखा-जोखा खंगाला. पता चला कि पैसे की डीएमआरसी के पास कोई कमी नहीं है. 2011-12 के अपने वार्षिक प्रतिवेदन में डीएमआरसी ने खुद स्वीकार किया है कि 31 मार्च, 2012 तक उसने कुल 2,247.77 करोड़ रुपए का राजस्व कमाया. यह राशि पिछले साल के मुकाबले 342.92 करोड़ रुपये ज्यादा थी. राजस्व में हुई इस शानदार बढ़ोतरी से उत्साहित डीएमआरसी पहले और दूसरे चरण के बाद अब तीसरे चरण का काम भी शुरू कर चुकी है. इसके लिए उसने समय सीमा और दूसरे महत्वपूर्ण लक्ष्य भी तय कर लिए हैं. इसके अलावा उसने इस साल अपनी उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भी खूब खर्च किया. डीएमआरसी द्वारा इस साल विज्ञापनों पर खर्च की गई राशि करीब चार करोड़ रुपये है जो पिछले साल के मुकाबले लगभग एक करोड़ रुपये ज्यादा है. पर्यावरण से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों पर भी डीएमआरसी ने पिछले साल के मुकाबले करीब पांच करोड़ रुपये ज्यादा खर्च किए. हालांकि जनजागरण और सुरक्षा पर होने वाला खर्च पिछले साल हुए खर्च से कम रहा, लेकिन अधिकतर क्षेत्रों में उसने पिछले साल के मुकाबले ज्यादा रकम लगाई (देखें बाक्स). इस सबसे साफ होता है कि डीएमआरसी की माली हालत ठीक-ठाक है.

अब दूसरी बात पर आते हैं. आखिर कामगारों को सीधे खुद के अधीन रखने के बजाय डीएमआरसी ने उन्हें कंपनियों के हवाले क्यों छोड़ा हुआ है? इसको लेकर कामगारों का आरोप है कि अपने हिस्से के काम कंपनियों को सौंप कर डीएमआरसी मुख्य रूप से दो तरीके से फायदे में रहती है–एक तो उसे सस्ता श्रम मिल जाता है और दूसरा श्रमिकों को हो रही दिक्कतों की जिम्मेदारी से वह काफी हद तक बच जाती है. कामगारों के इस आरोप में भले ही पूरी तरह से सच्चाई न हो इसके बावजूद यह तर्क काफी दमदार नजर आता है. क्योंकि स्थायी नियुक्ति देने को बाद डीएमआरसी को उन सभी कामगारों के वेतन और अन्य सुविधाओं पर अधिक खर्च करना पड़ेगा.

हमने डीएमआरसी से इन अहम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की. लेकिन कई बार संपर्क करने के बाद भी हमें कोई जवाब नहीं मिला. इससे साफ हो जाता है कि इस मुद्दे में उसकी कितनी दिलचस्पी है. वैसे भी पूर्व में कई मौकों पर डीएमआरसी ठेका मजदूरों को अपना कर्मचारी मानने से इंकार कर चुकी है.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में मेट्रोसेवा शुरू होने के बाद यात्रियों को आवागमन के दूसरे साधनों के मुकाबले बहुत अधिक राहत मिली है. कल तक सड़कों पर कछुए की चाल से यात्रा करने को मजबूर आम आदमी को मेट्रो ने रफ्तार दी है. डीएमआरसी भी अपनी इस सफलता पर फूला नहीं समाती और डंके की चोट पर इसे अपने लिए बहुत बड़ी उपलब्धि बताती है. उसके सालाना प्रतिवेदन पत्र में मेट्रो की सफल गाथा का बखान करते हुए लिखा गया है कि ‘प्रेरित, संतुष्ट तथा प्रसन्न कार्यबल संगठनात्मक लक्ष्यों की सफलतापूर्वक प्राप्ति के लिए चाबी है’. सरल भाषा में कहें तो कर्मचारियों की खुशी ही सफलता का मंत्र है. लेकिन डीएमआरसी के इस स्वमहिमामंडन पर तब सवाल खड़े होते हैं जब हम ठेके पर काम कर रहे मजदूरों की हालत देखते हैं. मेट्रो को दिल्ली की लाइफ लाइन से लेकर तरक्की के पैमाने तक न जाने क्या-क्या माना गया हो, लेकिन इन कामगारों की नजर में यह उनके शोषण और तिरस्कार के उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है.

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