गोडसेवादी गांधी

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पीलीभीत शहर एक दौर में ‘बांसुरी नगरी’ के नाम से भी जाना जाता था. एक अनुमान के अनुसार देश में बनने वाली कुल बांसुरियों का लगभग 95 प्रतिशत निर्माण इसी शहर में हुआ करता था. इस उपलब्धि के बावजूद पीलीभीत को कभी राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास पहचान नहीं मिली. रोनू मजूमदार और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गज भी पीलीभीत की बनी बांसुरी बजाते रहे लेकिन इस शहर का नाम हमेशा गुमनाम ही रहा. यह शहर चर्चा में तब आया जब 2009 में वरुण गांधी यहां से चुनाव लड़ने पहुंचे. भड़काऊ भाषण देकर उन्होंने यहां नफरत की ऐसी बांसुरी बजाई कि उसकी बेसुरी गूंज ने एक ही दिन में पीलीभीत को देश भर में चर्चा का केंद्र बना दिया.

2009 के लोकसभा चुनाव में वरुण गांधी ने अपने भाषणों से पीलीभीत के पूरे माहौल को सांप्रदायिक रंग दे दिया था. इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में उनकी पार्टी भाजपा ने भी अपना हरसंभव समर्थन दिया था. भड़काऊ भाषणों के आरोप में वरुण गांधी पर दो मुकदमे दर्ज किए गए थे. इन मुकदमों के चलते वरुण 28 मार्च, 2009 को पीलीभीत कोर्ट में आत्मसमर्पण करने पहुंचे. उस दिन सुबह से ही पीलीभीत कोर्ट के बाहर लोग हाथों में भगवा झंडे और त्रिशूल लिए पहुंचने लगे थे. वरुण गांधी के कोर्ट पहुंचने तक यहां हजारों लोग इक्ट्ठा हो गए. भाजपा के स्टार प्रचारक और 2009  में प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी की उस दिन उत्तर प्रदेश में दो-दो जनसभाएं थीं. इसके बावजूद भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी कलराज मिश्र, आडवाणी की सभाओं में जाने के बजाय वरुण गांधी के साथ पीलीभीत पहुंचे. आत्मसमर्पण के दौरान वरुण गांधी के समर्थक हिंसा पर उतर आए. कई गाडि़यों को तोड़ दिया गया, भवनों की दीवारें गिरा दी गईं और ईंट-पत्थरों की ऐसी बरसात हुई कि कई पुलिसकर्मी एवं अन्य लोग घायल हो गए.

राजनीतिक फायदे के लिए आत्मसमर्पण का यह खेल कैसे सुनियोजित तरीके से खेला गया था इसका जिक्र हम ‘हत्याग्रही गांधी!’ में भी कर चुके हैं. स्वयं पीलीभीत के भाजपा उपाध्यक्ष और वरुण गांधी के बेहद करीबी परमेश्वरी गंगवार ने तहलका के स्टिंग में बताया था कि वरुण के आत्मसमर्पण वाले दिन उन्हें ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के आदेश दिए गए थे. इसके अलावा कोर्ट द्वारा उन्हें गिरफ्तार करने से इनकार करने पर एक हलफनामा दायर करके वरुण ने अपनी गिरफ्तारी सुनिश्चित कराई ताकि इससे उपजी सहानुभूति और भड़की भावनाओं का वे आगामी चुनाव में फायदा उठा सकें. आत्मसमर्पण के दिन हुए उपद्रव के आरोप में वरुण गांधी पर कई गंभीर आपराधिक धाराओं के अंतर्गत एक और मुकदमा दर्ज किया गया था.

भड़काऊ भाषण के दोनों मुकदमों की तरह वरुण गांधी बीती तीन मई को आत्मसमर्पण वाले मामले में भी बरी हो गए. हमने पिछले अंक में उन तमाम बातों का खुलासा किया था जिनके चलते वरुण गांधी को पीलीभीत के बरखेड़ा कस्बे और डालचंद मोहल्ले में दिए भड़काऊ भाषण के आरोपों से मुक्त कर दिया गया. तहलका की तहकीकात में सामने आया था कि कैसे पुलिस ने इन मामलों में जांच के नाम पर कुछ भी वैसा नहीं किया जैसा होना चाहिए था, कैसे गवाहों को पैसों के दम पर या डरा-धमका कर पक्षद्रोही बना दिया गया, कैसे अभियोजन पक्ष ने ही वरुण को बचाने के लिए हर मर्यादा का उल्लंघन किया, कैसे उत्तर प्रदेश के एक मंत्री को गवाहों के बयान बदलवाने का जिम्मा सौंपा गया, कैसे न्यायपालिका में न्याय का मखौल उड़ाया गया और कैसे एक प्रकार से पीलीभीत जिले का समूचा प्रशासन ही वरुण को बचाने में लगा रहा. इन सबके चलते भड़काऊ भाषण के मुकदमों के सारे गवाह अपने बयानों से मुकर गए.

आत्मसमर्पण के दिन हुए उपद्रव वाले मामले का फैसला आने तक हमारी पिछले अंक की रिपोर्ट लिखी जा चुकी थी. बाद में तहलका को मिले अदालती दस्तावेज बताते हैं कि इस मामले में भी बाकी दोनों मामलों की तरह ही पैतरे अपनाकर वरुण को दोषमुक्त किया गया. बल्कि इस बार तो गड़बड़ियों का स्तर और भी ऊंचा नजर आता है. वरुण गांधी के खिलाफ सबसे ज्यादा गवाह – 39 – इसी मामले में थे और सभी कोर्ट में अपने बयानों से पलट गए. संबंधित दस्तावेजों से यह साफ हो जाता है कि कैसे इस केस के दौरान भी पीलीभीत में कानून का तराजू एकतरफा वरुण की तरफ झुका हुआ था.

28 मार्च, 2009 को दर्ज हुए इस मामले में वरुण गांधी सहित कुल 13 लोगों को आरोपित बनाया गया था. लेकिन आश्चर्य की बात है कि वरुण का मामला बाकी आरोपितों से अलग करके सिर्फ उन्हीं को दोषमुक्त किया गया है. अन्य आरोपितों पर अभी मुकदमा चलाया जाना है. कानून के जानकार बताते हैं कि ऐसा सिर्फ तभी किया जाता है जब अन्य आरोपित फरार हों और कई प्रयत्नों के बाद भी कोर्ट में उपस्थित न हो रहे हों. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता कामिनी जायसवाल बताती हैं, ‘यदि अन्य आरोपित कोर्ट में पेश न हो रहे हों तो उनके खिलाफ वारंट जारी किए जाते हैं. तब भी यदि आरोपित फरार रहें तो उनकी कुर्की के आदेश दिए जा सकते हैं या फिर उनके जमानतियों को भी नोटिस जारी किए जा सकते हैं. इसके बावजूद जब आरोपित कोर्ट में न आएं तब ही उनके मुकदमे को अन्य आरोपितों से अलग किया जाता है.’

मगर वरुण की दोषमुक्ति के इस तीसरे मामले में कोई भी आरोपित फरार नहीं था. इन 13 आरोपितों में से अधिकतर पीलीभीत के ही रहने वाले हैं और स्थानीय लोगों के अनुसार ये सभी आरोपित वरुण के साथ ही कोर्ट में भी उपस्थित रहते थे. इसलिए वरुण गांधी का मामला अन्य आरोपितों से अलग करने का कोई भी वाजिब कारण नहीं था. लेकिन वरुण गांधी ने कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दाखिल करके अपना मुकदमा अलग किए जाने की प्रार्थना की. इस प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अब्दुल कय्यूम ने वरुण का केस अलग करके इसी साल फरवरी में सत्र न्यायाधीश के पास भेज दिया. वरुण को जिन अन्य दो मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका था उन पर फैसला देने वाले जज भी अब्दुल कय्यूम ही थे. उन्होंने इस मामले को सत्र अदालत में इसलिए भेजा कि आम तौर पर सात साल से ज्यादा की सजा वाले मामलों का ट्रायल वहीं होता है.

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