गली-गली में शंकराचार्य

1
315

guruबनारस में गंगा महासभा के कार्यालय में चौपाल लगी है. बात धार्मिक गुरुओं से होते हुए शंकराचार्यों तक जा पहुंचती है. सवाल उछलता है कि जब चार शंकराचार्यों की ही व्यवस्था थी तो अब इतने शंकराचार्य कैसे हो गए. गंगा महासभा के आचार्य जितेंद्र तुरंत यह सवाल लपकते हैं और हिसाब-किताब की भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं, ‘आप खुद सोचें कि ढाई हजार साल पहले जब आदि गुरु शंकराचार्य ने चार शंकराचार्यों और चार मठों की व्यवस्था बनाई थी तब अभी का जो भारत है उस दायरे में हिंदुओं की आबादी करीब एक करोड़ की रही होगी. अब यह लगभग 80 करोड़ है, जबकि असली-नकली, सभी को मिलाकर अभी भी शंकराचार्यों की संख्या 86 तक ही पहुंच सकी है. आदि गुरु शंकराचार्य के ही फॉर्मूले और दृष्टि को देखें तो बढ़ी हुई हिंदू आबादी को सनातनी बनाए रखने के लिए आनुपातिक रूप से 320 शंकराचार्यों की जरूरत तो है ही. इसीलिए सोच रहा हूं कि अब भी 234 शंकराचार्यों की जो कमी है उनके लिए वैकेंसी निकाल दूं!’

आचार्य जितेंद्र यह बात व्यंग्य-विनोद में कहते हैं. भले ही वे कोई वैकेंसी नहीं निकालेंगे, लेकिन संभव है कि वास्तव में अगले कुछ साल के भीतर देश के भीतर शंकराचार्यों की फौज मौजूद हो और उनकी संख्या 320 का आंकड़ा भी पार कर जाए. अभी ही देश में कितने शंकराचार्य हो गए हैं इसका सही-सही अनुमान लगा पाना आसान नहीं. रांची से लेकर हरियाणा तक हर जगह कोई न कोई शंकराचार्य दिख जाता है. एक-एक शहर में भी कई शंकराचार्य देखे जा सकते हैं और बनारस का तो हाल यह है कि एक ही मकान में दो-दो शंकराचार्य नजर आते हैं. अगर आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों की ही बात हो तो वहां भी असली शंकराचार्यों के साथ कई और शंकराचार्य अपनी-अपनी दावेदारी के साथ मौजूद हैं और मठ किसका हो, इस पर सालों से जंग लड़ रहे हैं.

कई जानकारों की मदद से हम इस समय देश में शंकराचार्यों की संख्या का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं. सभी अपने आंकड़े देते हैं और आखिर में यह जोड़ते हैं कि इतने तो हमारी जानकारी में हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इतने ही हों, और भी होंगे. बनारस स्थित भारतीय विद्वत परिषद के सार्वभौम संयोजक कामेश्वर उपाध्याय की जानकारी में फिलहाल देश में 59 शंकराचार्य हैं. गंगा महासभा के आचार्य जितेंद्र यह संख्या 86 बताते हैं. पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के मुताबिक शंकराचार्यों का कुल आंकड़ा 100 के पार होगा. अखिल भारतीय छद्म शंकराचार्य अन्वेषी समिति बनाकर 2011 के माघ मेले में फर्जी शंकराचार्यों की तलाश करने वाले राकेश 55 शंकराचार्यों से मिल चुके हैं और विवरण के साथ उनके पैंफलेट भी छाप चुके हैं.

शंकराचार्यों की संख्या में दनादन हो रही वृद्धि, इस बढ़ोतरी की प्रक्रिया और इसके परिणामों को समझने के लिए कुछ जगहों पर भटकने पर कई दिलचस्प जानकारियां सामने आती हैं. बनारस में भटकने पर तो हैरान करने वाला यह तथ्य भी सामने आता है कि इस धर्मनगरी में पिछले कई सालों से शंकराचार्यों का उत्पादन भी हो रहा है. फैक्टरी के किसी प्रोडक्ट की तरह.

हाल में चार पीठों के शंकराचार्य तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने इलाहाबाद में चल रहे कुंभ का बहिष्कार करने का एलान किया. शंकराचार्य चाहते थे कि कुंभ मेले में संगम किनारे चारों पीठों को अलग-अलग जगह देने के बजाय उन्हें एक जगह जमीन दी जाए. लेकिन प्रशासन ने इनकार कर दिया लिहाजा शंकराचार्यों ने महाकुंभ का बहिष्कार कर दिया. हालांकि प्रशासन की कई कोशिशों के बाद उन्होंने बाद में यह बहिष्कार खत्म कर दिया.

बनारस में हमारी मुलाकात सबसे पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से होती है. वे ज्योतिषपीठ और शारदापीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के प्रतिनिधि हैं और बनारस श्रीविद्या मठ के प्रमुख भी. अविमुक्तेश्वरानंद हमें मठामनाय महानुशासन नामक एक पुस्तिका देते हुए कहते हैं, ‘आप स्वयं देख लें, इसमें आदि गुरु शंकराचार्य के मठों के बारे में सब कुछ साफ लिखा हुआ है. चार मठ होंगे देश में और चार ही शंकराचार्य भी. अब जो इन चारों के अलावा शंकराचार्य बने हैं, वे कैसे बने हैं, यह समझा जा सकता है और उनसे ही पूछिए.’ अविमुक्तेश्वरानंद की मानें तो कुछ शंकराचार्य तो चंदे के लिए बने हैं और कुछ आवश्यकता के आविष्कार की तर्ज पर माफियाओं और राजनीतिज्ञों के बीच मध्यस्थता करके धंधा चलाने के लिए बनाए गये हैं. उनके मुताबिक बहुत-से शंकराचार्यों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन जैसी संस्थाओं और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी खड़ा किया है. वे कहते हैं, ‘चूंकि हिंदू धर्म में ईसाई धर्म या इस्लाम की तरह धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था आरंभिक अवस्था से नहीं है, सो इसे लेकर लोग सचेत नहीं रहते या विरोध नहीं करते. इसलिए यह सब आसानी से हो भी रहा है.’  अविमुक्तेश्वरानंद काशी विद्वत परिषद के बारे में भी समझाते हैं. कहते हैं, ‘बताइए, आदि गुरु शंकराचार्य का 2,519वां साल चल रहा है और विद्वत परिषद 110 साल पुरानी संस्था है, वह कैसे अभिषेक वगैरह करवाकर शंकराचार्य घोषित कर देती है किसी को?’

अविमुक्तेश्वरानंद से लंबी बातचीत के बाद हम उनके मठ से कुछ ही दूरी पर असी घाट किनारे बने शंकराचार्यों के एक मठ में पहुंचते हैं. यहां एक मकान में फिलहाल दो महानुभावों ने जगदगुरु शंकराचार्य उपनाम के साथ अपने-अपने बोर्ड लगा रखे हैं, एक नरेंद्रानंद और दूसरे चिन्मयानंद. दोनों ही खुद को ऊर्ध्वामनाय सुमेरु पीठ काशी का शंकराचार्य कहते हैं. अविमुक्तेश्वरानंद की मानें तो कुछ साल पहले तक इस एक मकान में छह व्यक्ति जगदगुरु ऊर्ध्वामनाय सुमेरु पीठ के शंकराचार्य बनकर ही रहा करते थे.

शंकराचार्यों के इस बसेरे में हमारी मुलाकात नरेंद्रानंद सरस्वती से होती है. वे भी जगदगुरु शंकराचार्य हैं! अक्सर विश्व हिंदू परिषद के आयोजनों में गर्जना के साथ मौजूद दिखते हैं. कुछ समय पहले पटना में भी अशोक सिंहल, सुब्रहमण्यम स्वामी के साथ दिखे थे और खून खौलाओ- स्वाभिमान जगाओ जैसे वाक्यों के साथ खूब गरजे थे.

नरेंद्रानंद बातचीत करने के लिए हमें उस मकान के एक छोटे-से कमरे में ले जाते हैं. कमरे में आसन से लेकर सिंहासन तक का प्रबंध दिखता है. बिना इधर-उधर की बात किए हमारा पहला सवाल यही होता है, ‘मठामनाय महानुशासन पुस्तक के हिसाब से तो चार शंकराचार्य ही होने चाहिए, आप शंकराचार्य कैसे हुए?’ नरेंद्रानंद सामने की तख्ती से एक पुस्तिका जैसा कुछ निकालते हैं और उसे पढ़ते हुए कहते हैं, ‘अज्ञानियों ने भरमाया और समझाया है आपको! खेमराज प्रेस से प्रकाशित ब्रह्मसूत्र शारीरिक मीमांसा भाष्य है भ्रांति टीका के साथ, इसके पृष्ठ संख्या 23/24 को पढि़ए, इसमें 35 शंकराचार्यों और मठों का उल्लेख है.’ नरेंद्रानंद किसी मठामनाय उपनिषद और मठामनाय सेतुग्रंथ का हवाला देते हुए तर्क देते हैं कि उसमें भी सात आमनायों यानी दिशाओं और सात मठों का जिक्र है. वे कहते हैं, ‘सच यह है कि स्वरूपानंद, निश्चलानंद और भारती तीर्थ, जो खुद को असली शंकराचार्य कहते हैं, वे खुद ही शास्त्रीय आधार पर सही शंकराचार्य नहीं हंै. मैं तो काशी सुमेरु पीठ का शंकराचार्य हूं, सभी सीमारक्षक शंकराचार्यों के बीच राष्ट्रपति की तरह. मुझसे आकर सभी को सर्टिफिकेट लेना होगा, मुझे किसी के प्रमाण पत्र की दरकार नहीं.’

बोलते-बोलते नरेंद्रानंद कुछ भी बोलने लगते हैं. वे आगे कहते हैं, ‘सोचिए, प्रलय आने पर सभी मठ ध्वस्त हो जाएंगे, लेकिन शंकर के त्रिशूल पर बसे होने के कारण यह काशी नगरी जस की तस रहेगी और यहां का शंकराचार्य ही बचा-बना रहेगा.’ नरेंद्रानंद कहते हैं कि जिस मठामनाय महानुशासन की बात हमें समझाई गई है उस किताब की असली पांडुलिपि कोई दिखा दे तो वे उसकी गुलामी करेंगे. वे चुनौती देते हुए कहते हैं, ‘और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, जो 90 वर्ष की अवस्था पार करने के बावजूद आदि गुरु शंकराचार्य के दो मठों पर कब्जा जमाए हुए हैं, जब चाहें तब आकर हर की पौड़ी में हमसे शास्त्रार्थ कर लें, जो हारेगा वह अपनी संपत्ति दे देगा और वहीं पर जल समाधि ले लेगा.’

नरेंद्रानंद बड़ी-बड़ी बातें एक सुर में बोल जाते हैं. उनके बारे में वैसे भी कहा जाता है कि वे बोलने के उस्ताद हैं. वे जो कह रहे हैं, यह उनका दंभ है, भ्रम है, अतिआत्मविश्वास है या सच्चाई, यह तो वही जानें, लेकिन उनकी बातों से यह साफ हो जाता है कि शंकराचार्यों की इस दुनिया में जो झोलझाल है, वह राजनीति की दुनिया में होने वाले दांव-पेंच से कोई कम जटिल और मजेदार नहीं. यह भी साफ होता है कि शंकराचार्यों की इस दुनिया में सभी एक-दूसरे की पोल खोलने को हर वक्त तैयार बैठे हैं, बस उन्हें जरा-सा उकसाने की दरकार है. नरेंद्रानंद काशी के जिस सुमेरु पीठ का शंकराचार्य होने का दावा करते हैं, उस पर फिलहाल जगदगुरु शंकराचार्य चिन्मयानंद भी दावेदारी में लगे हुए हैं. उस पीठ पर तरह-तरह के विवाद होते रहते हैं. विद्वानों का एक वर्ग हवाला देता है कि काशी को ऊर्ध्वामनाय (ऊपर की ओर स्थित) माना जाता है, इसलिए इसे ऊर्ध्वामनाय पीठ या सुमेरु पीठ कहते हैं. कुछ विद्वान कहते हैं कि 1950 के दशक में हिंदू धर्म सम्राट के नाम से प्रसिद्ध करपात्रीजी महाराज के सौजन्य से यह पीठ अस्तित्व में आया था और पहली बार यहां शंकराचार्य बनाने का चलन शुरू हुआ था. हालांकि नरेंद्रानंद सरस्वती ने अपने लिए जो बुकलेट छपवा रखी है उसमें वे खुद को काशी में 62वें शंकराचार्य के रूप में दिखाते हैं. दूसरी ओर शंकराचार्य के प्रतिनिधिगण इसे महज कल्पना बताते हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘जिस सात आमनायों के जरिए सात मठों का हवाला दिया जा रहा है, उसमें तीन अप्रत्यक्ष हैं. यदि कोई ऊर्ध्वामनाय का ही शंकराचार्य बनना चाहता है तो उसे काशी के बजाय कैलाश में बैठना चाहिए, क्योंकि ऊर्ध्वामनाय कैलाश को कहा गया है, काशी को नहीं.’

यह तो काशी में रहने वाले दो प्रमुख संतों जिनमें एक खुद शंकराचार्य हैं और दूसरे शंकराचार्य के प्रतिनिधि, उनके बीच सवाल-जवाब से पैदा हुई नोक-झोंक और विवाद की झलक भर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में जब शंकराचार्यों की पड़ताल करने की थोड़ी कोशिश भर करते हैं तो और भी अजब-गजब तर्क सामने आते हैं और अजब-गजब शंकराचार्य भी. शो रूम में चमकने वाले कुछ शंकराचार्यों के किस्से जानकर गोदाम की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पिछले दिनों एक शंकराचार्य उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर इलाके के एक रेलवे क्रॉसिंग के पास खुद मारुति 800 कार चलाते हुए दिखे थे. रेलवे क्रॉसिंग पर उनकी गाड़ी लगी थी, उनसे पूछा गया कि शंकराचार्य की गाड़ी है, वे किधर हैं. उनका जवाब था, ‘बताइये क्या बात है, मैं ही शंकराचार्य हूं.’ यह पूछने पर कि क्या अकेले ही चलते हैं, उनका जवाब था, ‘हां, इसी में सिंहासन-आसन सब रख लेता हूं, घूमता रहता हूं, एक चेला भी रहता है साथ में, लेकिन अभी नहीं है.’

1 COMMENT

  1. काफी अच्छा लेख था।पर क्या आप जानते हैं कि एक आम हिंदू शंकराचार्य के बारे में तो क्या उनका नाम तक नही जानता हैं। शायद यही वज़ह है जो इतना तीम झाम हैं। जानकारी के लिए धन्यवाद

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here