किताब और सबक

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विचार का जवाब विचार होना चाहिए या कानूनी प्रतिबंध या फिर हिंसा, इस सवाल पर फिर से बहस छिड़ गई है. इस बार इसकी वजह बना है प्रकाशक द्वारा एक विवादित किताब को बाजार से वापस लेने और नष्ट करने का फैसला. पेंगुइन इंडिया ने यह निर्णय अमेरिकी लेखिका वेंडी डॉनिगर की किताब ‘द हिंदूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ पर लिया है. यह किताब 2009 में प्रकाशित हुई थी. दरअसल शिक्षा बचाओ आंदोलन नाम के एक संगठन ने 2011 में पेंगुइन इंडिया के खिलाफ मामला दायर किया था. उसका कहना था कि कि इस किताब में कई पूर्वाग्रह और तथ्यात्मक गलतियां हैं और यह हिंदुओं का अपमान करती है. पेंगुइन इंडिया इस पुस्तक को वापस लेने और उसकी बची प्रतियों को नष्ट करने पर सहमत हो गई और मामला निपट गया.

किताब 'द हिंदूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री' की लेखिका वेंडी डॉनिगर
किताब ‘द हिंदूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ की लेखिका वेंडी डॉनिगर

1940 में न्यूयॉर्क में जम्मी डॉनिगर को भारतीय संस्कृति की गहरी अध्येता माना जाता है. फिलहाल वे शिकागो विश्वविद्यालय में धर्मों के इतिहास विषय की प्रोफेसर हैं. वे एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अंतरराष्ट्रीय संपादकीय बोर्ड में भी हैं. उनकी इस किताब को दो साल पहले प्रतिष्ठित रामनाथ गोयंका पुरस्कार भी मिल चुका है. शिक्षा बचाओ आंदोलन के अध्यक्ष दीना नाथ बत्रा का आरोप है कि उनकी यह किताब ‘सेक्स और कामुकता’ पर आधारित है. उनका कहना है कि किताब के मुख्य पृष्ठ पर छपी तस्वीर तो आपत्तिजनक है ही, साथ ही किताब में देवी देवताओं और महापुरुषों के बारे में भी ओछी टिप्पणियां की गई हैं. इससे पूरे समाज की भावनाओं को इससे ठेस पहुंची है.

उधर, वेंडी डोनिगर ने फैसले पर अफ़सोस जताया है. बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था कि उन्हें इस बात की आशंका थी. हालांकि जिस तरह से भारत और पूरी दुनिया में इसकी प्रतिक्रिया हुई उस पर वे चकित भी थीं. उन्होंने कानून बदलने की जरूरत भी बताई. डोनिगर का कहना था, “कानून काफी क्रूर है. किसी हिंदू को आहत करने वाली किताब के प्रकाशक को ये अपराधी साबित करता है.” किताब हिंदुओं के लिए अपमानजक है, इस आरोप पर उनका कहना था, ” बहुत से हिंदुओं को किताब काफी अच्छी लगी और उन्होंने इस बारे में मुझे लिखा भी है. किताब काफी बिकी भी है. इसलिए ऐसा नहीं है कि किताब बस हिंदू विरोधी है.

दरअसल तो ये काफ़ी हिंदू समर्थक किताब है. ये कुछ ख़ास तरह के हिंदुओं को बुरी लगेगी. दक्षिणपंथी हिंदुओं को, कट्टरपंथी हिंदुओं को और ऐसे लोगों को जो किताब को दबाना चाहते हैं.”

इस मामले की बौद्धिक समाज में तीखी प्रतिक्रिया हो रही है. अपने एक लेख में चर्चित इतिहास रामचंद्र गुहा कहते हैं, ‘डॉनिगर का मामला सबसे ताजा उदाहरण है कि अदालतें, प्रकाशक और राजनेता बौद्धिक आजादी की सुरक्षा नहीं कर पा रहे.’ जाने माने साहित्यकार अशोक वाजपेयी का कहना है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. उनके मुताबिक दीनानाथ बत्रा पूरे समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं. एक समाचार वेबसाइट से बातचीत में वे कहते हैं कि जिसे नहीं पढ़ना है वह न पढ़े, लेकिन प्रतिबंध या रोक अच्छी बात नहीं है.”

भारत में सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर काफी आलोचना देखी जा रही है. कई लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लग रही इन पाबंदियों पर चिंतित हैं. हालांकि एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि धार्मिक भावनाओं को ख्याल रखना भी जरूरी है.

बीबीसी से बातचीत में साहित्यकार उमा वासुदेव कहती हैं कि वे किताबों पर किसी तरह के प्रतिबंध के पक्ष में तो नहीं हैं, लेकिन लेखकों को भी चाहिए कि वे धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं.

उधर, पेंगुइन इंडिया का तर्क है कि दूसरों की तरह वह भी देश के कानून का पालन करने को बाध्य है. अपने बयान में उसने कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत में आपराधिक धाराओं के कुछ हिस्से ऐसे हैं, जिनकी वजह से कानून तोड़े बगैर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बचाए रखना मुश्किल है. प्रकाशक का कहना था, “हम समझते हैं कि इसकी वजह से भारत में किसी भी प्रकाशक के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर बनाकर रखना मुश्किल होगा.”

किताबों पर विवाद भारत में नया नहीं है. कई लोग मानते हैं कि इस मुद्दे पर पहली और बुनियादी गलती 1989 में राजीव गांधी की सरकार ने की थी. तब उन्होंने सलमान रश्दी की किताब द सेटेनिक वर्सेस को यह कहकर प्रतिबंधित कर दिया था कि इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हो रही हैं. भारत ने ईरान और पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों से भी पहले यह काम कर दिया था. उस समय इतिहासकार धर्म कुमार ने लिखा कि यह प्रतिबंध सरकार की कमजोरी का संकेत है. किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य में ईशनिंदा की भी जगह होनी चाहिए. भारत के राष्ट्रपति किसी धर्म या सारे धर्मों के रक्षक नहीं हैं.

एक वर्ग मानता है कि राजीव गांधी के इस कमजोर कदम ने हर तरह के कट्टरपंथियों की हिम्मत बढ़ा दी. बाद के दिनों में महाराष्ट्र में जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब को भी निशाना बनाया गया. ऐसा करने वालों ने राज्य सरकार को किताब पर प्रतिबंध लगाने के लिेए मजबूर कर दिया. सरकार के प्रतिबंध को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था लेकिन ऑक्सफोर्ड प्रेस फिर भी किताब बेचने को लेकर डरी हुई थी. उसे लग रहा था कि उसके दफ्तर पर गुंडे हमला करेंगे और पुलिस सिर्फ देखती रहेगी. जोसेफ लेलेवेल्ड की किताब पर भी भारत में 2011 में हंगामा हो चुका है, जिसमें दावा किया गया था कि महात्मा गांधी समलैंगिक थे. गुजरात सरकार ने इस पर पाबंदी लगा दी है.

1 COMMENT

  1. भारत: प्रतिबंधित अभिव्यक्ति का लोकतंत्र:—-
    भारत में दिन प्रतिदिन फासीवादी ताकते जिस तरीके से अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता पर हमले कर रही है, उससे अब ये प्रतीत होने लगा है कि हम किसी लोकतान्त्रिक देश में नही बल्कि एक ऐसे अंधविश्वासी तानाशाही ((मै ऐसे लोगो को धार्मिक तो नही कहना चाहता)) समाज में रह रहे है, जंहा समाज से लेकर सरकार तक सब अपने को श्रेष्ट मानने और इस मान्यता को पुष्ट करने में लगे है | भारत अब एक अँधेरे कमरे के समान होता जा रहा है जिसमे तथाकथित, स्वंयभू धर्म और संस्कृति के ठेकेदार ये तय करने लगे है कि कमरे में कितनी रौशनी मिलनी है या नही | वेंडी डॉनिगर की किताब “‘द हिंदूज़: ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री” (The Hindus: An Alternative History) को पन्गुइन इंडिया द्वारा कुछ तथाकथित सांस्कृतिक ठेकेदारों के दवाब में भारतीय बाजारों से वापिस लिए जाने का फैसला निश्चित तौर पर निराशाजनक है | अभिव्यक्ति के खिलाफ चल रहे इस परोक्ष षड्यंत्र, जो कि भारत में लोकतान्त्रिक मूल्यों को लगातार कमजोर कर रहा है, का भारतीय समाज और शिक्षित वर्ग द्वारा चुप सह लेना, भविष्य में एक बड़े खतरे की चेतावनी है | यदि “शिक्षा बचाओ आन्दोलन” के लोगो को ये लगता था कि पुस्तक में तथ्यात्मक खामिया है, तो उन्हें उन सभी खामियों को लिखकर लोगो के सामने लाने की जरूरत है | ताकि लोग दोनों पक्षों को जान सके और अपने विवेक से फैसला ले सके | जब १९१७ में विलियम आर्चर ने “भारत और भविष्य” (India and the future) और जॉन वूडरोफ ने १९२२ में “क्या भारत सभ्य है” (Is India civilised ?) प्रकाशित की, तो श्री अरबिंदो ने उन पुस्तकों को प्रतिबंधित करने की मांग नही की बल्कि दोनों पुस्तकों में उठाये गए सवालो के उत्तर अपनी पुस्तक “ भारतीय संस्कृति के आधार” (The Renaissance in India and Other Essays on Indian Culture) में दिए , जो अब तक भारतीय संस्कृति पर एक उत्कृष्ट रचना है |
    लेकिन शिक्षा बचाओ आन्दोलन के लोगो ने इस मुद्दे पर एक स्वस्थ बहस करने के बजाये जो रास्ता अपनाया, वो निश्चित ही निंदनीय है | संस्कृति का नाम लेकर लोगो को जानने के मौलिक अधिकार से वंचित करना, किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए शर्मनाक घटना है | भारत में तर्क वितर्क और शास्त्रार्थ की अपनी एक पुरातन परम्परा रही है | लेकिन अब संस्कृति के नाम पर भारत की इसी विरासत को तहस नहस किया जा रहा है | अब ये चंद लोग भारत को दुबारा एक ऐसा देश बनाने पर उतारू है, जंहा ज्ञान को सिर्फ कुछ ही लोगो तक सीमित किया जाए और वो ही लोग ये तय करे की जनता क्या पढ़े, क्या सुने क्या समझे और क्या सोचे | मुझे लगता है कोई भी संस्कृति, धर्म या समाज, जो विकास और तरक्की चाहता है, कभी भी तर्क वितर्क पर रोक लगाने का काम नही करेगा, बल्कि वो स्वस्थ तौर पर इन चीजो को बढ़ावा देगा |
    आखिर मै आज तक इस बात को समझ पाने में नाकाम रहा हु कि १२० करोड़ की आबादी के इस देश में, धर्म या संस्कृति के नाम पर चिल्लाने वाले मुठ्ठी भर लोगो को, जनता के मौलिक अधिकारों से खेलने की इजाजत कौन दे देता है | इस तरह के घटनाक्रम हर उस व्यक्ति और संस्था पर सवालिया निशान खड़ा करते है, जो इस देश में सविधान की रक्षा करने की शपथ लेकर खड़े है | सत्ता के लोग तो हमेशा ही ऐसी जनता को चाहते है जो तर्क वितर्क ना करे, तो इसी लिए वो मूक दर्शक बने रह कर, अपनी सहमति दे देते है | लेकिन ये भविष्य में भारत को मानसिक तौर पर गुलाम बना देने का षड्यंत्र है, जो हजारो साल से चली आ रही इस संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है |

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