कर्मचारियों का ‘डोप टेस्ट’ और विक्रेताओं को मौत की सिफारिश!

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पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को नशीली दवाओं के खिलाफ अपनी जंग छेडऩे के ऐलान पर अमल करने में 18 महीने लग गए। उन्होंने यह पहल तब की जब नशीली दवाओं की ज़्यादा मात्रा में लेने से हुई मौतों से पूरा प्रदेश हिल उठा।

उन्होंने राज्य के सवा तीन लाख सरकारी कर्मचारियों में ‘नशे की लत’ (डोप टेस्ट) की जांच के आदेश भी फौरन जारी कर दिए। मंत्रिमंडल ने एनडीपीएस एक्ट में संशोधन भी कर दिया। इसके तहत नशे के सौदागरों और छोटे विक्रेताओं को मौत की सज़ा की सिफारिश की गई है।

यह सभी जानते हैं कि पंजाब में मादक पदार्थों की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय सीमा (ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान) से होती है। इसे सुनहरा अर्ध चंद्र भी कहते हैं। पंजाब की 553 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा इस तस्करी में उपयोग में आती है। आज न केवल यह राष्ट्रीय समस्या है बल्कि देश की सुरक्षा को भी खतरा हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि मादक दवाओं के खिलाफ गंभीर तौर पर युद्ध छेड़ा जाए और जनता का पूरा सहयोग लिया जाए। इससे पता लगेगा कि समस्या की असल जड़ कहां है।

अनिवार्य तौर पर नशे की लत की जांच और मादक द्रव्य बेचने वालों के लिए सज़ा-ए-मौत की सिफारिश की घोषणा से कुछ रोक तो लगेगी, लेकिन इससे मादक द्रव्यों की बिक्री पर जीत हासिल नहीं होगी।

पूरी दुनिया में मौत की सज़ा लगभग खत्म हो गई है और इसे अब दुर्लभ से दुर्लभ अपराधों के लिए ही सुरक्षित रखा गया है। ऐसे कदमों से यही जान पड़ता है कि समस्या के निदान की बजाए सिर्फ बलाए नाम कार्रवाई की जा रही है। नशे की समस्या कितनी विकराल है उसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि पंजाब के दो तिहाई घरों में कम से कम एक तो नशे का आदी है ही।

ऐसा नहीं है कि पहले नशे की लत से परेशान लोग और उन्हें नशा बेचने वाले गिरफ्तार नहीं किए जाते थे। पिछले ही साल 18,977 छोटे व्यवसाई इन मामलों में पकड़े गए और जेलों में बंद कर दिए गए। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार नॉरकाटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्स्टैंसेज से मिली जानकारी बताती है कि पूरे देश में ऐसे मामलों में तीस फीसद मामले अकेले पंजाब में हैं।

इस व्यापक आकार की समस्या के निदान के लिए ज़रूरी है कि इस आतंक के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ा जाए। देश में ड्रग माफिया इसलिए पनपता रहा है क्योंकि इसे राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और बड़ी संख्या में इसमें पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों का सहयोग रहा है। एनडीपीएस कानून के तहत जो लोग गिरफ्तार किए गए हैं उनके पास से इस मादक द्रव्य की छोटी-छोटी पुडिय़ा ही मिली है। जहां बड़े-बड़े ड्रग माफिया हों वहां से यह बरामदगी महज रेहन जैसी ही है।

आज ज़रूरत है कि नशे की लत के कारणों को ठीक तरह से जाना-समझा जाए। यह जानकारी ली जाए कि कैसे नौजवान लोग इसमें कैसे फंसते हैं और कैसे नशा लेते-लेते इसके आदी हो जाते हैं। क्या कानून का पालन करने वाली एजेसियां अपनी पूरी ताकत से देश के तमाम ड्रग माफिया को नष्ट नहीं कर सकतीं। इस समस्या से जुड़े सभी लोगों को इस संबंध में विचार करना चाहिए। इन्हें यह जानकारी भी लेनी चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था जो भविष्य से नाउम्मीद है और इसकी रोज़गार के मामलों में भी भयावह है। यह सब नए सिरे से देखा जाना चाहिए। अधिकारियों को यह अध्ययन भी करना चाहिए कि कहीं निराश होकर तो नहीं, नौजवान मादक द्रव्यों का सेवन करने लगे हैं। कुछ ग्रामीणों ने खुद फैसला लिया है कि वे नशे के धंधे में लगे छोटे-बड़े व्यवसाइयों को धर दबोचेंगे और उन्हें पुलिस के हवाले कर देंगे। देखना है कि यह जागरूकता कहीं घातक जागरूकता का एक और रूप तो नहीं ले लेती।