कयास की धुंध में जीत हार के दावे

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अगले महीने की 18 तारीख को वोटिंग मशीनों से जब नतीजे निकलेंगे तब सूबे के पहाड़ों पर बर्फ की परत जम चुकी होगी। नतीजे इस ठण्ड को राजनीतिक गर्मी में बदल देंगे। मतदाता की खामोशी के बीच अभी तक के सबसे ज्यादा मतदान से कयास की ऐसी गहरी धुंध प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में फैला दी है कि राजनीति के धुरंधर भी जीत-हार की जुमलेबाजियों में गोते लगा रहे हैं। राजनीतिकों के लिए मतदाता का मूड भांपना उतना ही मुश्किल लग रहा है जैसे मेंढक को तराजू में तोलना।

भले दोनों प्रमुख दलों – भाजपा और कांग्रेस – ने अपनी अपनी जीत के दावे मतदान के बाद किए तो हैं, लेकिन दोनों के गुणा-भाग में भरोसा कम दावे की प्रतिध्वनि ज्य़ादा है। एक-एक सीट का आकलन दोनों दलों के बड़े नेताओं प्रेम कुमार धूमल और वीरभद्र सिंह के ड्राइंग रूमों में अपने $खास-उल-$खास लोगों के साथ हुआ है, लेकिन दोनों जगह से छनकर जो जानकारी आई है उसके मुताबिक दोनों ही दलों के अपने आकलन 31 से 37 सीटों की बीच फंसे हुए हैं। यदि यही स्थिति रही और आंकड़ों का गणित अटका तो निर्दलीय या माकपा आदि से जीतने वालों पर सरकार गठन का मसला आ अटकेगा। प्रदेश में 1998 के विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसी ही स्थिति बनी थी। वैसे हिमाचल में 68 सदस्यों की विधानसभा में सरकार बनाने यानी साधारण बहुमत के लिए 35 सीटें चाहिए।

प्रदेश में इस बार कोई लहर नहीं दिख रही थी। न तो मोदी का कोई करिश्मा दिख रहा था न वीरभद्र सिंह सरकार के प्रति किसी तरह की ‘एंटी इंकम्बेंसीÓ। धूमल को भाजपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने के बाद ही भाजपा का चुनाव अभियान सघन हुआ। वोटर खामोश था। इस स्थिति ने सभी दलों के नेताओं को मजबूर किया कि वे अपने काडर को सक्रिय करें। राजनीति को समझने वालों का कहना है कि इसी कारण ज्यादा मतदान हुआ। इसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। प्रदेश सरकार में सूचना विभाग के निर्देशक रहे और राजनीतिक विश्लेषक बीडी शर्मा ने कहा कि चुनाव आयोग और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी ज्यादा मतदान का एक कारण है।

अब बात आती है प्रदेश में हर बार सरकार बदल देने की मतदाता की फितरत की। पिछले सालों में ऐसा अधिकतर बार हुआ है। क्या इस बार भी मतदाता ने इतिहास को दोहराया है, इस यक्ष प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं हैं। अलबत्ता भाजपा को भरोसा है कि मतदाता ने इसी परंपरा को निभाते हुए भाजपा को वोट किया है। कांग्रेस का दावा है कि इस बार प्रदेश में वोट वीरभद्र सिंह के ”आखिरी चुनावÓÓ के कारण उन्हें पड़े हैं। जबकि भाजपा कह रही है कि कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार और माफिया की सक्रियता से तंग जनता ने भाजपा और धूमल को वोट किया है।

भाजपा ने चुनाव मैदान में अपने बड़े नेताओं को बहुत ज्यादा संख्या में बुलाया। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन बार हिमाचल आए और कुल नौ चुनाव सभाएं कीं। इसके विपरीत कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ही बार हिमाचल आये और तीन चुनाव सभाएं उन्होंने कीं। इस तरह कहा जा सकता है कांग्रेस के चुनाव प्रचार का जिम्मा कमोवेश वीरभद्र सिंह ने ही उठाया।

मोदी के दौरों के बावजूद भाजपा के प्रचार का जिम्मा धूमल के इर्द गिर्द रहा। कहा जाता है कि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा को आगे करने के बाद जब भाजपा आलाकमान ने मह्सूस किया कि वे पार्टी की नैया पार नहीं लगा पाएंगे तो चुनाव से महज आठ दिन पहले धूमल को आगे करने का फैसला पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को करना पड़ा। ‘तहलकाÓ के सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे पीएमओ को अपनी एजेंसियों से मिले इनपुट के बाद किया गया जिसमें कहा गया था कि धूमल को आगे न किया गया तो कांग्रेस अंतिम क्षणों में भाजपा पर ”भारीÓÓ पड़ सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि धूमल को आगे करने के बाद भाजपा का चुनाव प्रचार ज़मीनी स्तर पर काफी मजबूत हो गया।

चुनाव का गहराई से आकलन करने से जाहिर होता है कि 68 में से कम से कम एक दर्जन सीटें ऐसी हैं जहाँ कांटे का मुकाबला है। दोनों दलों के बागी खेल दिलचस्प बना रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि इनमें से आध दर्जन सीटों को भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने अपने आकलन में अपने पाले में रखा है। यही सीटें सरकार का रास्ता तय करने वाली हैं। कांगड़ा और मंडी जिले चुनाव में अहम रोल अदा करने वाले हैं। कांगड़ा में 2012 के चुनाव में भाजपा 15 में से सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी जबकि इस बार उसकी स्थिति बेहतर हुई है। मंडी में भी भाजपा भारी दिख रही है।

शिमला में आठ सीटें हैं और कांग्रेस यहाँ मजबूत दिख रही है जबकि एक सीट ठियोग पर माकपा विरोधियों को जबरदस्त टक्कर दे रही है। शिमला शहरी सीट भी दिलचस्प बनी हुई है जहाँ कांग्रेस के बागी निर्दलीय ने सभी की नींद हराम की है। इसके अलावा सिरमौर और सोलन में भी कांग्रेस वीरभद्र सिंह के अर्की से लडऩे के कारण फायदे में रह सकती है। धूमल के प्रभाव वाले हमीरपुर जिले में भाजपा कांग्रेस को पीछे धकेल सकती है। इसी जिले से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी लड़ रहे हैं। बिलासपुर, कुल्लू, ऊना और चम्बा में बराबर की टक्कर है जबकि तीन कबाइली सीटें भी दोनों में बंटने के आसार हैं। फैसला तीन जिलों काँगड़ा (15), मंडी (10) और शिमला (8) जिलों से होना है जहाँ कुल 68 सीटों में से 33 सीटें हैं।

दोनों दलों के आकलन के बावजूद कुछ चुनाव विश्लेषक मानते है कि ज्यादा मतदान किसी एक दल के पक्ष में हुआ भी हो सकता है। वैसे पिछले चुनाव कांग्रेस जीत के बावजूद 35 सीटें हासिल कर पाई थी जबकि 2007 में भाजपा ने 43 सीटें जीती थीं। वरिष्ठ पत्रकार और चुनाव विश्लेषक एसपी शर्मा का आकलन है कि कांग्रेस चुनाव में भाजपा को चौंका सकती है। इसके लिए वे तीन कारण गिनाते हैं। पहला यह कि मोदी सरकार के प्रति लोगों की महंगाई और जीएसटी के कारण नाराजगी, दूसरी वीरभद्र सिंह सरकार के प्रति एंटी इंकम्बेंसी न दिखना और तीसरे आखिरी चुनाव के कारण वीरभद्र सिंह के प्रति जनता की सहानभूति।

जबकि राजनीतिक विश्लेषक बीडी शर्मा मानते हैं कि निश्चित ही भाजपा का इस चुनाव में ”एजÓÓ था और यदि एक पक्षीय नतीजा हुआ तो यह भाजपा के पक्ष में होगा और वह 40 से 45 के बीच सीटें जीत सकती है। अपने दावे के लिए वे बताते हैं कि प्रदेश में सरकार हर बार बदल जाती है, दूसरे केंद्र में भाजपा सरकार होने से प्रदेश के लोगों को लगता है ज्यादा विकास योजनाएं सूबे में आएंगी और तीसरे धूमल को आगे करने से भाजपा को लाभ मिला।

स्ट्रांग रूम में ईवीएम

चुनाव के बाद अब जिम्मा 337 प्रत्याशियों के भविष्य की सुरक्षा का है। ऐसे में अर्ध सैनिक बालों ने कमर कस ली है। बहरहाल, प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ईवीएम को सुरक्षा के बीच स्ट्रांग रूम तक पहुंचाया गया है। दूरदराज और कबायली इलाकों से मशीनों को हेलिकॉप्टर के माध्यम से सही जगह तक लाया जा रहा है। गौर रहे कि प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में अलग-अलग स्ट्रांग रूम बनाए गए हैं। स्ट्रांग रूम में ईवीएम के पहुंचने के बाद राजनीतिक दलों को स्क्रूटनी के लिए बुलाया गया। निर्वाचव आयोग के पर्यावेक्षक की मौजूदगी में मशीनों को चैक किया गया और फिर इन्हें स्ट्रांग रूम में कैद कर दिया गया। अब अगले 38 दिनों तक यह ईवीएम मशीनें कड़ी सुरक्षा के बीच रहेंगी। ईवीएम की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पैरा मिलिट्री फोर्स के जवान तैनात किए गए हैं।

महिलाएं : वोट देने में आगेजीतने में पीछे

चुनावों में मतदान करने में हमेशा आगे रहने वालीं हिमाचल की महिलाएं विधानसभा की दहलीज लांघने में हर बार पिछड़ जाती हैं। एक तो दोनों प्रमुख दल उन्हें टिकट कम देते हैं ऊपर से उनकी जीत का प्रतिशत भी कम रहता है। पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा इस बार कम महिलाएं चुनावी मैदान में उतरीं। चुनाव में 19 महिलाएं कूदी जबकि वर्ष 2012 में यह आंकड़ा 34 था। साल 2012 में 34 महिलाएं मैदान में उत्तरी थीं लेकिन महज तीन ही विधानसभा पहुँच पाईं। इस बार देखना है कि 19 में से कितनी महिलाएं विधानसभा की देहरी लांघ पाती हैं। कांग्रेस की तरफ से विद्या स्टोक्स, आशा कुमारी जबकि भाजपा की तरफ से सरवीन चौधरी ही विधायक बन पाईं थीं। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने 4, भाजपा ने 7,

माकपा ने एक, एनसीपी ने एक, एसपी ने दो, एआईटीसी ने दो, बसपा ने तीन, एलजेपी ने दो, एचएसपी ने एक, एचएलपी ने दो महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा था और 9 निर्दलीय थीं। इनमें दो महिलाएं पांच हजार, सात 10 हजार, चार महिलाएं 20 हजार और चार ही 20 हजार से ज्यादा वोट ले पाई थीं। जाहिर है लोगों का समर्थन भी पुरुष उम्मीदवारों की तरफ रहा है। जहाँ तक इस बार के मतदान की बात है चुनाव में 37 लाख 21 हजार 647 वोट पड़े जिनमें 19,10,582 वोट महिलाओं और 18,11,061 वोट पुरुषों के हैं। यानी महिलाओं के ज्यादा। देखना है इस बार कितनी महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुँचती हैं।

बात आंकड़ों की

एक तरफ जहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर रही, वहीं मतदान में भी मुकाबला कड़ा रहा है। इस बार 0.10 फीसदी से पिछला रिकार्ड टूटा है। अबकी बार सूबे में मत प्रतिशत 74.61 फीसदी रहा जबकि 2003 में यह 74.51 था। इस बार सबसे अधिक मतदान होने का साल 2003 का रिकार्ड टूट गया। 2007 में मतदान करीब तीन फीसदी कम होकर 71.61 फीसदी रहा था, लेकिन 2012 में फिर इसमें बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर 73.51 फीसदी दर्ज किया गया था। पर वर्ष 2003 का रिकॉर्ड पिछले विस चुनाव में भी टूट नहीं पाया है।

चुनाव आयोग के मुताबिक सिरमौर जिला मतदान में अव्वल रहा और यहां पर सर्वाधिक 81.05 फीसदी वोटिंग हुई है और सबसे कम हमीरपुर जिला में 70.19 फीसदी वोट दर्ज किए गए हैं। सोलन जिला की दून विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक 88.95 फीसदी मतदान हुआ है और शिमला शहरी में सबसे कम 63.76 फीसद ने वोट डालें हैं। चंबा जिला की बात करें तो यहां पर73.21, कांगड़ा में 72.47, लाहौल स्पीति में 73.40, कुल्लू में 77.87, मंडी में 75.21, ऊना में 76.45, बिलासपुर में 82.04, सोलन में 77.44, शिमला में 72.68 व किन्नौर में 75.09फीसदी तक मतदान दर्ज किया गया है।

वर्ष 1971 में सबसे कम 49.45 फीसदी मतदान हुआ था और कांग्रेस सरकार सत्ता में आई थी। 1977 में 58.57 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था और इस बार जनसंघ ने सरकार बनाई थी।1982 में प्रदेश में खूब वोट बरसे और 71.06 फीसदी लोगों ने मतदान का प्रयोग कर कांग्रेस सरकार को सत्ता सौंपी। इसके बाद 1985 में भी वोट प्रतिशतता 70 फीसदी से अधिक रही और एक बार फिर कांग्रेस सत्तासीन हुई। वर्ष 1990 में सत्ता परिवर्तन हुआ था और भाजपा सरकार बनी थी। इस वर्ष मतदान प्रतिशतता 67.06 ही रह गई। 1993 के चुनाव में एक बार फिर 70 से अधिक वोटिंग हुई और कांग्रेस सरकार सत्ता में आई। वीरभद्र सिंह एक बार फिर सीएम बने। 1998 में भी 71.23 फीसदी मतदान दर्ज हुआ और इस बार हिविका की मदद से भाजपा ने सरकार बनाई।

साल 2003 में हुए चुनाव में मतदान का पिछला रेकार्ड टूटा और 74.51 फीसदी मतदान उस साल हुआ। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता की चाबी सौंपी। 2007 में मतदान करीब तीन फीसदी कम होकर 71.61 फीसदी रहा गया था और बीजेपी की सरकार प्रदेश में बनी थी। 2012 में एक बार फिर मतदान प्रतिशतता में इजाफा हुआ और कांग्रेस सत्तासीन हुई। इस बार भी बंपर वोटिंग प्रदेश में हुई है और देखना यह बाकि है कि इस बार जनता ने सत्ता किसे सौंपी है। इसके लिए 18 दिसंबर तक का इंजतार करना होगा।

भाजपा का सपना मुंगेरी लाल जैसा : वीरभद्र

मतदान के अगले दिन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह कांग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त दिखे। उन्होंने दावा किया की वे बड़े दावे नहीं करते लेकिन कांग्रेस सरकार बनाने लायक बहुमत ले लेगी। अपने निजी होली लॉज में तहलका से बातचीत में उन्होंने कि भाजपा 50 और 60 प्लस की बात कह रही है, ”लेकिन वह मुंगेरी लाल के हसीन सपने से ज्यादा और कुछ नहींÓÓ। उनका कहना था कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनेगी। कांग्रेस सत्ता में आएगी और अपने चुनाव घोषणा पत्र में की गई सभी घोषणाओं को पूरा करेगी। वीरभद्र सिंह ने कहा कि मतदान के बाद उन्हें थोड़ा आराम मिला है, लेकिन वे उनसे मिलने आ रहे लोगों से मुलाकात कर रहे हैं और उन्हें पूरा समय दे रहे हैं। वीरभद्र सिंह ने कहा कि राज्य के लोग उनके शुभचिंतक हैं और उन्हें मालूम था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। इसलिए वे भारी संख्या में मतदान करने के लिए आगे आए हैं और भारी मतदान किया है। उन्होंने फिर दोहराया कि राज्य में कांग्रेस सरकार बनाएगी और वे राज्य की जनता को स्थाई सरकार देंगे। सिंह चुनाव में हुए मतदान से पूरी तरह आश्वस्त दिखते हैं। वे आज कल अपने आवास पर आने वालों से मुलाकात कर रहे हैं साथ ही राज्यभर से हर हलके की फीडबैक ले रहे हैं। कई स्थानीय नेता भी उनके पास आकर अपना आकलन उन्हें देते रहे। कई लोगों ने फोन पर भी सीएम से बात की। जिलों से मिले फीडबैक के बाद सीएम मतदान को लेकर संतुष्ट हैं और वे सरकार के रिपीट होने को लेकर आश्वस्त हैं। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर कहा है कि चुनाव में मतदाताओं ने भारी संख्या में हिस्सा लिया, इसके लिए वे उनके आभारी हैं।

अगले महीने भाजपा की सरकार होगी : धूमल

भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल ने 74 फीसद से ज्यादा मतदान को भाजपा का पक्ष में बताया है। चुनाव के बाद तहलका से बातचीत में धूमल ने कहा कि 18 दिसंबर के बाद केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें होंगी। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के भाजपा के 60 प्लस मिशन पर आए बयान पर पूछे जाने पर धूमल ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हर किसी को अपना सपना सच्चा लगता है और दूसरों का सपना मुंगेरी लाल का। उन्होंने कहा कि वीरभद्र सिंह को आइना 18 दिसंबर को नज़र आ जाएगा। वीरभद्र सिंह ने बीजेपी के मिशन 60 प्लस को”मुंगेरी लाल का सपनाÓÓ बताया था। धूमल चुनावों के लिए दिन-रात एक करने के बाद अब समीरपुर स्थित अपने निवास पर दिनभर कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर और उनसे चुनावों से संबंधित फीडबैक ले रहे हैं। धूमल ने प्रदेश की जनता का भाजपा के पक्ष में किए गए मतदान के लिए आभार जताया। भाजपा नेता ने कहा कि नदियों में अपना काला धन बहाने वालों या जिन के खिलाफ जांच चल रही है, उन लोगों को ही नोटबंदी से समस्या हुई है। धूमल ने कहा है कि मोदी सरकार के किये गए नोटबंदी के ऐतिहासिक फैसले को एक साल पूरा हो चूका है और इससे आम नागरिक को कोई समस्या नहीं हुई । उन्होंने कहा कि नोटबंदी को लेकर कांग्रेस कह रही है कि इसमें गड़बड़ हुई है, वास्तव में कांग्रेस को काला धन ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिला, अब वह इस पर राजनीति कर रही है। धूमल ने कहा कि नोटबंदी के फैसले का कोई भी विपरीत असर हिमाचल प्रदेश में नहीं हुआ। न कोई एटीएम के आगे लाइनें लगी, न कोई अराजकता का माहौल फैला। ”सभी लोगों ने इस कड़े कदम का समर्थन किया और शांति से अपने पुराने नोट बदलवाए। नुकसान हुआ तो केवल कांग्रेस वालों का जिनका काला धन इसके नष्ट हो गया। आज नोटबंदी के एक साल बाद भी कांग्रेस अपनी कुंठा से उभर नहीं पाई है जबकि जनता का इनको बिलकुल भी समर्थन नहीं है।ÓÓ

 चुनाव साथ क्यों नहीं ?

भारत निर्वाचन आयोग को और स्वतंत्रता देने और इसकी स्वायत्ता बनाए रखने को लेकर सवाल उठे हैं। आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की तैनाती एक कमेटी के माध्यम से हो और आयोग में रहकर उन पर सवाल उठने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तर्ज पर हटाया जाए। इस पर सोशल वेलफेयर काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष राजेश्वर सिंह नेगी ने सवाल उठाए हैं। नेगी ने कहा कि उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है और जल्द ही वे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह से निर्वाचन आयोग में गतिविधियां चल रही हैं, उससे इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। उनका कहना था कि एक तरफ तो लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करने की बात की जा रही है, वहीं उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव सात चरणों में करवाए जाते हैं, यही नहीं, हिमाचल और गुजरात की विधानसभा की टर्म एक साथ समाप्त हो रही थी, लेकिन यहां चुनाव पहले करवाए जाते हैं और गुजरात में बाद में। नेगी ने कहा कि इससे निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। इसके लिए ज़रूरी है कि आयोग में और सुधार कर लाए जाएं और इसमें की जाने वाली तैनाती में और पारदर्शिता लाई जाए। इसके लिए जरूरी है कि आयोग में नियुक्ति एक कमेटी के माध्यम से हो और इसमें सभी को विश्वास में लिया जाए जैसे अन्य आटोनॉमस संस्थाओं के मुखिया की तैनाती के लिए किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग में कोई गलत करता है तो सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह उसे हटाने का प्रावधान होना चाहिए। उनका कहना था कि इस मामलों को लेकर पीएम मोदी को पत्र लिखा है और जल्द ही वे सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल भी दाखिल करने वाले हैं। उन्होंने नोटा को प्रभावी बनाने और आय के स्रोत को पारदर्शी बनाने की भी मांग की है।

पहला वोटर

किन्नौर जिले के श्याम शरण नेगी आम वोटर नहीं हैं। हिमाचल ही  नहीं  देश के लोग भी उन्हें जानते। वे हिमाचल के पहले वोटर हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में गूगल ने उनके ऊपर वीडियो बनाया। साल 1951 में श्याम शरण ने इतिहास बनाया जब उन्होंने हिमाचल के जिला किन्नौर के कल्पा मतदान केन्द्र पर मतदान किया तो वे स्वतंत्र भारत के पहले मतदाता बन गए। सरकारी स्कूल से शिक्षक के रूप में सेवा निवृत नेगी 100 साल के हैं। ब्रिटिश शासन के अंत के बाद वर्ष 1952 में चुनाव करवाने की घोषणा हुई । हिमाचल के उपरी इलाकों में बर्फबारी के कारण पांच महीने पहले ही चुनाव करवाने पड़े। दरअसल प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू चाहते थे कि देश के जनजातीय इलाके भी मतदान में हिस्सेदारी करें। इस कारण हिमाचल के उपरी इलाकों में पहले चुनाव करवाए गए। नेगी उसी इलाके के थे लिहाजा जब वे वोट देने कतार में सबसे आगे खड़े थे तो उन्हें भी मालूम नहीं था कि वे इतिहास बनाने जा रहे हैं। उन्होंने 1951 के आम चुनाव में मतदान किया। नेगी के परिवार में उनकी पत्नी, चार बेटे और पांच बेटियां हैं। खराब सेहत के बावजूद नेगी ने बूथ नंबर 51 पर वोट डाला। निर्वाचन विभाग ने देश के पहले वोटर के सम्मान के लिए रेड कारपेट बिछाया था। जनजातीय जिला किन्नौर के चिन्नी गांव में रहने वाले श्याम शरण नेगी सौ साल के हो चुके हैं। उन्होंने मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए वोट डालने का निश्चय किया था। पोलिंग बूथ पर पहुंचे श्याम शरण नेगी को फूलों का गुलदस्ता देकर एडीएम कल्पा अवनिंद्र कुमार ने उनका स्वागत किया। निर्वाचन अधिकारी और किन्नौर के डीसी एनके ल_ ने नेगी के पोलिंग बूथ तक पहुंचने का सारे इंतजाम किया था। इसके लिए एक खास टीम का गठन किया गया था। वोट डालने पहुंचे श्याम शरण नेगी ने एक बार फिर से वोट डालने का अवसर मिलने पर खुशी जताई। नेगी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए वोट डालना जरूरी है। सभी को इस अधिकार का प्रयोग करना चाहिए। गौरतलब है कि नेगी चुनाव आयोग के ब्रांड एंबेस्डर भी हैं। वे अपने जीवन में 29 बार वोट डाल चुके हैं।

 

नेताओं के बिगड़े बोल

विशेष संवाददाता

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के फरवरी 2017 के भाषण को याद करें। उन्होंने कहा था – मनमोहन सिंह (पूर्व प्रधानमंत्री) जानते हैं कि रेनकोट पहनकर स्नान कैसे करना है। अब नौ महीने बाद मोदी ने हिमाचल प्रदेश की एक चुनाव रैली में कहा- कांग्रेस शासन में ‘पाँच राक्षसÓ पैदा हो गए हैं। ये पांच राक्षस भविष्य की पीढ़ी को लूट रहे हैं। कांगड़ा जिले के रेहन में एक और रैली में उन्होंने कहा- ‘आपके बेटे कश्मीर में देश की हिफाजत करते हैं और उन्हें वहां पत्थर मारे जाते हैं। और हमारे कांग्रेस के नेता इन पत्थरबाजों का समर्थन करते हैं।

और राहुल गांधी ने रेहन रैली में कहा- यह गीता में लिखा है, ‘कर्म करो, फल की चिंता मत करोÓ, लेकिन मोदी का सिद्धांत है – फल खा जाओ और कर्म की चिंता मत करो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंडी रैली में कांग्रेस पर टिप्पणी में कहा – यह कुछ राजनेताओं की कहानी है जो संकीर्ण स्वार्थी सोच के लिए ‘मानव से दानवÓ बन रहे हैं।

पहाड़ी राज्य हिमाचल में चुनाव प्रचार के यह कुछ निम्न स्तर के भाषणों के उदाहरण हैं- उस प्रदेश में जिसे देव भूमि कहा जाता है। इस बार हिमाचल विधानसभा चुनाव में विभिन्न नेताओं के भाषणों में निम्न स्तर देखा गया। आम आदमी को भी यह आश्चर्यचकित करता है। कांगड़ा में लांबा गांव के एक 72 वर्षीय ग्रामीण कम्मा राम ने कहा यह चिंता की बात है कि खुद को नेता कहने वाले लोग ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा, खराब बात तो यह है कि विकास की बात भी यह लोग विरोधियों पर छींटाकशी करके करते हैं जिसे स्वस्थ नहीं माना जा सकता।

इस विषय पर जब लोगों को टिप्पणी करने के लिए कहा जाता है, तो वे कहते हैं कि आम तौर पर नेता कड़वे शब्दों का उपयोग करने लगे हैं। हमीरपुर जिले के सुजानपुर में स्थानीय नगर परिषद की एक स्वतंत्र सदस्य रहीं सोमा ने कहा कि ज्यादातर लोग नेताओंपर पर विश्वास नहीं करते हैं जब वे एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, विशेष रूप से चुनाव में। उनके अधिकांश आरोप सही नहीं होते और लोग इसके बारे में जानते हैं। ”लेकिन दिलचस्प यह है कि जब इन्हें बार-बार कहा जाता है तो वही लोग इस पर चर्चा करना शुरू करते हैं क्योंकि वे स्वयं भी पार्टी की राजनीति में शामिल हो जाते हैं।ÓÓ

जब मोदी ने रेहन की रैली में कांग्रेस को ‘हंसने वालों का क्लबÓ बताया, और बाद में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर व्यक्तिगत हमले में उन्हें जमानत पर चल रहे मुख्यमंत्री के रूप में वर्णित किया, तो सिंह ने ट्वीटर पर भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल पर हमला किया। सिंह ने कहा – ‘धूमलजी, भाजपा के भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाली लड़ाई पर आपकी टिप्पणी ने मुझे हंसा दिया। पिछली बार मैंने देखा था, आपके बेटे जमानत पर बाहर थे। अमित शाह और उनके बेटे की आमदनी में 16,000 गुना वृद्धि का चमत्कार भाजपा शासन में ही होता है।

कई लोग सोचते हैं कि मोदी की भाषा गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उस पर बाद रहे दबाव का नतीजा है। जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह मोदी की शैली है। यह एक रोचक बात है कि इस पहाड़ी राज्य के दूर दराज ग्रामों में भी गुजरात चुनावों के बारे में चर्चा है। अपने ही राज्य में चुनाव होने के बावजूद, हिमाचल के लोग जानना चाहते थे कि गुजरात में क्या होगा। कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस मजबूत हो जाएगी जबकि अन्य कहते हैं कि भाजपा जीतेगी। हालांकि इसका मार्जिन नीचे जा सकता है।

इस पहाड़ी राज्य में विधानसभा चुनावों में सोशल मीडिया ने भी इस बार बड़ी भूमिका निभाई। हिमाचल को केरल के बाद देश में उच्चतर शिक्षा दर वाला राज्य माना जाता है। दूर-दूर तक गांवों में मोबाइल फोन पहुंच गए हैं और लोगों को फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप जैसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चीजों को साझा करने में आनंद मिलता है। किन्नौर के आदिवासी जिले के रेकांग पियो में 34 वर्षीय रतन नेगी ने इस संवाददाता को बताया कि राष्ट्रीय नेताओं की रैलियों को मैदानी क्षेत्रों में ही आयोजित किया जाता है लिहाजा वे इंटरनेट पर मोदी और राहुल की रैलियों के भाषण देखते हैं। ”राजनीतिक दलों ने उन्हें वॉट्स पर भी साझा किया,ÓÓ उन्होंने कहा। नेताओं द्वारा भाषणों में सस्ते शब्दों के प्रयोग के बारे में पूछा जाने पर उन्होंने कहा कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस बात को अस्वीकार करेगा। उन्होंने कहा नेताओं को गरिमा बनाए रखनी चाहिए।

सरकारी स्कूल में शिक्षक चंपा नेगी ने हालांकि, राष्ट्रीय नेताओं द्वारा चुनाव रैलियों के लिए मुश्किल क्षेत्रों को नजरअंदाज करने पर चिंता व्यक्त की। ”यहां तक कि मोदी साहब अपने भाषणों में कहते हैं कि वह दूरतम गांव में रहने वाले व्यक्ति के दर्द को समझना चाहते है। लेकिन फिर क्यों वे चुनाव में हमारे पास नहीं आते, चंपा का सवाल था।

हालांकि, नेताओं का मानना है कि ज्यादातर समझदार नेताओं की भाषा संतुलित और सम्मानजनक होती है। हाँ कई बार लोगों को रिझाने के लिए चुटकलों की मदद नेता ले लेते हैं। ”जनता में बोलने के दौरान कांग्रेस नेता अधिक समझदार होते हैं लेकिन आप भाजपा नेताओं को सुनिए। यहां तक कि प्रधानमंत्री साहब उन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिनका उपयोग उनके स्तर के किसी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। हमीरपुर में यह कहना था कांग्रेस के प्रवक्ता प्रेम कौशल का। उधर भाजपा मीडिया सेल के प्रभारी गणेश दत्त ने कांग्रेस नेताओं द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर सवाल उठाया। ”कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया जी के कहे मौत के सौदागर जैसे शब्दों को न भूलें। उधर शिमला के पूर्व महापौर और सीपीएम नेता संजय चौहान ने हालांकि आरोप लगाया कि आम जनता की समस्याओं के साथ कांग्रेस और भाजपा दोनों का कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यही कारण है कि वे ऐसे बेहूदा चीज़ों पर अधिक ध्यान देते हैं। उनका किसानों और गरीबों से संबंधित मुद्दों से कुछ सरोकार नहीं होता।