कयास की धुंध में जीत हार के दावे | Tehelka Hindi

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कयास की धुंध में जीत हार के दावे

पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में विधानसभा चुनाव नौ नवंबर को हो गए। अड़सठ सदस्यों की विधानसभा के लिए राज्य के 74.61 फीसद मतदाताओं ने हिस्सेदारी की। यह मतदान किस पार्टी को राज्य में सत्ता संभालने के लिए न्यौतता है उसकी जानकारी अब 18 दिसंबर को ही होगी जब मतों की गणना होगी।
हिमाचल का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय नेता और केंद्रीय मंत्री यहां एक अर्से से चुनाव प्रचार कर रहे थे। आखिरी समय में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राज्य के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रेम कुमार धूमल का नाम प्रस्तावित किया। खुद प्रधानमंत्री ने प्रदेश का तीन बार दौरा किया। इसके विपरीत कांग्रेस के चुनाव प्रचार में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो एक बार के अलावा यहां और नहीं आए। उधर वामपंथियों को उम्मीद है कि हिमाचल में इस बार उनके भाग्य से छींका ज़रूर टूटेगा।

2017-11-30 , Issue 22 Volume 9

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अगले महीने की 18 तारीख को वोटिंग मशीनों से जब नतीजे निकलेंगे तब सूबे के पहाड़ों पर बर्फ की परत जम चुकी होगी। नतीजे इस ठण्ड को राजनीतिक गर्मी में बदल देंगे। मतदाता की खामोशी के बीच अभी तक के सबसे ज्यादा मतदान से कयास की ऐसी गहरी धुंध प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में फैला दी है कि राजनीति के धुरंधर भी जीत-हार की जुमलेबाजियों में गोते लगा रहे हैं। राजनीतिकों के लिए मतदाता का मूड भांपना उतना ही मुश्किल लग रहा है जैसे मेंढक को तराजू में तोलना।

भले दोनों प्रमुख दलों – भाजपा और कांग्रेस – ने अपनी अपनी जीत के दावे मतदान के बाद किए तो हैं, लेकिन दोनों के गुणा-भाग में भरोसा कम दावे की प्रतिध्वनि ज्य़ादा है। एक-एक सीट का आकलन दोनों दलों के बड़े नेताओं प्रेम कुमार धूमल और वीरभद्र सिंह के ड्राइंग रूमों में अपने $खास-उल-$खास लोगों के साथ हुआ है, लेकिन दोनों जगह से छनकर जो जानकारी आई है उसके मुताबिक दोनों ही दलों के अपने आकलन 31 से 37 सीटों की बीच फंसे हुए हैं। यदि यही स्थिति रही और आंकड़ों का गणित अटका तो निर्दलीय या माकपा आदि से जीतने वालों पर सरकार गठन का मसला आ अटकेगा। प्रदेश में 1998 के विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसी ही स्थिति बनी थी। वैसे हिमाचल में 68 सदस्यों की विधानसभा में सरकार बनाने यानी साधारण बहुमत के लिए 35 सीटें चाहिए।

प्रदेश में इस बार कोई लहर नहीं दिख रही थी। न तो मोदी का कोई करिश्मा दिख रहा था न वीरभद्र सिंह सरकार के प्रति किसी तरह की ’एंटी इंकम्बेंसीÓ। धूमल को भाजपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने के बाद ही भाजपा का चुनाव अभियान सघन हुआ। वोटर खामोश था। इस स्थिति ने सभी दलों के नेताओं को मजबूर किया कि वे अपने काडर को सक्रिय करें। राजनीति को समझने वालों का कहना है कि इसी कारण ज्यादा मतदान हुआ। इसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। प्रदेश सरकार में सूचना विभाग के निर्देशक रहे और राजनीतिक विश्लेषक बीडी शर्मा ने कहा कि चुनाव आयोग और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी ज्यादा मतदान का एक कारण है।

अब बात आती है प्रदेश में हर बार सरकार बदल देने की मतदाता की फितरत की। पिछले सालों में ऐसा अधिकतर बार हुआ है। क्या इस बार भी मतदाता ने इतिहास को दोहराया है, इस यक्ष प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं हैं। अलबत्ता भाजपा को भरोसा है कि मतदाता ने इसी परंपरा को निभाते हुए भाजपा को वोट किया है। कांग्रेस का दावा है कि इस बार प्रदेश में वोट वीरभद्र सिंह के ”आखिरी चुनावÓÓ के कारण उन्हें पड़े हैं। जबकि भाजपा कह रही है कि कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार और माफिया की सक्रियता से तंग जनता ने भाजपा और धूमल को वोट किया है।

भाजपा ने चुनाव मैदान में अपने बड़े नेताओं को बहुत ज्यादा संख्या में बुलाया। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन बार हिमाचल आए और कुल नौ चुनाव सभाएं कीं। इसके विपरीत कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ही बार हिमाचल आये और तीन चुनाव सभाएं उन्होंने कीं। इस तरह कहा जा सकता है कांग्रेस के चुनाव प्रचार का जिम्मा कमोवेश वीरभद्र सिंह ने ही उठाया।

मोदी के दौरों के बावजूद भाजपा के प्रचार का जिम्मा धूमल के इर्द गिर्द रहा। कहा जाता है कि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा को आगे करने के बाद जब भाजपा आलाकमान ने मह्सूस किया कि वे पार्टी की नैया पार नहीं लगा पाएंगे तो चुनाव से महज आठ दिन पहले धूमल को आगे करने का फैसला पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को करना पड़ा। ’तहलकाÓ के सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे पीएमओ को अपनी एजेंसियों से मिले इनपुट के बाद किया गया जिसमें कहा गया था कि धूमल को आगे न किया गया तो कांग्रेस अंतिम क्षणों में भाजपा पर ”भारीÓÓ पड़ सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि धूमल को आगे करने के बाद भाजपा का चुनाव प्रचार ज़मीनी स्तर पर काफी मजबूत हो गया।

चुनाव का गहराई से आकलन करने से जाहिर होता है कि 68 में से कम से कम एक दर्जन सीटें ऐसी हैं जहाँ कांटे का मुकाबला है। दोनों दलों के बागी खेल दिलचस्प बना रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि इनमें से आध दर्जन सीटों को भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने अपने आकलन में अपने पाले में रखा है। यही सीटें सरकार का रास्ता तय करने वाली हैं। कांगड़ा और मंडी जिले चुनाव में अहम रोल अदा करने वाले हैं। कांगड़ा में 2012 के चुनाव में भाजपा 15 में से सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी जबकि इस बार उसकी स्थिति बेहतर हुई है। मंडी में भी भाजपा भारी दिख रही है।

शिमला में आठ सीटें हैं और कांग्रेस यहाँ मजबूत दिख रही है जबकि एक सीट ठियोग पर माकपा विरोधियों को जबरदस्त टक्कर दे रही है। शिमला शहरी सीट भी दिलचस्प बनी हुई है जहाँ कांग्रेस के बागी निर्दलीय ने सभी की नींद हराम की है। इसके अलावा सिरमौर और सोलन में भी कांग्रेस वीरभद्र सिंह के अर्की से लडऩे के कारण फायदे में रह सकती है। धूमल के प्रभाव वाले हमीरपुर जिले में भाजपा कांग्रेस को पीछे धकेल सकती है। इसी जिले से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी लड़ रहे हैं। बिलासपुर, कुल्लू, ऊना और चम्बा में बराबर की टक्कर है जबकि तीन कबाइली सीटें भी दोनों में बंटने के आसार हैं। फैसला तीन जिलों काँगड़ा (15), मंडी (10) और शिमला (8) जिलों से होना है जहाँ कुल 68 सीटों में से 33 सीटें हैं।

दोनों दलों के आकलन के बावजूद कुछ चुनाव विश्लेषक मानते है कि ज्यादा मतदान किसी एक दल के पक्ष में हुआ भी हो सकता है। वैसे पिछले चुनाव कांग्रेस जीत के बावजूद 35 सीटें हासिल कर पाई थी जबकि 2007 में भाजपा ने 43 सीटें जीती थीं। वरिष्ठ पत्रकार और चुनाव विश्लेषक एसपी शर्मा का आकलन है कि कांग्रेस चुनाव में भाजपा को चौंका सकती है। इसके लिए वे तीन कारण गिनाते हैं। पहला यह कि मोदी सरकार के प्रति लोगों की महंगाई और जीएसटी के कारण नाराजगी, दूसरी वीरभद्र सिंह सरकार के प्रति एंटी इंकम्बेंसी न दिखना और तीसरे आखिरी चुनाव के कारण वीरभद्र सिंह के प्रति जनता की सहानभूति।

जबकि राजनीतिक विश्लेषक बीडी शर्मा मानते हैं कि निश्चित ही भाजपा का इस चुनाव में ”एजÓÓ था और यदि एक पक्षीय नतीजा हुआ तो यह भाजपा के पक्ष में होगा और वह 40 से 45 के बीच सीटें जीत सकती है। अपने दावे के लिए वे बताते हैं कि प्रदेश में सरकार हर बार बदल जाती है, दूसरे केंद्र में भाजपा सरकार होने से प्रदेश के लोगों को लगता है ज्यादा विकास योजनाएं सूबे में आएंगी और तीसरे धूमल को आगे करने से भाजपा को लाभ मिला।

स्ट्रांग रूम में ईवीएम

चुनाव के बाद अब जिम्मा 337 प्रत्याशियों के भविष्य की सुरक्षा का है। ऐसे में अर्ध सैनिक बालों ने कमर कस ली है। बहरहाल, प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ईवीएम को सुरक्षा के बीच स्ट्रांग रूम तक पहुंचाया गया है। दूरदराज और कबायली इलाकों से मशीनों को हेलिकॉप्टर के माध्यम से सही जगह तक लाया जा रहा है। गौर रहे कि प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में अलग-अलग स्ट्रांग रूम बनाए गए हैं। स्ट्रांग रूम में ईवीएम के पहुंचने के बाद राजनीतिक दलों को स्क्रूटनी के लिए बुलाया गया। निर्वाचव आयोग के पर्यावेक्षक की मौजूदगी में मशीनों को चैक किया गया और फिर इन्हें स्ट्रांग रूम में कैद कर दिया गया। अब अगले 38 दिनों तक यह ईवीएम मशीनें कड़ी सुरक्षा के बीच रहेंगी। ईवीएम की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पैरा मिलिट्री फोर्स के जवान तैनात किए गए हैं।

महिलाएं : वोट देने में आगेजीतने में पीछे

चुनावों में मतदान करने में हमेशा आगे रहने वालीं हिमाचल की महिलाएं विधानसभा की दहलीज लांघने में हर बार पिछड़ जाती हैं। एक तो दोनों प्रमुख दल उन्हें टिकट कम देते हैं ऊपर से उनकी जीत का प्रतिशत भी कम रहता है। पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा इस बार कम महिलाएं चुनावी मैदान में उतरीं। चुनाव में 19 महिलाएं कूदी जबकि वर्ष 2012 में यह आंकड़ा 34 था। साल 2012 में 34 महिलाएं मैदान में उत्तरी थीं लेकिन महज तीन ही विधानसभा पहुँच पाईं। इस बार देखना है कि 19 में से कितनी महिलाएं विधानसभा की देहरी लांघ पाती हैं। कांग्रेस की तरफ से विद्या स्टोक्स, आशा कुमारी जबकि भाजपा की तरफ से सरवीन चौधरी ही विधायक बन पाईं थीं। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने 4, भाजपा ने 7,

माकपा ने एक, एनसीपी ने एक, एसपी ने दो, एआईटीसी ने दो, बसपा ने तीन, एलजेपी ने दो, एचएसपी ने एक, एचएलपी ने दो महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा था और 9 निर्दलीय थीं। इनमें दो महिलाएं पांच हजार, सात 10 हजार, चार महिलाएं 20 हजार और चार ही 20 हजार से ज्यादा वोट ले पाई थीं। जाहिर है लोगों का समर्थन भी पुरुष उम्मीदवारों की तरफ रहा है। जहाँ तक इस बार के मतदान की बात है चुनाव में 37 लाख 21 हजार 647 वोट पड़े जिनमें 19,10,582 वोट महिलाओं और 18,11,061 वोट पुरुषों के हैं। यानी महिलाओं के ज्यादा। देखना है इस बार कितनी महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुँचती हैं।

बात आंकड़ों की

एक तरफ जहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर रही, वहीं मतदान में भी मुकाबला कड़ा रहा है। इस बार 0.10 फीसदी से पिछला रिकार्ड टूटा है। अबकी बार सूबे में मत प्रतिशत 74.61 फीसदी रहा जबकि 2003 में यह 74.51 था। इस बार सबसे अधिक मतदान होने का साल 2003 का रिकार्ड टूट गया। 2007 में मतदान करीब तीन फीसदी कम होकर 71.61 फीसदी रहा था, लेकिन 2012 में फिर इसमें बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर 73.51 फीसदी दर्ज किया गया था। पर वर्ष 2003 का रिकॉर्ड पिछले विस चुनाव में भी टूट नहीं पाया है।

चुनाव आयोग के मुताबिक सिरमौर जिला मतदान में अव्वल रहा और यहां पर सर्वाधिक 81.05 फीसदी वोटिंग हुई है और सबसे कम हमीरपुर जिला में 70.19 फीसदी वोट दर्ज किए गए हैं। सोलन जिला की दून विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक 88.95 फीसदी मतदान हुआ है और शिमला शहरी में सबसे कम 63.76 फीसद ने वोट डालें हैं। चंबा जिला की बात करें तो यहां पर73.21, कांगड़ा में 72.47, लाहौल स्पीति में 73.40, कुल्लू में 77.87, मंडी में 75.21, ऊना में 76.45, बिलासपुर में 82.04, सोलन में 77.44, शिमला में 72.68 व किन्नौर में 75.09फीसदी तक मतदान दर्ज किया गया है।

वर्ष 1971 में सबसे कम 49.45 फीसदी मतदान हुआ था और कांग्रेस सरकार सत्ता में आई थी। 1977 में 58.57 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था और इस बार जनसंघ ने सरकार बनाई थी।1982 में प्रदेश में खूब वोट बरसे और 71.06 फीसदी लोगों ने मतदान का प्रयोग कर कांग्रेस सरकार को सत्ता सौंपी। इसके बाद 1985 में भी वोट प्रतिशतता 70 फीसदी से अधिक रही और एक बार फिर कांग्रेस सत्तासीन हुई। वर्ष 1990 में सत्ता परिवर्तन हुआ था और भाजपा सरकार बनी थी। इस वर्ष मतदान प्रतिशतता 67.06 ही रह गई। 1993 के चुनाव में एक बार फिर 70 से अधिक वोटिंग हुई और कांग्रेस सरकार सत्ता में आई। वीरभद्र सिंह एक बार फिर सीएम बने। 1998 में भी 71.23 फीसदी मतदान दर्ज हुआ और इस बार हिविका की मदद से भाजपा ने सरकार बनाई।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 9 Issue 22, Dated 30 November 2017)

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