‘उस सवाल का जवाब आज भी नहीं है…’

एक डॉक्टर को यह कहा गया कि वे हमें इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के वार्ड में ले जाएं. वे हमें एक कमरे में ले गए जिसके बाहर दरवाजे के ठीक ऊपर हरे रंग का एक बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था- इंसेफलाइटिस वार्ड. हम कमरे में घुसे. वहां की हालत भी दूसरे कमरों से अलग नहीं थी. तमाम बिस्तरों पर बच्चे लेटे हुए थे. उनके नाक, मुंह और हाथों में तरह-तरह के पाइप लगे हुए थे जो कमरे के सन्नाटे को और घना बना रहे थे. मुझे तस्वीरें लेनी थीं, लेकिन मैं इस खामोशी को भंग करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. मुझे याद है कि पहले 10-15 मिनट तक तो मैंने कोई तस्वीर नहीं खींची.

मैं एक कोने में खड़ा कमरे का मुआयना कर रहा था कि कहां से तस्वीरें लेना ठीक होगा. मेरी नजर एक बिस्तर पर लेटी लड़की पर पड़ी. छह या सात साल की उम्र होगी उसकी. पूरा शरीर काला पड़ चुका था, बस उसकी आंखें चमक रही थीं और इस नीम कालेपन में उन आंखों की सफेदी कुछ ज्यादा ही उभर आई थी. मैं उसके करीब गया. वह एकटक ऊपर की तरफ देख रही थी. मैं टॉप एंगल से उसकी तस्वीर उतारने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी बड़ी-बड़ी आंखें लेंस के भीतर से और साफ नजर आने लगतीं. मानो वे मुझसे पूछ रही थीं कि क्यों ले रहे हो मेरी तस्वीर. तुम्हें नजर नहीं आ रहा मैं कितनी बीमार हूं!

तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उसकी तस्वीर नहीं ले सका. वे आंखें मेरे पूरे वजूद पर छाने लगी थीं. मैं वहां से हट ही रहा था कि साथ आए डॉक्टर की बातें सुनकर कांप उठा. उसने पूरी बेफिक्री से कहा, ‘यह लड़की दिमागी तौर पर मर चुकी है. आप चाहें तो फोटो ले सकते हैं उसे कुछ नहीं नजर आ रहा. एक-दो दिन में यह शारीरिक तौर पर भी मर जाएगी.’

डॉक्टर ने मुझे जो कुछ कहा वह उसकी कोशिश थी मुझे सामान्य बनाने की, लेकिन इस बात से मैं पूरी तरह असामान्य हो गया. हालांकि पेशेवर होने के नाते मैंने कुछ तस्वीरें लाजिमी तौर पर लीं. बाद में भी मैंने कभी जानना नहीं चाहा कि उस बच्ची का क्या हुआ, शायद मर गई होगी. वह तस्वीर अब भी मेरे पास है. खाली वक्त में मैं अपने कैमरे में तमाम तस्वीरें देखता हुआ अतीत को जीता हूं लेकिन उस तस्वीर पर मैं एक पल भी नहीं ठहरता. जानते हैं क्यों? क्योंकि उन आंखों में जो सवाल हैं उनका जवाब मेरे पास अब भी नहीं है!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here