इशरत जहां मुठभेड़ मामला: मोदी को मालूम था

इशरत जहां मुठभेड़ मामले की आंच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचती दिख रही है. सीबीआई जल्द ही अदालत में एक शपथपत्र दाखिल करने जा रही है. इसके मुताबिक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पुलिस के उस षड़यंत्र की पूरी जानकारी थी जिसमें वह इशरत जहां समेत चार लोगों की हत्या करके उन्हें आतंकवादी घोषित करने वाली थी. जिस पुलिस अधिकारी की यह स्वीकारोक्ति है, उसका दावा है कि उसने उस समय दो अधिकारियों को इस बारे में बातचीत करते सुना था. इनमें से एक अधिकारी खुफिया ब्यूरो (आईबी) का है और दूसरा पुलिस का. दोनों के बारे में कहा जाता है कि वे मोदी के बेहद करीबी हैं.

संभावना है कि चार जुलाई को सीबीआई आरोपपत्र के साथ ही इस स्वीकारोक्ति को भी अदालत  के सामने रखेगी. यह बयान देने वाला पुलिस अधिकारी खुद इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या का आरोपित है. इस कथित मुठभेड़ को 15 जून, 2004 को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने अंजाम दिया था जिसमें इशरत जहां (19 वर्ष) समेत चार कथित आतंकवादी मारे गए थे. पुलिस का दावा था कि वे सभी मोदी की हत्या करने आए थे.
जिस कथित बातचीत का जिक्र सीबीआई कर रही है, उसमें दोनों अधिकारियों ने कहीं मोदी का नाम नहीं लिया है. सूत्रों के मुताबिक बातचीत आईबी में विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार और क्राइम ब्रांच अधिकारी डीजी वंजारा के बीच है. जिस अधिकारी द्वारा यह शपथपत्र दिया जा रहा है, वह खुद आईपीएस कैडर से है. अधिकारी के मुताबिक वंजारा ने कुमार को उसकी मौजूदगी में बताया था कि चारों की हत्या के लिए सफेद दाढ़ी और काली दाढ़ी ने हरी झंडी दे दी है. सीबीआई का मानना है कि सफेद दाढ़ी शब्द मोदी और काली दाढ़ी अमित शाह के लिए इस्तेमाल किया था. शाह उस वक्त मोदी मंत्रिमंडल में गृह राज्यमंत्री थे और राज्य की पुलिस उनके अधीन थी. मोदी ने गृह मंत्रालय अपने हाथ में रखा था. सीबीआई इस अधिकारी की स्वीकारोक्ति के आधार पर इशरत जहां मुठभेड़ में मोदी की भूमिका की जांच करना चाहती है. यह बयान सीपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ है और अदालत में इसे बतौर सबूत इस्तेमाल किया जा सकता है. एक सीबीआई अधिकारी बताते हैं कि वे इस मामले में आईबी अधिकारी कुमार को आरोपित बनाने जा रहे हैं.

सीबीआई द्वारा दाखिल होने वाले आरोपपत्र में यह दावा भी किया जाएगा कि मारे गए चार कथित आतंकियों का सरगना जावेद अहमद शेख असल में कुमार का मुखबिर था और कुमार उस समय खुफिया ब्यूरो की गुजरात इकाई के प्रमुख थे. सबूत इशारा करते हैं कि कुमार ने जावेद को यह कह कर अहमदाबाद बुलाया था कि उसके लिए कुछ काम है और फिर उन्होंने जावेद समेत चारों की हत्या करवा दी जिनमें इशरत जहां भी शामिल थी. 18 जून को सीबीआई ने कुमार से पूछताछ की थी. कुमार इस समय गांधीनगर में खुफिया ब्यूरो के विशेष निदेशक पद पर तैनात हैं. सीबीआई अगले कुछ दिनों में कुमार को गिरफ्तार कर सकती है. तहलका की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई के पास एक से ज्यादा पुलिस अधिकारियों की स्वीकारोक्तियां हैं जिनमें उन्होंने कुमार को हत्याकांड का कर्ताधर्ता बताया है.

सीबीआई के पास एक गोपनीय ऑडियो टेप है. यह टेप इस मामले के एक आरोपित पुलिस अधिकारी जीएल सिंघल ने नवंबर, 2011 में रिकॉर्ड किया था. टेप में सिंघल की मोदी सरकार के महत्वपूर्ण लोगों के साथ बातचीत है. ये लोग चर्चा कर रहे हैं कि कैसे मामले को कमजोर किया जाए और आरोपित पुलिस अधिकारियों को बचाया जाए. तहलका के पास बातचीत में शामिल कुछ लोगों की जानकारी है. इनके नाम हैं प्रदीप सिंह जडेजा (संसदीय कार्यमंत्री) और भुपिंदर चुडास्मा (शिक्षा मंत्री). बातचीत में शामिल अन्य लोग हैं तत्कालीन गृह राज्यमंत्री प्रफुल पटेल जो पिछले  दिसंबर में विधानसभा चुनाव में हारकर सरकार से बाहर हो गए, सीजी मुर्मू जो मोदी के नजदीकी आईपीएस अधिकारी हैं, एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी और एडिशनल एडवोकेट जनरल तुषार मेहता. यह बैठक गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा स्थापित एसआईटी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट जमा करने से एक दिन पहले हुई थी. टेप में त्रिवेदी को कहते सुना जा सकता है कि अगर कल एसआईटी इशरत जहां मुठभेड़ को फर्जी करार देती है तो हम सबको मिलकर कहना होगा कि एसआईटी ही फर्जी है. मुर्मू कहते हैं कि राज्य अथवा उसके अधिकारियों को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए. अगले दिन पेश की गई रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा कि पुलिस ने इन चार लोगों का अपहरण करके उनकी हत्या कर दी.

मोदी सरकार लगातार कहती रही कि शेख, मुंबई के निकट एक कॉलेज की छात्रा इशरत जहां तथा दो अन्य व्यक्ति जो कथित तौर पर पाकिस्तानी थे, सभी आतंकवादी थे. उसका दावा है कि पुलिस ने अहमदाबाद के बाहर उनको रोकने की कोशिश की जिसके बाद हुई गोलीबारी में वे मारे गए. खुफिया ब्यूरो ने जानकारी दी थी कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने गुजरात में 2002 में मुस्लिमों के नरसंहार का बदला लेने के लिए चार आतंकियों को भेजा है. सीबीआई के पास अधिकारियों की ऐसी स्वीकारोक्तियां हैं जिनमें कहा गया है कि कथित तौर पर कुमार ने इशरत जहां से उस वक्त मुलाकात की थी जब मारे जाने से पहले वह अवैध पुलिस हिरासत में थी. गवाहियों के मुताबिक मृतकों के पास मिली एके 47 राइफल भी कुमार के खुफिया ब्यूरो के कार्यालय से लाकर कथित आतंकियों के शवों के साथ रखी गई थी.

[box]पुलिस अधिकारी सिंघल के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने इकलौते बेटे की आत्महत्या के बाद आखिरकार सच बोलने का फैसला किया[/box]

आरोपपत्र से यह भी पता चलता है कि मारे गए दो अन्य व्यक्ति जीशान जौहर और अमजद अली राणा पाकिस्तानी नहीं थे. वे संभवत: जम्मू और कश्मीर के रहने वाले थे व आतंकी समूहों से ताल्लुक रखते थे. आरोपपत्र के अनुसार कुमार ने पहले दोनों को अपने मुखबिर शेख से मिलवाया और उसे ‘प्रोत्साहित’ किया कि वह उनके संपर्क में रहे. सीबीआई सूत्रों के मुताबिक हत्या के पहले कुमार ने शेख से कहा कि वह दोनों को अहमदाबाद ले जाए, शेख ने ऐसा ही किया. सीबीआई न्यायालय से और वक्त मांगेगी ताकि यह जांच हो सके कि आखिर उन चारों को कुमार से कैसे मिलवाया गया.

सीबीआई का कहना है कि कुमार ने तीनों व्यक्तियों को पाकिस्तान में अपने लोगों को फोन करने को कहा और उनकी बातचीत रिकॉर्ड की. स्रोतों के मुताबिक यही वह बातचीत है जिसे एक समाचार चैनल ने पिछले दिनों प्रसारित किया और कहा कि वे आतंकवादी थे और मोदी को मारने जा रहे थे. बातचीत में इस्तेमाल मोबाइल उनके शवों के पास रख दिए गए थे. सीबीआई का कहना है कि कुमार ने शेख के अहमदाबाद आने से पहले ही पूरी तैयारी कर ली थी जिसके बाद हत्याओं को अंजाम दिया गया. कुमार ने ही शेख के लखनऊ जाने और एक देसी कट्टा खरीदने का इंतजाम करवाया. उनके आदेश पर ही वह महाराष्ट्र में औरंगाबाद गया. वह जिन होटलों में रुका हर जगह उसने कुमार के निर्देश के मुताबिक ही काल्पनिक नाम का इस्तेमाल किया.

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मुठभेड़ की कड़ियां 
वंजारा और गृह राज्यमंत्री शाह दोनों पर एक अन्य हत्याकांड का आरोप भी है. यह मामला है वर्ष 2005 में हुए सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या का. इन्हें भी आतंकवादी बताकर एक मुठभेड़ में मार दिया गया था. वंजारा को इन हत्याओं के लिए2004 और 2005 में गिरफ्तार भी किया गया. शाह को 2010 में इसी हत्याकांड के लिए गिरफ्तार किया गया और उनको तीन महीने बाद जमानत मिल गई. दो महीने पहले भाजपा ने शाह को उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रभारी बनाया था. लेकिन उनके लिए अब एक नई मुसीबत भी खड़ी हो सकती है. सीबीआई एक दूसरे मामले में उनको पूछताछ के लिए तलब करने की योजना बना रही है. यह सादिक जमाल मुठभेड़ मामला है. यह घटना 2003 में हुई थी जब अहमदाबाद में पुलिस ने जमाल को आतंकी करार देते हुए उसे एक मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था.

सीबीआई के मुताबिक शाह, जमाल की हत्या के दिन कुमार के संपर्क में थे. कुमार उन अधिकारियों में शामिल हैं जिनकी इस मामले में अहम भूमिका रही थी.  सीबीआई इस समय उन चार मामलों की जांच कर रही है जिनमें गुजरात पुलिस पर लोगों को मार कर उनको आतंकवादी बताने का आरोप है. सीबीआई का कहना है कि जमाल की हत्या के मामले में कुमार पर साफ आरोप हैं. महाराष्ट्र के पूर्व और वर्तमान खुफिया अधिकारियों ने उनके खिलाफ गवाही भी दी है.

जांच एजेंसी ने इस राज्य के दो वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों दत्ता पल्सागिकर और गुरुराज सवागत्ती से पूछताछ की है. सीबीआई के मुताबिक इन अधिकारियों ने जमाल के आतंकवादी होने के बारे में गलत खुफिया जानकारी दी और इस तरह हत्या के इस षड़यंत्र में शामिल हुए. जांच एजेंसी ने मुंबई पुलिस के निलंबित अधिकारी प्रदीप शर्मा से भी पूछताछ की जिन्हें कभी 100 से भी अधिक कथित अपराधियों को मुठभेड़ में मारने की वजह से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तौर पर जाना जाता था. जमाल गुजरात पुलिस को सौंपे जाने के पहले शर्मा की हिरासत में था. शर्मा इसी तरह के फर्जी मुठभेड़ मामले में हत्या के आरोप में मुंबई में सजा काट रहे हैं.

सीबीआई ने गुजरात में जमाल की हत्या के मामले में डीएसपी तरुण बारोट को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है जिन्होंने कथित तौर पर मुंबई से जमाल की हिरासत हासिल की थी. बारोट 2004 की एक मुठभेड़ के मामले में भी आरोपित हैं. कुमार के खिलाफ सीबीआई की जांच काफी समय से लंबित रही है. एक साल तक खुफिया ब्यूरो कुमार से सीबीआई की पूछताछ की राह में रोड़ा बना रहा.

लेकिन जब जमाल और इशरत जहां दोनों हत्याकांडों में कुमार की भूमिका स्पष्ट होने लगी तो खुफिया ब्यूरो के प्रमुख आसिफ इब्राहीम, सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा और केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह ने कई दिन तक मुलाकात के बाद आगे की राह निकाली. जानकारी के मुतबिक कुमार जून में सीबीआई से मुलाकात के लिए गांधीनगर तब पहुंचे जब उनके आला अधिकारियों ने आश्वस्त किया कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. इसके विरोधस्वरूप सतीश वर्मा नामक सीबीआई अधिकारी ने जांच में शामिल होने से इनकार कर दिया. वर्मा वही अधिकारी हैं जिन पर गुजरात सरकार ने अपने खिलाफ पक्षपाती होने का आरोप लगाया है.

सिंघल के बयान को सीबीआई बहुत अहम मानकर चल रही है. एक समय के जाने-माने पुलिस अधिकारी रहे सिंघल की छवि अब धूमिल हो चुकी है. कहा जाता है कि इस साल उनके 17 साल के इकलौते बेटे द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद उन्होंने सच बोलने का फैसला किया. उन्होंने सीबीआई अधिकारी से कहा, ‘यह ऊपर वाले का इंसाफ है सर, मैंने एक निर्दोष को मारा और मुझे उसकी सजा मिली.’

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