इजहार-ए-इश्क का फच्चर

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आनंद नॉरम

गालिब का इश्क, काम के आदमी गालिब को निकम्मा बनाता है. पता नहीं आपका इश्क आपको क्या बनाता है! चलिए हम मान लेते हैं कि वह आपको भी निकम्मा बनाता है. इश्क चाहे आपको कितना भी निकम्मा बनाए, मगर एक काम तो आपको करना ही पडे़गा, भले ही वह काम आप ‘मरता क्या न करता’ की तर्ज पर करें. मोहब्बत की है, तो मोहब्बत का इजहार भी तो करना होगा, क्योंकि बिना इजहार के इश्क जैसे बिन राह की मंजिल. जैसे बिन सिंदूर के सुहागन. जैसे बिन सेहरे के दूल्हा. जैसे किसी को अंधेरे में मारी गई आंख.

इश्क पर बहुत कुछ लिखा-बोला जा चुका है, तो इश्क पर कुछ न बोल कर इजहार-ए-इश्क के मीठे और प्यारे तरीकों के सफर पर एक लांग ड्राइव पर चलते हैं. हां मगर प्यार से!

सबसे पहले आदम और ईव के प्रेम का साधन कहिए या साक्षी या तरीका, सेब बना. यह इजहार-ए-मोहब्बत न होता, तो आज न आप होते न हम. अति प्राचीन प्रेमियों ने इजहार-ए-इश्क के लिए प्रकृति को चुना. मेघ जो बरसते थे, गरजते थे, वे प्रेमियों के लिए ओवर टाइम करने लगे. प्रेमी अपनी शकुंतला से अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए मेघों को दूत बना कर भेजा करते. इसी काम के लिए किसी प्रेमी ने परिंदों से चाकरी करवाई. किसी ने हवाओं को अपना हरकारा बनाया. किसी ने चांद की सेवा ली. किसी ने यह ठेका समुंदर की लहरों को दिया, तो किसी ने सितारों को अपना अनुचर बनाया, अपना प्रेम संदेश प्रीतम प्यारे तक पहुंचाने के लिए. यहां तक कि अगम पेड़ों को भी नहीं छोड़ा गया. उनको भी जोत दिया करते थे प्रेमी लोग अपने ह्नदय के उद्गार व्यक्त करने के लिए. क्या करते बेचारे! आज की तरह इतनी तो न सुविधा थी, न आधुनिक संचार व्यवस्था.

प्रेम कहानियों में लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद की सुपर हिट जोड़ियां हैं, मगर क्या किसी ने सोचा है कि इनके बीच इजहार-ए-इश्क कैसे हुआ? साहबान, तब जमाना बहुत बेरहम, बेदर्द था (कमोबेश जमाना अब भी अपने व्यवहार में ऐसा ही है, ये जमाना कब सुधरेगा!) तो इजहार-ए-इश्क का पावन,  महती और रिस्की कार्य सर-आंखों पर आंखों ने लिया. आंखों-आंखों में प्यार होता था और आंखों ही आंखों में इजहार. जमाना कितना भी नजर रखे या नजर लगाए, नजर गड़ाए प्रेमियों पर, मगर नजरों को उधर जाने से कौन रोक सका है जिधर वे जाना चाहती हैं, जिधर उनका प्रियतम है. सीधी-सी बात यह है,  ‘इजहार हुआ इनकार हुआ, कुछ टूट गए कुछ हार गए’,

‘इजहार-ए- मोहब्बत रह-रह के आंखों से पिया दीवानों ने.’ नजरों ने बड़ी मदद की प्रेमियों की. खास तौर से कच्चे दिल के प्रेमियों की क्योंकि नजरों की एक खासियत है कि वे अपना काम तो कर जाती हैं और मौका-ए-वारदात पर कोई सबूत भी नहीं छोड़तीं. नजरें ही वे दोस्त, सखी होती थी जो प्रेमियों का हाल-ए-दिल बयां करती थीं. होंठ जब-जब दिल की बात कहने में हिचकिचाए, थर्राए, तो नजरों ने उनकी भूमिका बखूबी अदा की और मौन भाषा में कह दिया कि हमें तुमसे प्यार है. अगर प्रेमियों को उर्दू जुबान आती (माशाअल्हा! ), तो कहा, हमें तुमसे मोहब्बत है. अगर अंग्रेजी लैंग्वेज आती तो कहा, आई लव यू. कहने का मतलब कि नजरों को कोई भी भाषा सीखने की जरूरत नहीं, क्योंकि वे हमेशा दिल की भाषा बोलती हैं. इसलिए इजहार-ए-इश्क के लिए नजर एक अति महत्वपूर्ण जरिया बनी. जो आज भी बनी हुई है.

नजरों के अतिरिक्त अपने प्रेम को व्यक्त करने का एक तरीका अपने मित्र या उनकी सखी से अपने दिल की बात कहलवाना या कहना था. कई बार कई प्रेमियों ने अपने इजहार-ए-मोहब्बत के लिए अपने-अपनी विश्वसनीय दोस्त-सखी की सहायता ली. लेकिन इजहार-ए-मोहब्बत का यह तरीका खतरों से खाली नहीं था. एक तो इसमंे प्रेम त्रिकोण बनने का खतरा बना रहता था. दूसरे, सनम की रुसवाई का डर बना रहता था.

तीसरे विश्वसनीय दोस्त होना सबके भाग्य में कहां बदा रहता है!

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