‘आलोचक बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं’

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आप हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं में लिखते हैं. सेक्स को लेकर ज्यादा वर्जनाएं किस भाषा में हैं?
उर्दू में तो सेक्स तरक्की पसंद विषय माना जाने लगा है. इसके लिए मैं मंटो का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने समय में ही इसे आजादी दिला दी थी. कुछ उसी तरह से जैसे अंग्रेजी में डीएच लॉरेंस ने. हिंदी में यह आजादी अब तक नहीं मिल सकी है, हालांकि तेजी से बदलाव हुए हैं. करीब तीन दशक पहले मैंने राजेंद्र यादव के पास ‘हंस’ में छापने के लिए अपनी कहानी ‘बगोले’ भेजी थी. उस कहानी में एक ब्वॉय हंटर अभिजात महिला की कहानी है, जो अपने जाल में मर्दों को फांसती है. एक रोज वह एक 17 साल के लड़के को फांसती है और अपने पास लड़के के आने के पहले तमाम तरह की कल्पनाओं में डूबी रहती है. सोचती है कि वह उस लड़के को धीरे-धीरे सभी तरीके बताएगी लेकिन जब वह किशोर आता है तो महिला को ही कायदे समझाने-सिखाने लगता है. महिला को सदमा लगता है, वह उसे भगा देती है. राजेंद्र यादव ने जवाब में लिखा कि शमोएल, कहानी को नहीं छाप सकता, पाठक नाराज हो जाएंगे. उसके बाद इंटरनेट युग आया तो मैंने इस पर कहानी लिखने की सोची. मैंने चैटिंग को जाना. इंटरनेट पर बिखरे कई सेक्स ग्रुप से जुड़ा और बाद में ‘सेक्सुअल चैटिंग’ पर एक कहानी ‘अनकबूत’ लिखी. मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि अनकबूत में बगोले से ज्यादा सेक्सुअल फैंटेसी थी और तमाम तरह के वर्जित शब्द भी लेकिन राजेंद्र यादव ने उसे सहर्ष छापा और कहा भी कि मजेदार और बेजोड़ कहानी है. कहने का मतलब यह कि वक्त के बदलाव के साथ मन-मिजाज बदलता है.

हिंदीवाले अनुवाद में तो लॉरेंस की कृति  ‘लेडी चैटर्ली का प्रेमी’  ब्लादीमीर नाबाकोव की  ‘लोलिता’  पढ़ना चाहते हैं लेकिन कोई हिंदी लेखक ऐसा ही लिखे तो फिर हाय-तौबा क्यों?
दरअसल इसमें सबसे बड़ा पेंच तो आलोचक फंसाते हैं. दुर्भाग्य से हिंदी आलोचना में एक प्रेमचंदी घेरा बना हुआ है, उस घेरे से बाहर निकलने ही नहीं देना चाहते किसी को. हालांकि उदय प्रकाश, अखिलेश जैसे रचनाकारों ने उस घेरे को तोड़ा है. अब हिंदी के समाज को कौन समझाए कि अपने यहां जिन रचनाओं में हुस्न का बखान दिल खोलकर हुआ है उन्हें ही क्लासिकल माना जाता है. कुमार संभव, गीत गोविंद, अलिफ लैला आदि में क्या है. बेहद ही खूबसूरत तरीके से हुस्न का बखान.

आप आलोचकों को दोष दे रहे हैं. आपकी बातों से लगता है कि हिंदी साहित्य में आलोचक एक गैरजरूरी तत्व की तरह हैं.
बेशक. सच कहूं तो आलोचक बेपेंदी के लोटे होते हैं. आलोचक को माली की भूमिका में होना चाहिए लेकिन अधिकांश आलोचक लकड़हारे की भूमिका में रहना चाहते हैं. मेरे हिसाब से तो रचनाकारों को ही आलोचक भी होना चाहिए. अब बताइए कि राजेंद्र यादव कहानी की आलोचना करेंगे तो बेहतर होगा या नामवर सिंह कहानी की आलोचना करेंगे! वैसे मैं तो यही मानता हूं कि जिनकी रचनाओं में दम होता है, उन्हें आलोचक की दरकार नहीं.

भारत जैसे मुल्क में सबसे बड़ी समस्या रोटी की है लेकिन लेखक और कवि सबसे ज्यादा प्रेम के पीछे भागते हैं. आप जैसे लेखक प्रेम के साथ सेक्स के पीछे भी भागते हैं.
ऐसा नहीं है कि रोटी को महत्व नहीं मिला या नहीं मिल रहा. खूब लिखा गया है और लिखा भी जा रहा है लेकिन प्रेम की रचनाएं जल्दी लोकप्रिय हो जाती हैं. और वैसे भी प्रेम तो आत्मा की भूख है न, इस पर हमेशा ही लिखा जाता रहेगा. सेक्स के पीछे भागने का जो सवाल आप पूछ रहे हैं तो उसका जवाब यह है कि सेक्स तो प्रेम का एक जरिया भर होता है. शुरू में शरीर आता है, सेक्स आता है लेकिन प्रेम करने वाला बाद में उससे ऊपर उठ जाता है. जैसे अध्यात्म में आत्मा की परिकल्पना है लेकिन आत्मा को वास करने के लिए एक शरीर की जरूरत तो होती है न.

आपकी अपनी प्रिय रचना कौन-सी है और लेखकों में कौन पसंद हैं?
सिंगारदान. अपनी इस कहानी से मुझे बेपनाह मोहब्बत है. यह मेरे इलाके भागलपुर की कहानी है. भागलपुर दंगे के समय एक कैंप में मैं तवायफ से मिला था. दंगाइयों ने उसका सब कुछ लूट लिया था, इसका अफसोस नहीं था उसे, वह बार-बार मुझसे कह रही थी कि मेरा सिंगारदान भी ले गए सब. वह पीढ़ियों से मेरे पास था, मेरी पहचान था. मुझे तभी लगा था कि इस तवायफ की तरफ से मुझे भी एक विरोध दर्ज कराना चाहिए. विरासत को ही खत्म कर देने, पहचान पर ही प्रहार कर देने की जो परंपरा चली है, उसके खिलाफ. जहां तक पसंदीदा लेखकों की बात है तो हिंदी में उदय प्रकाश, अंग्रेजी में मिलान कुंदरा और उर्दू में इंतजार हुसैन मेरे प्रिय लेखक हैं.

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