‘आम आदमी पार्टी वाम का विकल्प नहीं बन सकती’

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इस बात के लिए वामदलों की आलोचना हो रही है कि उसकी असफलता ने आम आदमी आदमी पार्टी के लिए जगह खाली की है. वामदलों के मुकाबले आप ने जनता से सफलता पूर्वक संबंध स्थापित किया है. क्या आपको भी यह लगता है?
यह सिर्फ दिल्ली केंद्रित नजरिया है. यह सच है कि आप ने दिल्ली में व्यापक जनसमर्थन जुटाया है. लेकिन वामदल यहां पर हमेशा से ही कमजोर रहे हैं. पूरे देश की यदि बात करें तो इस चुनाव में आप का बहुत ही सीमित असर होगा. जहां वामदल मजबूत हंै वहां आप का कोई असर नहीं होगा. अस्तित्व में आने के एक साल बाद भी आप अपनी विचारधारा और नीतियों को स्पष्ट करने से बच रही है. फिलहाल तो वह सबको एक साथ खुश करने की कोशिश में लगी हुई है.

अपने हालिया घोषणापत्र में माकपा ने समलैंगिकों के आंदोलन का समर्थन किया है. लेकिन वाममोर्चा इस तरह के संघर्षों या महिला अधिकार आंदोलनों में अगुवा के रूप में नहीं दिखा है? क्या आपकी कामकाजी वर्ग की परिभाषा सीमित है?
हां, हमने स्वैछिक समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग की है. महिला आंदोलनों और उनके संघर्षों को समर्थन देने में वाममोर्चा हमेशा आगे रहा है. पता नहीं यह आप कैसे कह रहे हैं. हमने हमेशा से नारीवादी आंदोलनों का साथ दिया है. असंगठित और घरेलू महिला श्रमिकों को बड़ी संख्या में संगठित क्षेत्र की ओर लाया जा रहा है. वाममोर्चे की कामकाजी वर्ग की परिभाषा कहीं ज्यादा विस्तृत है.

आज के मीडिया को आप कैसे देखते हैं?
मीडिया ही इस देश में पूंजीवादी विकास को दर्शाता है. एक समय था जब बड़े-बड़े मीडिया समूह हमारे पास आते थे और कहते थे कि ‘आप एफडीआई के खिलाफ लड़िए.’ जैसे ही एनडीए सरकार ने 26 प्रतिशत निवेश की अनुमति दी यहां दस्तखत करने वालों की लाइन लग गई. आज बड़ी पूंजी, मीडिया और बड़े विदेशी मीडिया घरानों ने आपस में हाथ मिला लिए हैं. हमने बहुत सी मांग रखी है कि मीडिया में क्रॉस-ओनरशिप (एक ही व्यक्ति या कंपनी का एक ही तरह के कई उपक्रमों में मालिकाना हक) नहीं होना चाहिए. इसके चलते हम पर कई मीडिया घराने हमलावर हैं. हमें लगता है कि मीडिया पर बाहरी नियंत्रण का समय आ गया है. बाहरी नियंत्रण का मतलब सरकारी नियंत्रण से नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया का आत्मनियंत्रण असफल रहा है. ब्रिटेन में लेवेसन जांच के बाद इस मुद्दे पर बड़ी बहस चल रही है. सीपीएम या मार्क्सवादी नजरिये को छोड़िए, यह मुद्दा तो उदारवादियों को उठाना चाहिए.

नरेंद्र मोदी के उदय और हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई पर आपकी क्या राय है?
इस चुनाव में हिंदुत्ववादी संगठन जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी और भाजपा के माध्यम से हिंदुत्व का एजेंडा फिर से खड़ा कर दिया जाए. मीडिया यह बात समझने में पूरी तरह चूक गया है. मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने का और दूसरा कोई अर्थ ही नहीं है. राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान विश्व हिन्दू परिषद वाले नारा लगाते थे, ‘अब की बारी अयोध्या, उसके बाद काशी और मथुरा.’ अब उन्होंने काशी चुना है. उनकी रैलियों की शुरुआत ‘हर-हर मोदी’ के नारों से हुई. यह उस शहर में हो रहा है जहां राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए थे. बनारस में इस ध्रुवीकरण के बाद भाजपा ने 2004 को छोड़ कर वहां का हर चुनाव जीता. गुजरात के विकास का मॉडल सिर्फ छलावा है. उनका असली एजेंडा तो हिंदुत्व है.

तो क्या वामपंथी पार्टियां अपने में परिवर्तन लाकर फिर से उठ खड़ी हो पाएंगी?
भारत उन कुछेक देशों में शामिल है जहां पर वामदलों का व्यापक जनाधार है. इसके अलावा वाम विचारधारा का यहां लोगों के ऊपर काफी असर भी है. मुझे उम्मीद है कि यह असर और भी बढ़ेगा. लेकिन मुझे इस परिवर्तन शब्द को लेकर आशंका है. इटली में वामदलों ने खुद में इतनी बार परिवर्तन कर दिए हैं कि आज उनमें और गैर-वामदलों में कोई फर्क ही नहीं दिखता.

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