‘अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं’ | Tehelka Hindi

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‘अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं’

नीलेश रघुवंशी की कविताएं मामूली चीजों को खास बनाती हैं. साथ ही वह मुख्य धारा से अलग स्त्री स्वर पेश करती हैं. उन्हें हाल ही में शैलप्रिया सम्मान से सम्मानित किया गया.

neelesh ji

आप की मूल पहचान कवियत्री के रूप में है. लेकिन आपने अन्य विधाओं में भी रचना की है. विभिन्न विधाओं के रचनाकर्म में क्या फर्क देखती हैं?

यूं तो सारी विधाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. हर विधा का अपना मूल स्वभाव होता है. लेकिन सबके भीतर कहीं न कहीं कविता छिपी होती है. जैसे कि आप हर समय उदास नहीं रह सकते, उसी तरह हर समय खुश भी नहीं रह सकते. एक जैसा जीवन नहीं जी सकते. उसी तरह दूसरी विधाओं में जाना अच्छा लगता है, लेकिन सुकून और मन की खुशी कविता में ही मिलती है. रही बात रचना कर्म में फर्क की तो सारी विधाओं के आपस में जुडे़ होने के बाद भी रचना कर्म में बहुत फर्क होता है.

आपने बाल नाटकों पर भी काम किया है. एक तो नाटक वैसे ही कम लिखे जा रहे हैं उस पर भी बच्चों के लिए लिखना? इसमें क्या कुछ चुनौतियां पेश आईं.

मैंने बाल नाटक नहीं लिखे. नाट्य रूपांतर किए हैं. रंगकर्म सामूहिक विधा है. कहानी को कैसे नाटक में बदला जाए, उसके मूल स्वभाव से छेड़छाड़ किए बिना, निश्चित ही यह चुनौतीपूर्ण है. विभा मिश्र के साथ मैंने काफी थिएटर किया. मंच से परे के सभी कार्यों में उनके साथ मेरी सहभागिता होती थी. विभा मिश्र ने बच्चों के लिए काफी थिएटर किया. उसी दौरान मैंने काफी नाट्य लेखन किया. अब विभा मिश्र के न होने से मेरे रंग लेखन की यात्रा भी ठहर गई है.

आजकल बच्चों के लिए लिखना कम होता जा रहा है. खासतौर पर स्थापित साहित्यकार बच्चों के लिए लगभग नहीं लिखते हैं. इसके पीछे क्या कारण देखती हैं?

इसके बारे में और इसके कारणों के बारे में कुछ भी कहना अभी मेरे लिए संभव नहीं है.

मैंने कहीं आपका वक्तव्य पढ़ा था कि ‘मुझे इस पार या उस पार का जीवन अच्छा लगता है.’ इसकी थोड़ा व्याख्या करें.

इसकी व्याख्या करना तो बड़ा मुश्किल है. दरअसल मुझे बीच का रास्ता अच्छा नहीं लगता. मध्यमवर्गीय जीवन से जाने क्यों मुझे चिढ़ होती है. या तो सब कुछ हो, या फिर कुछ भी न हो. एक जैसा जीवन, एक-सी दिनचर्या, हर समय सुरक्षा के कवच की चिंता और समृद्धि के कुचक्र में उलझे रहना. कुल मिलाकर उधार की समृद्धि से तंगहाली अच्छी.

तमाम नए पुराने रचनाकार इन दिनों सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय हैं. वह पाठक-लेखक संवाद का एक बेहद लोकतांत्रिक मंच बनकर उभरा है. आप कम सक्रिय हैं. ऐसा क्यों?

ऐसा नहीं है. बस… मैं कमेंट ज्यादा नहीं करती और पोस्ट भी नहीं लगाती. धीरे-धीरे मैं उसके साथ फ्रेंडली होने की कोशिश कर रही हूं. मैं सोशल मीडिया के महत्व को नकारती नहीं हूं. लेकिन हर समय उसी में उलझे रहना भी नहीं चाहती. वैसे बाकी दूसरों को पढ़ती भी हूं, सुनती भी हूं.

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