अनेक हैं टाइगर

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जासूसों के पाकिस्तान में पकड़ लिए जाने के बाद उनके साथ वहां की एजेंसियों द्वारा जिस तरह से पूछताछ की जाती है वह पूरी प्रक्रिया हाड़ कंपाने वाली है. पकड़ने के बाद जासूसों की आंख पर पट्टी बांधकर उन्हें पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के इंटेरोगेशन सेंटर में ले जाया जाता है. जासूस बताते हैं कि उन्हें एक छोटी-सी कोठरी में रखा जाता है जहां 24 घंटे और बारहों महीने रात रहती है. जासूस गोपालदास बताते हैं कि उन्हें पकड़े जाने के 15 दिन तक न कोई खाना दिया गया और न ही पानी. पानी उतना ही मिलता था कि जिससे जीभ गीली हो सके. यहां सुरक्षा एजेंसियों के सबसे बर्बर अधिकारियों को पूछताछ के लिए लगाया जाता है.

गोपालदास अपनी हिरासत के शुरुआती दिन याद करते हुए कहते हैं, ‘जब मैं वहां पहुंचा तो सबसे पहले उन्होंने मेरे पूरे कपड़े उतरवा दिए और फिर थर्ड डिग्री का टॉर्चर शुरू कर दिया. इस दौरान वे रस्सी के सहारे आपको उल्टा लटकाकर हंटर और डंडे से बिना कुछ कहे और पूछे पीटने लगते हैं. एक समय पर एक आदमी को लगातार चार से पांच लोग तब तक पीटते रहते हैं जब तक कि आप बेहोश न हो जाएं, फिर जैसे ही कुछ समय बाद आप होश में आते हैं वे फिर से पीटने लगते हैं. बिजली के शॉक देते हैं, गुप्तांगों में मिर्ची का पावडर लगाते हैं. प्रताड़ना का आलम कुछ ऐसा होता है कि आप चाहते हैं कि कोई आए और आपको गोली मार दे.’

यह पूरी प्रताड़ना जासूसों के पकड़े जाने से लेकर अगले तीन से पांच साल तक लगातार चलती है. पकडे़ जाने के बाद सभी जासूसों को इस चरण से गुजरना होता है. जब फौज के अधिकारी आपको हर तरह से प्रताड़ित कर चुके होते हैं तब आपका मामला वे कोर्ट में ले जाते हैं. गोपालदास कहते हैं, ‘ बहुत-से जासूसों की मौत तो इस तीन से पांच साल तक चलने वाली पूछताछ के दौरान ही हो जाती है. पाक अधिकारियों का यह प्रयास होता है कि वे आपसे पहले पूरी सूचना निकलवा लें. उसके बाद आपको इतना प्रताड़ित करें कि आप जिंदा तो रहें लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप से आपकी मौत हो जाए.’ ऐसे ही एक जासूस रॉबिन मसीह के पिता याकूब मसीह कहते हैं, ‘मेरा बेटा 15 साल पाकिस्तान की जेल में सजा काट कर छूटा, जब वह यहां आया तो एक जिंदा लाश में तब्दील हो चुका था. वहां उन्होंने उसे इतना प्रताड़ित किया कि वह शादी के लायक तक नहीं बचा.’

जासूस बताते हैं कि जब कोर्ट से उन्हें जेल की सजा हो जाती है तब जाकर उनकी जान में जान आती है. हर जासूस चाहता है कि उसे जल्द से जल्द जेल की सजा हो जाए क्योंकि इसके बाद ही जिंदा बच पाने की उम्मीद बनती है.

यहां यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि जासूसों को ट्रेनिंग के दौरान सबसे पहला पाठ यह पढ़ाया जाता है कि उनके परिवार, दोस्त और नाते-रिश्तेदार किसी को भी यह नहीं पता चलना चाहिए कि वे जासूसी का काम करते हैं. जासूस करामत राही बताते हैं, ‘मैं सालों तक भारतीय एजेंसियों के लिए जासूसी करता रहा लेकिन मेरी पत्नी तक को नहीं पता था कि मैं जासूस हूं.’ यह स्थिति हर जासूस के साथ होती है. सुरजीत सिंह का ताजा मामला हमारे सामने है.

सन 1982 में पाकिस्तान में सुरजीत सिंह की गिरफ्तारी होती है. घरवालों को कुछ पता नहीं होता कि वे कहां हैं. दिन महीनों में और महीने सालों में बदल जाते हैं. जब कहीं से कोई खबर नहीं मिलती तब घरवाले यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वे अब कभी नहीं आएंगे. 23 साल बाद पाकिस्तान की जेल से एक कैदी रिहा होकर भारत आता है तो अपने साथ एक अन्य कैदी की चिट्ठी भी लाता है. वह उस कैदी के घर जाकर उसकी पत्नी को चिट्ठी सौंपता है. चिट्ठी पढ़कर उस महिला को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता. यह महिला सुरजीत सिंह की पत्नी हैं जिन्हें सुरजीत ने जेल से रिहा हुए कैदी के माध्यम से यह बताया है कि वह जिंदा है और पाकिस्तान की जेल में कैद है. उन्हें जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है और सजा-ए-मौत सुनाई गई है. सुरजीत जैसे दर्जनों उदाहरण हैं. इनके आधार पर कहा जा सकता है कि गिरफ्तार होने के बाद सिर्फ यह खबर अपने घरवालों तक पहुंचाने में कि वे पाकिस्तानी जेल में हैं, एक जासूस को दो दशक से ज्यादा लग सकते हैं.

यहीं भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का क्रूरतम चेहरा सामने आता है. जासूस कहते हैं कि यह मान लिया कि पाकिस्तान तो उनसे दुश्मनी निकाल रहा है लेकिन भारतीय एजेंसियों का तो यह फर्ज है कि वे उनके घरवालों किसी तरह उनके बारे में बताएं. गोपालदास कहते हैं, ‘ये मान लेते हैं आप जासूसी की बात मत बताओ लेकिन इतना तो हमारे घरवालों को बता ही सकते हो कि हम जिंदा हैं. लेकिन एजेंसी वाले यह तक नहीं करते. जो आदमी इनके लिए अपनी जान पर खेल कर पाकिस्तान में जासूसी कर रहा हो उसकी गिरफ्तारी पर ये लोग उसके घरवालों से न तो कोई संपर्क करते हैं, न ही उन तक कोई सूचना पहुंचाते हैं और न ही उनका कुशलक्षेम पूछते हैं.’ अगर सुरजीत सिंह की ही बात करें तो जेल से छूट कर जब वे अपने घर आए तो उन्हें पता चला कि पिछले 30 साल में कोई उनके घरवालों का हाल-चाल तक लेने नहीं आया था. इस बीच उनके सात भाइयों की मौत हो गई, एक बेटा ब्रेन हैमरेज के चलते चल बसा, उनकी पत्नी चलने-फिरने के लायक नहीं रही, घरवालों के पास इतने पैसे भी नहीं बचे कि वे अपनी रोजी-रोटी चला सकें.

खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जासूसी कर चुके और 15 साल पाकिस्तान जेल में सजा काट चुके 65 वर्षीय मोहिंदर सिंह आज अमृतसर की सड़कों पर रिक्शा चलाते हैं. 1986 में जब वे रिहा होकर वापस आए तब उन्होंने शादी की, लेकिन पत्नी कुछ महीनों के बाद ही गंभीर रूप से बीमार हो गईं. खैर,  किसी तरह रिक्शा चलाकर उन्होंने पत्नी का इलाज कराया. लेकिन थोड़े दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई. ‘आप मुझे देख ही रहे हैं, जिस उम्र में आदमी शांति से जीता है, उस उम्र में मुझे रिक्शा चलाकर रोटी कमानी पड़ रही है. पूरी जवानी तो इस देश ने ले ली अब बुढ़ापे में रिक्शा चलवा रहा है…’ मोहिंदर हारे-से स्वर में कहते हैं.

किसी तरह जब जेल की सजा ये जासूस काट लेते हैं तो उसके बाद इन्हें एक नई लड़ाई लड़नी होती है. जेल से बाहर निकलने की.

स्थिति यह है कि पाकिस्तानी जेलों में कई ऐसे जासूस अभी तक कैद हैं जिनकी सजा आठ से 10 साल पहले पूरी हो चुकी है. गोपालदास बताते हैं, ‘पाकिस्तानी जेल में मेरी ऐसे कई कैदियों से मुलाकात हुई जिनकी सजा 10 साल पहले ही पूरी हो चुकी थी, लेकिन कोई उनकी रिहाई के लिए प्रयास नहीं करता. पाकिस्तान से कोई क्या शिकायत करे जब आपके अपने देश की सरकार को ही इस बात से कोई मतलब नहीं है.’  वे ऐसे ही एक व्यक्ति रामलाल के बारे में बताते हैं जिसे बॉर्डर क्रॉस करने के जुर्म में एक साल की सजा हुई लेकिन वह पिछले 10 साल से जेल में है.

गोपालदास के मुताबिक भारत सरकार अगर थोड़ा-बहुत प्रयास करती भी है तो सिर्फ उन मामलों में जो मीडिया में काफी चर्चित रहे हों. उदाहरण के रूप में सरबजीत का मामला है. इसके अलावा उसे उन सैकड़ों भारतीयों से कोई मतलब नहीं है जो बेचारे जेलों में अपनी सजा खत्म होने के बाद भी सड़ रहे हैं. ‘सरकार जासूसों को मरने के लिए छोड़ देती है और उनके मरने के बाद उनकी लाश तक उनके घरवालों को नहीं पहुंचाती’, गोपालदास बताते हैं. रवींद्र कौशिक के अलावा भी ऐसे कई जासूस है जिनकी मौत पाकिस्तान की जेल में हुई लेकिन उनकी लाश कभी अपने वतन नहीं लौट पाई. पंजाब के पठानकोट के रहने वाले इनायत मसीह को सन 1983 में जासूसी के आरोप में पाकिस्तान में पकड़ा गया था. उसे पाकिस्तान में पूछताछ के दौरान इतना प्रताड़ित किया गया कि उसकी मृत्यु हो गई. इस बार भी भारत सरकार ने उसका शव लेने से इनकार कर दिया. ऐसा ही एक मामला अमृतसर के रहने वाले किरपाल सिंह का था. उन्हें जासूसी करने के आरोप में पाकिस्तान में सन 2000 में फांसी दे दी गई. लेकिन उनका शव भी कभी भारत नहीं आ पाया.

इन त्रासदियों और प्रताड़नाओं से गुजरने के बाद जब कोई जासूस किसी तरह रिहा होकर वापस भारत आ जाता है तो उसे उम्मीद होती है कि वह जिन लोगों और एजेंसियों के लिए काम करता था वे उसके किए के लिए उसके कृतज्ञ होंगे और पूरी जवानी देश के लिए पाकिस्तानी जेल में खपा देने का कुछ उसे मुआवजा भी देंगे. लेकिन जब भारत वापस आकर वे उन अधिकारियों से मिलते हैं जिन्होंने उन्हें जासूसी करने पाक भेजा था तो वे उनके योगदान को स्वीकारने और उन्हें सम्मानित करने के बजाय उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देते हैं. फिर शुरू होती है एक ऐसी लड़ाई जिसका अंत खुद जासूसों को पता नहीं. ऐसे ही कई जासूसों ने अपने प्रति हुए इस अन्याय के खिलाफ अदालत में शरण ली है. इनका केस लड़ रहे वरिष्ठ वकील रंजन लखनपाल कहते हैं, ‘इन जासूसों के पास ऐसे तमाम सबूत हैं जो ये प्रमाणित कर सकें कि इन लोगों ने भारत की विभिन्न खुफिया एजेंसियों के लिए पाकिस्तान में जाकर जासूसी की है. इन लोगों का योगदान एक सैनिक से बढ़कर है. इन्होंने देश की सेवा में अपना पूरा जीवन होम कर दिया, लेकिन इनके साथ देश की सरकार और खुफिया एजेंसियों द्वारा जिस तरह का व्यवहार किया जा रहा है वह बताता है कि इन्हें बहुत बड़ा धोखा दिया गया है.’

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकार और खुफिया एजेंसियां इनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही हैं.  कुछ अदालतें भी इस काम में काफी आगे हैं. ऐसा ही एक मामला करामत राही का है. करामत राही के मामले को लेकर रंजन लखनपाल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अपील की थी. जज ने मामले की सुनवाई के दौरान लखनपाल को तुरंत केस वापस लेने के लिए कहा. लखनपाल से कहा गया कि इस तरह के केस लेना देश के साथ गद्दारी है, इसलिए तुरंत यह केस वापस लिया जाए. गोपालदास कहते हैं, ‘जब हम कोर्ट में जाते हैं तो हमसे प्रमाण मांगा जाता है कि दिखाओ क्या सबूत है कि तुम जासूस थे. क्या हमारी कोर्ट यह मानती है कि पाकिस्तानी अदालतें बिना बात के ही किसी को जासूसी के आरोप में सजा दे देती हैं. अगर वे ऐसे ही फर्जी फैसले देतीं तो सारे भारतीय मछुआरे जो पाकिस्तानी सीमा में कभी-कभी चले जाते हैं उन पर भी वे जासूसी का केस ही डालतीं.’

जासूसों से जुड़े इन सभी मसलों पर बात करने के लिए जब तहलका ने खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की तो ज्यादातर ने इसे संवेदनशील मसला बताते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. हालांकि इनमें से रॉ के एक पूर्व प्रमुख ने यह माना कि एजेंसी पाकिस्तान में जासूसी करवाती है लेकिन ऐसे सभी एजेंटों को पहले ही यह बता दिया जाता है कि उनके पकड़े जाने की दशा में एजेंसी उन्हें पहचानने से इनकार कर देगी. वे कहते हैं, ‘जासूसों के साथ एक मौखिक समझौता होता है. और हर एजेंसी का जासूसों की सहायता या पुनर्वास करने का अपना अलग तरीका होता है. चूंकि जासूसी का पूरा तरीका ही गैरपारंपरिक और सीक्रेट होता है इसलिए हम गुपचुप तरीके से ही उनकी मदद करते हैं.’ लेकिन कई सालों से मीडिया में जासूसों के ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां उनको कोई मुआवजा नहीं मिला या पुनर्वास नहीं किया गया. इस पर रॉ के ये पूर्व प्रमुख कहते हैं, ‘शोर मचाने वाले लोग चोर-उचक्के होते हैं. यदि कोई सच में जासूस है तो उसकी अच्छे से व्यवस्था की जाती है.’ लेकिन जैसा कि यही अधिकारी स्वीकार करते हैं कि जासूस बनाने का काम अतिगोपनीय होता है, ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि निचले स्तर पर इन जासूसों के साथ क्या बर्ताव होता है. रवींद्र कौशिक के भानजे विक्रम बताते हैं, ‘आज तक रॉ का कोई अधिकारी हमारे परिवार से मिलने नहीं आया. न किसी तरह की कोई सहायता की. मामा जी (कौशिक) की मृत्यु के बाद कुछ समय तक नानी (रवींद्र की मां) के नाम से 500 रुपये का चेक आता था जो बाद में 2000 रुपये हो गया लेकिन 2008 में वह भी बंद हो गया.’

सीमा के नजदीक गांवों में ऐसे कई जासूसों के उदाहरण भी हैं जिन्होंने दस से पंद्रह साल जासूसी के आरोप में जेल में गुजारे. उनके परिवारों को इस दौरान कोई मुआवजा नहीं मिला और वे बेहद बुरी हालत में रहने को मजबूर हैं. बेशक कुछ मामलों में खुफिया एजेंसियों द्वारा जासूसों के पुनर्वास के दावे सही हों लेकिन ऐसे उदाहरण इन इलाकों में एजेंसियों की छवि भी खराब कर रहे हैं साथ ही इससे वे लोग भारतीय सुरक्षातंत्र से दूर भी हो रहे हैं जिनकी मदद के बिना देश की सुरक्षा को पुख्ता बनाना असंभव है.

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