‘अटल भी भाजपा से नाराज’

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विधानसभा चुनाव के वक्त बगावती तेवर के कारण पार्टी छोड़ने वाली करुणा शुक्ला 32 साल तक भाजपा में रही हैं. इस दौरान उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है. वे भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. वे छत्तीसगढ़ भाजपा में भी पांच विभिन्न अहम समितियों में भूमिका निभाती रही हैं. हालांकि करुणा शुक्ला की मुख्यमंत्री रमन सिंह से कभी नहीं पटी. 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में वे कोरबा लोकसभा सीट पर कांग्रेस के चरणदास महंत से हार गई थीं. तभी से उनके और भाजपा संगठन के बीच दूरियां बढ़ना शुरु हो गई थीं. फिलहाल कांग्रेस करुणा शुक्ला को एक उपलब्धि के तौर पर देख रही है. ये अलग बात है कि शुक्ला के कांग्रेस की टिकट पर बिलासपुर से चुनाव लड़ने की संभावना के कारण कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व दो फाड़ हो गया हो.

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  1. ये तो होना ही था। जब एक पार्टी पर वर्ग विशेष का कब्जा होने लगे तो वहां असंतोष तो फैलता ही है। वैसे करुणा शुक्ला का कांग्रेस में शामिल होना भाजपा के लिए विचारणीय प्रश्न तो है ही। लेकिन ये कांग्रेस या करुणा शुक्ला के लिए कोई विशेष उपलब्धि भी नहीं है। राजनीति में पार्टी बदलना खाने का मेनू बदलने जैसा हो गया है। विचारधारा का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

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