आज के आराध्य

फोटो: विजय पांडे
फोटो: विजय पांडे

‘कोस-कोस पे पानी, सवा कोस पे बानी’ बदलने वाली कहावत में बहुत आसानी-से अगला हिस्सा जोड़ा जा सकता है -‘दस कोस पे ध्यानी’. ध्यानी यानी भक्त. हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आराध्य उतनी ही तेजी के साथ अपना चोला बदलते चलते हैं जितनी तेजी से यहां के लोगों की बोली. हर गांव-शहर-मुहल्ले के अपने आस्था के प्रतीकों का होना इस देश में उतना ही सहज है जितना जीने के लिए हवा-पानी. लमही के बेलवांबाबा, सरायमीर के अलीअश्कां बाबा, नरसिंहपुर के दुल्हादेव, लखनऊ के बाबा खम्मन पीर, रामदेवरा के रामदेव बाबा, मोकामा के चूहड़मल, छपरा की अंबा देवी से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के अय्यप्पन तक स्थानीय देवी-देवताओं और श्रद्धा-उपासना के बिंबों की एक ऐसी अनवरत श्रृंखला है जिसका संबंध भारतीय पौराणिक संदर्भों से उतना गहरा जुड़ा न भी हो तो भी सब के सब उसी परंपरा से प्रेरित-आस्वादित हैं जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं. मौजूदा दौर में आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, उनमें – शिरडीवाले साई बाबा, शिंगणा के शनिदेव, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें आती हैं.

अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं. फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है. हाल के दौर में इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं निर्मल बाबा. किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है. ‘परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत है’ वाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है.

धर्मभीरुता भारतीय समाज के मूल में है इसके बावजूद धर्म और आस्था के मामलों में छोटी-मोटी छूट लेने और नए-नए प्रयोगों से हमें कोई परहेज नहीं. ये छूट और प्रयोग धीरे-धीरे कब एक नए चलन का सूत्रपात कर देते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते ये चलन किसी अलग ही मत, संप्रदाय या हमारी श्रद्धा के किसी जबर्दस्त प्रतीक का स्वरूप धारण कर लेते हंै. इसीलिए अब तक गुमनाम रहे कुछ आराध्य पिछले कुछ वर्षों में अचानक इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि टीवी चैनलों से लेकर सड़कों पर दौड़ती बेशुमार कारों के शीशों तक पर दिख जाते हैं. रातों-रात धरती का सीना फाड़कर प्रकट हो जाने वाले मंदिर-मस्जिद-मजारों और उनके ऊपर दो-चार दिन के भीतर ही ‘अतीव शक्तिसंपन्न, प्राचीन सिद्धपीठ’ का बोर्ड लटक जाने की परंपरा का एक अक्खड़ बनारसी नमूना वरिष्ठ साहित्यकार डॉ काशीनाथ सिंह ने अपने मशहूर उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में कुछ यूं पेश किया है- ‘कंपटीशन शुरू हो गया है जीटी रोड के किनारे मंदिर, मस्जिद, मजार बनाकर जमीन हड़पने का. वे भी हड़प रहे हैं, लेकिन तुम्हारे मुकाबले वे कहीं नहीं हैं. मस्जिद खड़ी करने में तो समय लगता है, यहां तो एक ईंट या पत्थर फेंका, गेरू या सेनुर पोता, फूल-पत्ती चढ़ाया और माथा टेक दिया- जै बजरंग बली. और दो आदमी ढोलक-झाल लेकर बैठ गए- अखंड हरिकीर्तन! भगवान धरती फोड़कर प्रकट भए हैं…’

आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है. इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता. लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है तथा धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है.’ स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है.

भक्तों की धर्मभीरुता, पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और साथ में मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा

परंपरागत हिंदू देवी-देवताओं में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की आराधना सबसे ज्यादा होती रही है. इसके अतिरिक्त शिवजी, गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा आदि ऐसे देवी-देवता रहे हैं जिन्हें थोड़ी आसान भाषा में मुख्यधारा के भगवान कहा जा सकता है. तमाम स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ इनकी आराधना का ग्राफ कमोबेश पूरे देश में एक-सा बना रहता है. किंतु विगत एक दशक के दौरान श्रद्धालुओं की पूजा-पाठ की शैलियों और व्यवस्थाओं में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. कई अध्ययनों में भी इस तरह की चौंकाने वाली प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं. साथ ही ये तथ्य कुछ और नई और रोचक परिपाटियों के गठन की ओर भी इशारा कर रहे हैं.

शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई यह भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है भक्तों की धर्मभीरुता, पीर-पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और इन सबसे ऊपर मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा है. परंपरागत देवी-देवता, भक्तों की संख्या और आराधना के मामले मे पीछे छूटते जा रहे हैं और मुख्य रूप से आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं – शनिदेव, शिरडीवाले साई बाबा, भैरवनाथ और जगह-जगह दिखने वालीं विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें. यहां पहले तीन तो आस्था के एक प्रकार से निश्चित रंग-रूप, हानि-लाभ और पूजा-पद्धतियों वाले प्रतीक हैं लेकिन मजारों के मामले में ऐसा नहीं है. घड़ी वाले, सिगरेट वाले से लेकर मटके वाले पीर तक की मजारें इस देश के अमूमन हर हिस्से में फैली हुई हैं. ये अलग-अलग लोगों की मजारें है, जिनके संदेश-उपदेश, और जियारत के तौर-तरीके एक-दूसरे के जैसे होते हुए भी अलग हो सकते हैं. मसलन हर जगह मजारों पर चादर तो चढ़ाई जाती है, लेकिन इसके साथ कहीं पर घड़ी और कहीं मटका चढ़ाने का चलन भी है.

इस श्रेणी के धार्मिक प्रतीकों को अगर एक दर्जे में रखकर देखें तो इनकी शरण में आने वालों की संख्या बड़े-बड़े देवी-देवताओं के भक्तों को मात दे सकती है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दरगाहों-मजारों की प्रतिष्ठा और हिंदू धर्म के नये-नये देवताओं के अचानक ही चलन में आने की क्या वजह हो सकती है? इस सवाल पर स्वामी अग्निवेश की राय है, ‘वक्त-वक्त पर लोग नए-नए प्रतीक गढ़ते हैं, फिर उनका भय दिखाकर लोगों का भयादोहन किया जाता है. धीरे-धीरे जब उनका असर कम होता है, तब यह तबका किसी नए प्रतीक को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाता है.’

महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके न तो क्रोध की कोई सीमा थी और न ही कृपा का कोई पारावार. आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है. एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है. एसी नील्सन के एक सर्वे के मुताबिक शनिदेव ने देवताओं की लोकप्रियता सूची के सभी पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है. वे बाकी तमाम देवी-देवताओं को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. जहां परंपरागत देवी देवताओं की भक्ति के पीछे भक्तों की श्रद्धा काम कर रही होती है वहीं शनिभक्ति की लहर आने की मुख्य वजह है उनके प्रकोप से खुद को बचाने की मुराद और साथ ही उनकी कृपा से खुद को धनधान्य से भरपूर बनाने की लालसा. वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है. और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं. इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, साई आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं.’ लोग शनिदेव के दर्शन तो करने जाते हैं पर उनसे नजरें चुराते हुए. शनिभक्ति की लहर शिंगणापुर से निकलकर भोपाल-दिल्ली के गलीकूचों तक फैल गई है. समय ने शनिदेव के पक्ष में पलटी खाई है और पिछले चार-पांच सालों के दौरान भोपाल में कदम-कदम पर शिंगणापुर वाले शनिदेव प्रकट हो गए हैं. हर नुक्कड़-बस्ती में उनके मंदिर दिख जाते हैं और शनिदेव की आस्था की लहर में हजारों एकड़ जमीन तमाम नियम कानूनों को धता बताकर शनिदेव को समर्पित हो गई है.

तमाम महानगरों की लालबत्तियों पर इस तरह के शनिदेव के सेवक नजर आ जाते हैं. फोटो: तरूण सहरावत
तमाम महानगरों की लालबत्तियों पर इस तरह के शनिदेव के सेवक नजर आ जाते हैं. फोटो: तरूण सहरावत

आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक का आंकड़ा छूने लगी. अगर इस तथ्य पर सावधानी से निगाह डालें तो हम पाएंगे कि शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई यह भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है. टीवी के इस विस्तार के साथ दाती मदन महाराज और स्वामी रामदेव जैसे धर्म गुरुओं और संतों की पहुंच भी घर-घर में बढ़ी है. शनिदेव की बढ़ती लोकप्रियता में सबसे बड़ा योगदान हिंदी के एक बड़े ‘समाचार’ चैनल इंडिया टीवी और शनिदेव के परमभक्त दाती मदन महाराज का है. दाती महाराज शनिदेव की लोकप्रियता को अलग कोण से देखते हैं, ‘शनि शत्रु है, अमंगलकारी है, दुखदायी है, ये सब भ्रांतियां थीं. अब समाज से भ्रम और भ्रांति का पर्दा उठा है तो लोगों को सच्चाई का अहसास हो गया है. मैं तो साधनमात्र था. टेलीविजन ने मुझे आपसे जुड़ने का सुअवसर मुहैया कराया तो चुनौती थोड़ी आसान हो गई.’

चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने अंध श्रद्धा को बढ़ाया है और लोगों को धर्म के मूल उद्देश्य से भटका दिया है. साईं और शनि के बहाव में इसकी अहम भूमिका है

डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे टीवी इवेंजलिस्म की संज्ञा देते हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका में हुई थी. उनका मत है, ‘जिस भी समाज में टीवी का विस्तार हुआ वहां धार्मिकता का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है. अमेरिका में अकेले ईसाइयत के अलग-अलग पंथों के कम से कम पचास धार्मिक चैनल हैं. भारत में भी टीवी के विस्तार ने इस दुर्गुण को अपना लिया है. चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने धार्मिकता को बढ़ाया है और लोगों को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है. साई और शनि के बहाव में इसकी अहम भूमिका है.’

कुछ साल पहले तक साईबाबा का जिक्र आते ही लोग सीधे शिरडी का ध्यान करते थे. शिरडी में स्थित साईमंदिर की महिमा के तमाम किस्से सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं. साईबाबा काफी कुछ भारत में सदियों से चली आ रही रमता जोगी और बहता पानी वाली पंरपरा की ही एक कड़ी थे. फक्कड़पना उनके स्वभाव में था, संतई और ईमानदारी उनके चरित्र के गुण थे और लोगों को सत्संगत की सीख देना उनकी विशेषता थी. इस परंपरा से जुड़ी तमाम दूसरी दास्तानंे भी देश के अन्य हिस्सों में देखने-सुनने को मिल जाती हैं मसलन कबीर या फिर देशभर में जगह-जगह फैली पीरों की दरगाह और मजारें. समय बीतने के साथ किस तरह से इनके दामन से चमत्कारवाद जुड़ जाता है, यह बात किसी पीएचडी छात्र के लिए शोध का बढ़िया विषय हो सकती है. पहले इस परंपरा के साथ एक सुंदर प्रवृत्ति का घालमेल भी देखने को मिलता था जिसे सही मायनों में गंगा जमुनी तहजीब कहा जा सकता था – इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थे – पर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है. पिछले एक दशक के भीतर देश भर में अस्सी हजार के करीब साई मंदिर अस्तित्व में आ गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है. दिल्ली स्थित मशहूर इस्कॉन मंदिर के ठीक सामने साई बाबा का नया मंदिर बना है. सुबह-शाम आरती होती है और महीने में दो दिन साई बाबा की गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में फैलाव के साथ-साथ इसकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे भटकाव आता गया है जिसके साथ ही शिरडी और देश के दूसरे हिस्सों में बने साई मंदिरो में मुसलमानों की भागीदारी भी धीरे-धीरे खत्म हो गई है. उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है, पौराणिक हिंदू देवी देवताओं की भांति ही फूल-माला, धूप-बत्ती से सराबोर साई मंदिर अपने मूल स्वरूप से ही भटक गए से लगते हैं. शिरडी साई संस्थानम ट्रस्ट के चेयरमैन जयंत ससाने मुसलमानों की साई से दूरी की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उनके पास इसकी वजह भी बताने को है- ‘मुसलमान साई से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साई की मूर्ति से परेशानी होती है. यह इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है. इसके चलते साई भक्तों में मुस्लिमों की संख्या घटी है.’ साई संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साई मंदिरों के पुजारियों के लिए एक 15 दिन के ट्रेनिंग कार्यक्रम की व्यवस्था की है. शिरडी स्थित साई धाम में इन लोगों के प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके. जिस पथ के पुजारी साई बाबा थे उसी की अगली कड़ी के तौर पर हम देशभर में प्रचलित दरगाहों-मजारों को रख सकते हैं. देश का कोई भी ऐसा इलाका नहीं होगा जहां दरगाहों मजारों पर शीश नवाने वाले हिंदू श्रद्धालु न हों.

समय-समय पर देश के लोकप्रिय माध्यमों ने भी देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा के संतुलन को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई है. मसलन 70 के दशक में आई बहुचर्चित और सिनेमा की कमाई के आंकड़े की नई इबारत लिखने वाली फिल्म जय संतोषी मां ने घर-घर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा की थी. हर शुक्रवार को संतोषी माता की व्रत कथा की लहर पूरे देश में उमड़ पड़ी थी. संतोषीमाता का अभ्युदय एक निम्न मध्यवर्गीय परिघटना थी. गणेश की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता धन और सुख-समृद्धि की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी. जाहिर-सी बात है जिस तबके को इन साधनों की सबसे अधिक इच्छा थी उन्हीं के बीच संतोषी माता की भक्ति का सागर उमड़ रहा था. कुछ ऐसी ही स्थितियां 80 के दशक में आई राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और गुलशन कुमार के मातारानी के भजनों ने माता वैष्णो देवी के लिए पैदा की थीं. आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक पहुंचने लगी.

आस्था का यह ज्वार अभी थमा नहीं है, हां कालांतर में इसमें एक और आयाम जुड़ गया – भैरवनाथ. फिर कथा चली कि भैरवनाथ का दर्शन किए बिना वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. भैरवनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी वैष्णो देवी की गुफा से कुछ दूरी पर ही स्थित है.

फिलहाल यही भैरवनाथ शीर्ष गति से बढ़ रहे चार देवताओं में शामिल हो गए हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भैरवनाथ एक तांत्रिक थे जिन्होंने वैष्णो देवी का पीछा करते हुए उस मार्ग की खोज की थी जिसके जरिए आज 13 किलोमीटर लंबी वैष्णो देवी की यात्रा संचालित होती है. कथा यह थी कि वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध करने के साथ ही उन्हें माफ कर दिया था और उन्हें विद्वान की संज्ञा देते हुए अपने जितना ही पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया था. शिव के परम भक्त भैरवनाथ का प्रभाव दो दशक पहले तक देश के विस्तृत मैदानी इलाकों की बजाय हिमालय की पहाड़ियों तक ज्यादा था. अल्मोड़ा में काल भैरव, बटुक भैरव, भाल भैरव, शैव भैरव, आनंद भैरव, गौर भैरव और खटकूनियां नाम के आठ प्राचीन भैरव मंदिरों का अस्तित्व रहा है और लोगों के पास इनकी महिमा की अनगिनत दंतकथाएं भी बताने को हैं. लेकिन वैष्णो देवी के प्रसार के साथ ही भैरवनाथ का दायरा भी दुर्गम पहाड़ियों से निकल कर समतल मैदानों में फैल गया. दिल्ली में पुराने किले के पास स्थित मशहूर भैरव मंदिर है जहां चढ़ावे के रूप में शराब चढ़ाने की परंपरा है. इतना ही प्रसिद्ध और भीड़भाड़ से भरा और खुद को पांडव कालीन बताने वाला भैरव मंदिर दिल्ली के वीआईपी इलाके चाणक्यपुरी में भी स्थित है. यह अलग बात है कि भक्तों को इसका ज्ञान महज दशक भर पहले हुआ है. इस मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प दास्तान वहां पिछले दस सालों से बिना नागा दर्शन करने आने वाली एक भक्त सरोज शर्मा सुनाती हैं, ‘दस साल पहले तक यहां इक्का दुक्का ही कभी कोई दर्शन के लिए आता था. हम यहां आते थे और घंटों तक शांति से बैठ कर ध्यान-मग्न रहते थे. मंदिर के पुजारी अक्सर बातचीत के दौरान निराश होकर कहा करते थे, ‘बहनजी क्या कभी हमारे मंदिर में भी पुराने किले वाले भैरव बाबा के जैसी रौनक होगी?’ आखिर भैरव बाबा ने उनकी सुनी और आजकल चाणक्यपुरी का भैरव मंदिर हर रविवार वैसे ही गुलजार रहता है जैसे पुराने किले के पीछे वाले किलकारी भैरव महाराज. लखनऊ के अमीनाबाद में स्थित बटुक भैरव मंदिर भी खुद के प्राचीन होने का दावा करता है. मगर यहां के महंत श्याम किशोर गिरि नितांत व्यावहारिक नजरिया रखते हैं, ‘मंदिर तो करीब सात सदी पुराना है लेकिन यहां लोगों की विशाल भीड़ पिछले सात-आठ सालों से आनी शुरू हुई है. यहां पंद्रह आने दुखी लोग आते हैं और सिर्फ एक आना भक्त आते हैं.’

भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है. वही भक्त जब साई, शनि या किसी मजार के पास जाता है तब उसके मन में सिर्फ मुराद होती है

सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा में भी भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा आज तक किसी को पता नहीं चल सकी है

भैरवनाथ की श्रद्धा के पीछे भी वही मानसिकता देखने को मिलती है जो कि शनिदेव के भक्तों की है. दंतकथा के मुताबिक अपने जीवन काल में भैरवनाथ एक अड़ियल गुस्सैल सिद्ध तांत्रिक थे. उन्होंने वैष्णो देवी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी. लेकिन लगे हाथ भैरवनाथ उतने ही पहुंचे हुए ज्ञानी भी थे. तमाम काली सिद्धियों पर उनका एकाधिकार था और उनके अनुयायियों पर कोई कुदृष्टि कभी हावी नहीं होने पाती थी. भैरवनाथ की आस्था और प्रभाव का एक जीता-जागता नमूना हाल ही में कश्मीर घाटी में देखने को मिला जहां सालों पहले पलायन कर गए हिंदुओं के बंद पड़े भैरव मंदिर को वहां के मुसलमानों ने दोबारा से खुलवाकर उन्हें कश्मीरी पंडितों के हवाले कर दिया.

नई दिल्ली स्थित पुराने किले के पीछे स्थित भौरव मंदिर में बंटता शराब का प्रसाद. फोटो: शैलेन्द्र पाण्डेय
नई दिल्ली स्थित पुराने किले के पीछे स्थित भौरव मंदिर में बंटता शराब का प्रसाद. फोटो: शैलेन्द्र पाण्डेय

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, नई दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन ऑलिया और फतेहपुर सीकरी की शेख सलीम चिश्ती की दरगाह जैसी मिसालों को छोड़ दिया जाए तो काफी दरगाहों और मजारों पर शीश नवाने वाले जियारतमंदों को उनके अतीत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता है. सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा भी कायम है जिसमें भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा किसी को पता नहीं होती. लखनऊ के खम्मन पीर दरगाह में मन्नत मांगने आए मोहित मिश्रा से जब तहलका ने दरगाह की महिमा और खम्मन पीर की श्रद्धा के बारे में जानने की कोशिश की तो एक रोचक कारण सामने आया. मोहित ने बताया, ‘जब आपके काम नहीं बन रहे होते हैं तब आप मजहब की सीमाओं को पार कर जाते हैं.’

काफी हद तक वाचिक परंपरा या किस्सागोई की आदत की तरह महिमा की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं. स्वाभाविक है व्यक्ति दर व्यक्ति कहानियां परिष्कृत होती जाती हैं और समयातंर में एक बिल्कुल नई कहानी सामने आती है जिसमें चमत्कार, भय, आस्था, अपूर्ण इच्छा जैसे नवरसों का मिश्रण होता है. किस तरह से कोई मजार समय के साथ सर्वशक्तिसंपन्न और हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली पीठ बन जाती है इसकी एक दिलचस्प बानगी चर्चित साहित्यकार भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत में है. एक वेश्या रतना जो कि उपन्यास की नायिका भी है, को एक बच्चे की लंबे समय से चाह है. एक दिन पुलिस से भागा हुआ भूरा उसके पास आता है जिसके संसर्ग में आने से रतना की यह मुराद पूरी हो जाती है. शराबी भूरा के देहांत के बाद रतना उसकी पक्की कब्र बनवा देती हैै. दो साल बाद कोई शरारतन कब्र के ऊपर ‘भूरा पीर की मजार’ लिख देता है और कुछ ही दिनों में वहां संतान की इच्छा रखने वाले जोड़े मन्नतें मांगने के लिए आने लग जाते हैं. इस कब्र पर जो बोर्ड लगा होता है उपन्यास में उसका जिक्र भी बड़ा दिलचस्प है.

दरगाह-ए -बाबा भूरा पीर.
सालाना उर्स- रबीउल अव्वल (जून की 25 तारीख)
भंडारा- हर महीने के अंतिम दिन
खादिम – मोहम्मद अमीन
‘यहां मर्द और औरत दोनों का शर्तिया इलाज होता है’

खुद मोरवाल के शब्दों में, ‘उपन्यास का यह दृष्टांत मेरे निजी अनुभव पर आधारित है. जब मैं लिखने के सिलसिले में उस इलाके में शोध कर रहा था तब मुझे इस घटना के बारे में पता चला. मैंने जाकर देखा तो वहां उस मजार पर अगरबत्तियां जल रही थीं.’

स्वामी अग्निवेश धर्म के इस विकृत स्वरूप के विस्तार के लिए समाज में आते जा रहे दुर्गुणों की बात करते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म के प्रति अंध रुझान की जड़ें वर्तमान समाज में बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार, गंदगी और अनैतिक क्रिया-कलापों से जुड़ी हुई हैं. जब समाज गलत चीजों में लगा होगा तो स्वाभाविक है कि उसके अंदर एक तरह का भय, असुरक्षा और ग्लानिबोध रहता है. इस ग्लानिबोध से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति धर्म के चमत्कारिक पहलू की ओर झुकता चला जाता है.’

देखते ही देखते अनजानी मजारों और दरगाहों के साथ लोग दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण, हर कामना की पूर्ति करने वाली, संतानहीनों को संतान और बेटी वालों को बेटे देने वाली जैसे विशेषण जोड़ते चले जाते हैं. एटा में सय्यद वाली गली के पीर से लेकर लखनऊ में ऐन चारबाग रेलवे स्टेशन पर खम्मन पीर बाबा की मजार, दिल्ली में पुराने किले के पास दरगाह-ए-अबू बकर तूसी उर्फ मटके वाले पीर की दरगाह और हरियाणा के मलेरकोटला वाले पीर के आश्रम तक पूरे देश में दरगाहों की ऐसी ही एक अनवरत श्रृंखला देखी जा सकती है.

आस्था समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी होती है. जब उसमें आत्मविश्वास की कमी आती है तब वह आस्था से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद की तरफ चला जाता है

नई दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित मटके वाले पीर की दरगाह पर सालों से मटका चढ़ाने के लिए चांदनी चौक से यहां आने वाले साड़ियों के व्यापारी ईश्वरचंद गुप्ता को पीर के इतिहास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है. पूछने पर वे बस इतना ही बता पाते हैं कि किसी ने उनसे यहां मन्नत मानने के लिए कहा था. संयोग से उनकी मन्नत पूरी हो गई और गुप्ता जी की श्रद्धा भी अटल हो गई. वे कहते हैं, ‘अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा तो हम बचपन से ही करते चले आ रहे थे. इसके बाद भी हमारी मुश्किलें जब दूर नहीं हो रही थीं तो फिर पीर की मजार को आजमाने में क्या बुराई थी. मेरे तमाम परिचितों को यहां मुंहमांगी मुराद मिल चुकी है.’

साधकों की इस प्रकार की निष्ठा के पीछे विशिष्ट भूमिका होती है अंधश्रद्धा और तर्क-वितर्क की क्षमता के अभाव की. पर इसकी अच्छाई की बात करें तो इन दरगाहों-मजारों पर शीश नवाने वालों में हिंदू-मुसलमान समान संख्या में होते हैं जो मौजूदा संवेदनशील, अस्थिर भारतीय समाज के नजरिए से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. यह अलग बात है कि एक बृहस्पतिवार को दरगाहों पर एक साथ सिर झुकाने वाले अगले शुक्रवार और मंगलवार को ही किसी मौलाना की तकरीर और पंडित के प्रवचन को गांठ बांधकर एक दूसरे को ललकारने से नहीं हिचकते.

अवध और लखनऊ के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ. योगेश प्रवीण इस चलन को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटकर देखते हैं. वे कहते हैं, ‘भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है जबकि वही भक्त जब किसी मजार पर जाता है तो उसके मन में कोई न कोई मुराद होती है.’ इन मजारों में भी मस्ती, सूफियाना फक्कड़पन जैसी शानदार हिंदुस्तानी परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. लोग धर्म के कट्टरवादी स्वरूप की तरफ जाने-अनजाने बढ़े जा रहे हैं.

डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे धार्मिक समूहों की मन:स्थिति में व्याप्त आत्मविश्वास की कमी से जोड़कर देखते हुए कहते हैं, ‘मस्ती और फक्कड़पना जो कबीर की विशेषता थी, असल में समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी हुई चीज है. जब समाज में आत्मविश्वास की कमी होती है, असुरक्षा की भावना बढ़ती है तब वह इन चीजों से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद जैसी चीजों की तरफ चला जाता है. यह बात आज समाज के हर पहलू से जुड़ गई है चाहे वह पढ़ाई-लिखाई हो, रोजी-रोटी हो नौकरी हो या फिर कुछ और.’

अच्छाइयों और बुराइयों की तुलना से इतर एक जरूरी प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में धर्म का स्वरूप समय सापेक्ष और परिवर्तनीय ही है तो आने वाले समय में भारत में इसका नया स्वरूप क्या उभरेगा. यह कबीर, कंबन, तुलसी, अकबर, विवेकानंद और गांधी के विचारों का सुंदर मिश्रण बनकर उभरेगा या तालिबानी तर्ज का कट्टरवादी प्रतीक या फिर आधुनिकता से ओत-प्रोत पूरी तरह अमेरिकी-यूरोपीय समाज की शक्ल ले लेगा?

वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों. हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक से समीक्षा की जा सकती है. बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने. इस बीच आधुनिक और परंपरागत आराध्यों के अनुयायियों के बीच पैदा हुई खटास किस करवट बैठेगी, यह देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा. वास्तव में आधुनिक आराध्य परंपरागत देवी-देवताओं के लिए चुनौती बन गए हैं या फिर यह उनके भक्तों में पैदा हुई असुरक्षा का नतीजा है? समय की किताब में जुड़ने वाले पन्ने ही इसका जवाब दे सकते हैं.


‘साई पूजा सनातन धर्म को अपमानित करने का षडयंत्र है’

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