फीफा का फाउल फुटबॉल

अंतरराष्ट्रीय पुटबॉल संघ फीफा को न केवल यही खरीखोटी सुननी पड़ रही है कि वह कतर के कान क्यों नहीं ऐंठता, उससे यह भी पूछा जा रहा है कि उसकी कार्यकारिणी के सदस्य स्वयं कितने दूध के धुले हैं? यूरोपीय देशों का मीडिया तो फीफा के पीछे पड़ा ही था, अब जापान की सोनी और जर्मनी की अदिदास कंपनियों जैसे प्रायोजक भी, जो फीफा के कार्यक्रमों में हाथ बंटाते हैं, उससे पूछने लगे हैं कि कतर वाले प्रकरण की ठीक से जांच क्यों नहीं हो रही है. दोनों की देखादेखी, हो सकता है, दूसरी कंपनियां भी यही मांग करने लगें. उनकी चिंता स्वाभाविक भी है. अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल फीफा ही नहीं, उनके लिए भी अरबों डॉलर की कमाई वाला धंधा है. अकेले 2013 में फीफा ने एक अरब 40 करोड़ डॉलर की कमाई की. 60 करोड़ डॉलर उसे फुटबॉल मैचों के प्रसारण अधिकारों की बिक्री से मिले और 40 करोड़ डॉलर सोनी, अदिदास, कोका-कोला, एमिरत एयरलाइंस, ह्यूंदेई और वीसा क्रेडिट-कार्ड जैसी प्रायोजक या साझेदार कंपनियों से. इन कंपनियों ने स्वयं जो लाभ कमाया, उसे वही जानती हैं. उन्हें चिंता हो रही है कि कतर-कांड उनके भावी लाभों के पर कतर देगा.

फीफा भ्रष्टाचार का घर
फीफा के भीतर भ्रष्टाचार के आरोप पहले भी लगते रहे हैं. कतरी नागरिक मोहम्मद बिन हम्माम फीफा की कार्यकारिणी समिति के लंबे समय तक सदस्य और उस के अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर के सहयोगी रहे हैं. उनके बारे में कहा जाता रहा है कि 2022 वाले विश्व कप की मेजबानी कतर को दिलाने के लिए उन्होंने कार्यकारिणी के कुछ सदस्यों व दूसरे प्रभावशाली लोगों को भारी रिश्वतें दीं. फीफा की गतिविधियों से सुपरिचित एक जर्मन प्रेक्षक का मत है कि बिन हम्माम का ताना-बाना इतना व्यापक था कि यह हो नहीं सकता कि योजेफ ब्लाटर को उनके कारनामों की कोई भनक तक न रही हो.

इसी जून की शुरुआत से ब्रिटिश पत्र ‘द संडे टाइम्स’ कतर-कांड की आग में नया घी डाल रहा है. उसने दावा किया है कि उसके पास बिन हम्माम की कारस्तानियों की पोल खोलने वाले ‘दसियों लाख ईमेल और दूसरे दस्तावेज’ हैं. उनसे पता चलता है कि 2022 के विश्व कप की मेजबानी कतर को दिलाने का अपना अभियान उन्होंने 2009 में ही शुरू कर दिया था. इसके लिए उन्होंने फीफा के प्रमुख अधिकारियों की जेबें कुल मिलाकर 50 लाख डॉलर से और कुछ एशियाई प्रतिनिधियों की 17 लाख डॉलर से गरम कीं. फीफा कार्यकारिणी के ताहिती वासी सदस्य रीनल्ड तेमारी का वोट पाने के लिए उनके वकीलों का 3,05,000 डॉलर का बिल चुकाया. यह हो नहीं सकता कि इतना सारा धन बिन हम्माम ने अपनी जेब से बांटा हो. उनके पीछे जरूर कतर की सरकार रही होगी. सरकार नहीं रही होती तो वे कतर और थाईलैंड के बीच प्राकृतिक गैस का एक ऐसा सौदा भी नहीं पटा सके होते, जिसके बदले में फीफा की कार्यकारिणी के थाई सदस्य वोरावी माकूदी का वोट मिलना सुनिश्चित हो गया – माकूदी हालांकि इससे इन्कार करते हैं.

लाखों डॉलर रिश्वत में बांटे
‘संडे टाइम्स’ के अनुसार, मोहम्मद बिन हम्माम न केवल लाखों डॉलर की रिश्वतें बांट रहे थे, राजनीतिक लाभों के लिए अपने व्यापारिक संबंधों को भी इस्तेमाल कर रहे थे. अक्टूबर 2020 में वे ‘द्विपक्षीय खेल-संबंधों’ पर बातचीत करने के लिए रूसी नेता ब्लादिमीर पुतिन से भी मिले थे. गौरतलब है कि दिसंबर 2010 में हुए मतदान में फीफा की कार्यकारिणी समिति ने कतर को 2022 और रूस को 2018 के विश्व कप का मेजबान घोषित किया था. रूस के पक्ष में 13 मत पड़े थे, हालांकि रूस के चयन को लेकर अनियमितता के कोई आरोप अभी तक नहीं लगे हैं. मतदान से पांच माह पूर्व बिन हम्माम ने जर्मनी के पू्र्व फुटबॉल खिलाड़ी और उस समय फीफा कार्यकारिणी के सदस्य रहे फ्रांत्स बेकेनबाउएर को तेल और गैस परिवहन में लगी एक कंपनी के बोर्ड प्रमुख के साथ दोहा आमंत्रित किया था.

ब्रिटिश दैनिक ‘टेलीग्राफ’ ने भी जून के शुरू में दावा किया कि उसके पास भी अब तक अप्रकाशित गोपनीय सामग्रियां हैं. उनसे पता चलता है कि मोहम्मद बिन हम्माम व्यापारिक सौदे पटाने के बहाने से उन देशों के सरकारी अधिकारियों से मिलते-जुलते रहे हैं, जिनका फीफा की कार्यकारिणी समिति में अपना कोई सदस्य था. वे फीफा के सदस्यों को कारों की डीलरशिप या उनके परिजनों को नौकरी अथवा प्रशिक्षण सुविधा दिलाने की भी पेशकश किया करते थे. उन्हीं के प्रयासों से कतर की सरकारी संस्था ‘कतर स्पोर्ट्स इन्वेस्टमेंट्स’ ने फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी के प्रिय फुटबॉल क्लब ‘पारी सां-जेर्मां’ को खरीदकर उसका उद्धार किया. फीफा कार्यकारिणी के फ्रांसीसी सदस्य मिशेल प्लातिनी के पुत्र लौरों प्लातिनी को कतर की एक प्रमुख खेल सामग्री कंपनी ‘बर्रदा’ के यूरोपीय विभाग का प्रमुख बना दिया गया. फीफा के एक पूर्व उपाध्यक्ष ट्रिनीडाड के जैक वॉर्नर और उनके दो बेटों को कुल मिलाकर 20 लाख डॉलर कथित ‘विकास सहायता’ के तौर पर मिले. फीफा ने अमेरिकी वकील और इंटरपोल के एक पूर्व उपाध्यक्ष माइकल गार्सिया को 2010 वाले इस मतदान की पृष्ठभूमि की जांच करने का काम सौंपा है. तीन वर्षों से चल रही उनकी जांच की रिपोर्ट जुलाई में प्रकाशित होने वाली है.

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छिन सकती है कतर की मेजबानी
इस रिपोर्ट की उन सब लोगों, संस्थाओं और कंपनियों को अधीरता से प्रतीक्षा है, जिनकी मांग है कि भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित हो जाने पर कतर से 2022 की विश्व कप मेजबानी छीन ली जानी और दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए. जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के फुटबॉल संघों के प्रमुख तो यह मांग कर ही रहे हैं, यूरोपीय फुटबॉल संघ ‘यूएफा’ के अध्यक्ष और स्वयं आरोपों से घिरे फ्रांस के मिशेल प्लातिनी ने भी पांच जून को एक फ्रांसीसी पत्रिका से कहा, ‘भ्रष्टाचार यदि प्रमाणित हो जाता है, तो हमें पुनः मतदान करना और दोषियों को दंडित करना होगा.” कतर की जगह लेने के लिए ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका अभी से तैयार होने लगे हैं. लेकिन दो दिसंबर 2010 को फीफा के मुख्यालय में हुए मतदान में भ्रष्टाचार यदि सचमुच प्रमाणित हो जाता है, तो न केवल कतर के चुनाव को ही, बल्कि रूस के चुनाव को भी रद्द घोषित करना पड़ेगा. दोनों का चुनाव एक ही दिन और कार्यकारिणी के उन्हीं सदस्यों ने किया था, जो हो सकता है भ्रष्टाचार के दोषी पाए जाएं. फीफा के वर्तमान अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर के भविष्य पर भी काले बादल छा सकते हैं. वे 2015 में अध्यक्ष पद का चुनाव फिर से लड़ना चाहते हैं.

भ्रष्टाचार संबंधी दंडविधान के स्विस प्रोफेसर मार्क पीथ का मत है कि यदि यह दोटूक प्रमाणित नहीं हो पाता कि कतर ने विश्व-कप की मेजबानी ‘खरीदी’ थी, और तब भी उससे मेजबानी छीन ली जाती है, तो ‘कतर क्षतिपूर्ति का कानूनी दावा ठोक सकता है.’ कतर ने विश्व कप से जुड़े निर्माणकार्यों पर पिछले चार वर्षों में जो भी खर्च किया है उसकी भरपाई करना फीफा के लिए भारी पड़ सकता है.

कहां से मिले नए दस्तावेज?
एक दिलचस्प प्रश्न यह भी है कि ‘संडे टाइम्स’ और ‘टेलीग्राफ’ को लाखों ईमेल और दूसरे दस्तावेज ब्राजील में विश्व कप शुरू होने के ठीक पहले ही मिले कहां से?  दो अनुमान लगाए जा रहे हैं: एक यह कि हो सकता है कि इंटरनेट सहित हर तरह के वैश्विक दूरसंचार को सुन और पढ़ रही ब्रिटेन की ‘जीसीएचक्यू’ तथा अमेरिका की  ‘एनएसए’ गुप्तचर सेवा से वे मिले हों. दूसरा यह कि फीफा के अपने ही लोगों ने उन्हें कहीं से उड़ाया और आगे बढ़ाया है. इस दूसरे अनुमान के पक्षधरों का कहना है कि ‘प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स’ कंपनी के जांचकर्ताओं ने 2012 में बिन हम्माम के गोरखधंधों की जांच की थी. उसी जांच के आधार पर बिन हम्माम को फीफा से दूसरी बार जीवन भर के लिए निलंबित कर दिया गया था. उस जांच संबंधी कागज-पत्र कहीं न कहीं तो रहे ही होंगे.

लगता है, भ्रष्टाचार का घुन विश्व फुटबॉल संघ को ही नहीं, उसके सदस्य देशों के फुटबॉल संघों को भी लग गया है. 2014 के विश्व कप के मेजबान ब्राजील के फुटबॉल संघ ‘सीबीएफ’ के अध्यक्ष रिकार्दो तेक्सेइरा, विश्व कप की तैयारियों के  ठीक बीच में दो साल पहले अमेरिका भाग खड़े हुए – आसन्न गिरफ्तारी से बचने के लिए. संघ में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार फिर भी पूर्ववत है. संघ स्वयं और उस की विश्व कप आयोजन समिति, दोनों, कोई जनहितकारी संस्था नहीं, बाकायदा व्यावसायिक कंपनियां हैं. लाभ कमाना उनका काम है. देश-भर में फैले 700 व्यावसायिक फुटबॉल क्लब ‘सीबीएफ’ की शाखाएं हैं. शौकिया या युवा खिलाड़ियों से उसे या उसके क्लबों को कोई मतलब नहीं. 2013 में ‘सीबीएफ’ ने 20 करोड़ डॉलर के कारोबार में ढाई करोड़ डॉलर का लाभ कमाया. उच्च पदाधिकारी ‘सीबीएफ’ के अपने जेट विमानों में घूमते-फिरते हैं और प्रमुख पदों पर अपने ही नाते-रिश्तेदारों को बिठाते हैं.

कहने की आवश्यकता नहीं कि भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी बीमारी है. कोई भी और कुछ भी उससे अछूता नहीं है. बड़े-बड़े खेल आयोजन तो बिल्कुल नहीं.

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