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महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडणवीस को फेसबुक पर जान से मारने की धमकी !

महाराष्ट्र के सतारा जिले में चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडणवीस के दौरे के मद्देनजर फेसबुक पर उन्हें जान से मारने की धमकी के चलते सुरक्षा व्यवस्था  और चाक चौबंद कर दी गई है। हैकिंग के अलावा अन्य कई गंभीर पहलुओं पर फोकस किया जा रहा है। 

 चार फरवरी को होने वाले एक कार्यक्रम में सीएम के साथ साथ 40 हजार लोगों को भी खत्म करने की बात कही गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पोस्ट का मजमून कुछ इस तरह है ‘आय एम अजमल कसाब, कल अजितदादा बच गया, अब सातारा मे सीएम मरेगा. 26/11 आतंकवादी हमला वैसे अब ऑपरेशन सातारा सीएम और40000 लोग खल्लास. 4फरवरी 2019, खंडाला, सातारा इलेक्शन दौरा, ‘

इसके पहले भी  पिछले साल नक्सलियों द्वारा सीएम फडणवीस को  मारने की धमकियां दी गई थी।

धरने पर बैठे ममता, पुलिस कमिश्नर

कोलकाता में रविवार शाम सीबीआई बनाम पुलिस की जंग का मामला गंभीर रूप धारण कर गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो मोदी सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगते हुए धरने पर बैठ गईं, उनके साथ पश्चिम बंगाल के पुलिस कमिश्नर भी धरने पर बैठ गए हैं। सम्भवता देश के इतिहास में यह अपनी तरह की पहली घटना है।

उधर चर्चा है कि सीबीआई इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जा सकती है। सीबीआई ने आज रात ही राज्यपाल से मिलने का वक्त माँगा है। दिल्ली में सीबीआई के बड़े अधिकारीयों की बैठक चल रही है जिसमें कानूनी राय ली जा रही है। हो सकता है सीबीआई आज रात की सुप्रीम कोर्ट जाए। 

सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव ने कहा है कि सीबीआई अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आधार पर ही पुलिस कमिश्नर से बातचीत के लिए गए क्योंकि सारदा चिट फण्ड मामले से जुड़े सभी कागजात उनके पास हैं। ”उन्हें हमने इस बारे में नोटिस भी भेजा था लेकिन वे कोआपरेट नहीं कर रहे थे। हमारे लोगों को आशंका है कि राजीव कुमार के पास उपलब्ध दस्तावेज नष्ट किये जा सकते हैं।” 

इस बीच देश के कुछ विपक्षी नेताओं ने ममता को समर्थन का ऐलान कर दिया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव, सपा नेता अखिलेश यादव, पूर्व पीएम देवेगौड़ा ने ममता के धरने का समर्थन किया है और इनमें से कुछ ने कहा है कि वे भी सोमवार को उनके धरने के समर्थ आ सकते हैं। यह भी ”आशंका” राजनीतिक हलकों में अब चलने लगी है कि केंद्र ममता  सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। 

इस बीच पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने बड़े पैमाने पर धरने-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। अभी तक की ख़बरों के मुताबिक कमसे कम दो जगह ट्रेन ट्रैक रोके गए हैं। देश में ममता की मोदी सरकार के खिलाफ इस मुहीम से हड़कंप मच गया है। विरोधी एकजुट होते दिख रहे हैं।

अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने भी फोन करके ममता से बात की है, हालांकि पश्चिम बंगाल के कांग्रेस प्रमुख अधीर रंजन चौधरी ने ममता के एक्शन का विरोध किया है। उनका कहना है कि यह भ्रष्टाचार का मामला है और जो कुछ हुआ है  नहीं किया जा सकता। ”यह जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही है लिहाजा जो कुछ हो रहा उसका समर्थन हम नहीं करते। नौबत धारा ३५६ ( राष्ट्रपति शासन/सरकार की बर्खास्तगी) की आ गयी है।”  

गौरतलब है कि मामला तब राजनीतिक रूप ले गया जब सीबीआई के करीब ३५ अधिकारी रविवार शाम पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के आवास पर पहुँच गयी। माना जाता है कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता था। पुलिस ने अपने कमिश्नर के घर सीबीआई के अफसरों के आने का विरोध कर दिया और उसके पांच अफसरों को गिरफ्तार कर लिया। 

अब पुलिस ने सीबीआई के उन पांच अधिकारियों को छोड़ दिया है जिन्हें पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। इस बीच कोलकाता में सीबीआई दफ्तर के बाहर सीआरपीएफ के जवानों को बड़ी संख्या में तैनात कर दिया गया है। 

इससे पहले पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के आवास के बाहर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले में मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया है कि देश में एमरजेंसी से भी बुरे हालात हैं और मोदी सरकार अब पुलिस अधिकारियों को भी प्रताड़ित कर रही है। ममता देर शाम मोदी सरकार के सीबीआई के इस दुरुपयोग के खिलाफ धरने पर बैठ गईं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि ”आज पुलिस कमिश्नर के घर सीबीआई छापे के पीछे मोदी और शाह हैं।” ममता ने साफ़ कहा है कि राजीव कुमार सबसे बेहतरीन अफसरों में एक हैं और मोदी-शाह की जोड़ी देश में एमरजेंसी से बुरी स्थिति बना रही है। उन्होंने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवल के इशारे पर आज का घटनाक्रम हुआ है। उन्होंने कहा पीएम मोदी इन सब हालात के लिए जिम्मेबार हैं और वे मोदी के हटने तक चुप नहीं बैठेंगीं।

ममता ने यह भी आरोप लगाया है कि सीबीआई प्रमुख मोदी के इशारे पर काम करते हैं। ”सीबीआई पर प्रधानमंत्री का दवाब है।” यह बहुत खराब स्थिति है। उन्होंने (मोदी-शाह) ने संबैधानिक संस्थाओं को तबाह करके रख दिया है।

सीएम ने कहा कि वे सीबीआई के रुख से आहत हैं। कोलकाता में सीबीआई बनाम पुलिस के बीच की आज की घटनाओं पर टिप्पणी की कि सीबीआई बिना सर्च वारंट के यहाँ पहुँची।  ”यह बहुत गलत है। मैं सभी राज्य पुलिस संस्थानों से आग्रह करूंगी कि वे केंद्र की मोदी की इस सरकार की ऐसी कार्रवाई के खिलाफ एकजुट हो जाएँ।”

उधर भाजपा ने आज की घटना और पुलिस का इस तरह साथ देने को असंबैधानिक बताते हुए ममता की कड़ी निंदा की है। 

अन्ना ने पद्म भूषण लौटाने की दी चेतावनी !

वरिष्ठ समाज सेवक अन्ना हजारेे ने सरकार को चेतावनी देते  हुए कहा कि  यदि 8 फरवरी तक उनकी मांगों पूरा नहीं किया गया तो वह पद्म भूषण सम्मान राष्ट्रपति को लौटा देंगे । अन्ना नेे कहा कि उन्होंने जो भीी समाज सेवा की है वह किसी सम्मान केे लिए नहीं  इसलिए उनका यह निर्णय सरकार के खिलाफ है।

लोकपाल एवं लोकायुक्त नियुक्त करने और किसानों के हित  में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की मांग को लेकर 30 जनवरी से अन्ना भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इस बीच सरकार की तरफ से वाटर रिसोर्सेज मिनिस्टर गिरीश महाजन एक बार फिर अन्ना से मिलने रालेगण सिद्धि पहुंचे लेकिन अन्ना ने स्पष्ट किया कि सरकार सिर्फ चर्चा में समय बिता रही है और उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 9 फरवरी तक उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो वह  पद्भूम भूषण सम्मान राष्ट्रपति को लौटा देंगे।अन्ना ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा 2013 के  इलेक्शन कैंपेन में मुझे याद करने वाली बीजेपी सरकार मुझे भूल गई है। कानून बन के 4 साल हो गए लेकिन अभी तक कानून को लागू नहीं किया जा सका है इससे पता चलता है कि बीजेपी सरकार इस मामले में गंभीर नही है।

देश में एमरजेंसी जैसे हालात: ममता

कोलकाता में सोमवार शाम सीबीआई बनाम पुलिस की जबरदस्त जंग के बीच पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के आवास के बाहर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले में मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया है कि देश में एमरजेंसी से भी बुरे हालात हैं और मोदी सरकार अब पुलिस अधिकारियों को भी प्रताड़ित कर रही है। ममता देर शाम मोदी सरकार के सीबीआई के इस ”दुरुपयोग” के खिलाफ धरने पर बैठ गईं।

इस बीच पुलिस ने सीबीआई के उन पांच अधिकारियों को छोड़ दिया है जिन्हें पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। करीब ३५ सीबीआई अधिकारी सारदा चिट फण्ड मामले में पुलिस कमिश्नर के घर पूछताछ के लिए पहुंचे थे। इस बीच कोलकाता में सीबीआई दफ्तर के बाहर सीआरपीएफ के जवानों को बड़ी संख्या में तैनात कर दिया गया है। 

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि ”आज पुलिस कमिश्नर के घर सीबीआई छापे के पीछे मोदी और शाह हैं।” ममता ने साफ़ कहा है कि राजीव कुमार सबसे बेहतरीन अफसरों में एक हैं और मोदी-शाह की जोड़ी देश में एमरजेंसी से बुरी स्थिति बना रही है। उन्होंने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवल के इशारे पर आज का घटनाक्रम हुआ है। उन्होंने कहा पीएम मोदी इन सब हालात के लिए जिम्मेबार हैं और वे मोदी के हटने तक चुप नहीं बैठेंगीं।

ममता ने यह भी आरोप लगाया है कि सीबीआई प्रमुख मोदी के इशारे पर काम करते हैं। ”सीबीआई पर प्रधानमंत्री का दवाब है।” यह बहुत खराब स्थिति है। उन्होंने (मोदी-शाह) ने संबैधानिक संस्थाओं को तबाह करके रख दिया है।

सीएम ने कहा कि वे सीबीआई के रुख से आहत हैं। कोलकाता में सीबीआई बनाम पुलिस के बीच की आज की घटनाओं पर टिप्पणी की कि सीबीआई बिना सर्च वारंट के यहाँ पहुँची।  ”यह बहुत गलत है। मैं सभी राज्य पुलिस संस्थानों से आग्रह करूंगी कि वे केंद्र की मोदी की इस सरकार की ऐसी कार्रवाई के खिलाफ एकजुट हो जाएँ।”

उधर भाजपा ने आज की घटना और पुलिस का इस तरह साथ देने को असंबैधानिक बताते हुए ममता की कड़ी निंदा की है।

कोलकाता में सीबीआई और पुलिस भिड़े

कोलकाता में हाई वोल्टेज ड्रामा हो गया है। लड़ाई भी सीबीआई और पुलिस के बीच हो गयी है। रविवार शाम सीबीआई टीम पश्चिम बंगाल के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर पहुँची लेकिन पुलिस ने टीम को रोक दिया। पता चला है कि पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी भी कमिश्नर के समर्थन में उनके घर पहुँच गयी हैं।

देश में अपनी तरह का यह पहला मामला है। तहलका की जानकारी के मुताबिक बंगाल पुलिस ने सीबीआई के उन दो अधिकारियों को भी डिटेन कर  लिया है जो पुलिस कमिश्नर के घर पहुंचे थे। करीब ३५ अधिकारी वहां पहुंचे थे।

यह भी जानकारी मिल रही कि बंगाल पुलिस ने सीबीआई के कोलकाता स्थित आफिस को घेर लिया है। स्थिति को बहुत गंभीर माना जा रहा है। सीबीआई की टीम शारदा चिट फण्ड  मामले में पुलिस कमिश्नर के घर आई थी। सीजीओ काम्प्लेक्स में यह सब हो रहा है।

आया एनडीए का चुनावी बजट, मझोली आमदनी को झुनझुना: किसानों को प्रसाद

जैसी अपेक्षा थी एनडीए सरकार ने अगामी चुनावों को ध्यान में रख कर अपना अंतिम बजट पेश कर दिया। यह अंतरिम बजट पियूष गोयल ने पेश किया। सरकार ने इस बजट में किसान, मज़दूर, और आम जनता के लिए बड़े-बड़े वादे किए। आम जनता खास तौर पर मध्य वर्ग वेतन भोगी लोगों को लुभाते हुए इस बजहट में आयकर के लिए सीमा को पांच लाख तक बढ़ा दिया गया। इस प्रकार जितनी आमदनी पांच लाख तक है उन  पर कोई आयकर नहीं लगेगा। इसका लाभ तीन करोड़ लोगों को होने की उम्मीद है।

इसके साथ ही छोटे किसानों को आकर्षित करने के लिए इस बजट में दो हैक्टेयर भूमि के मालिकों की न्यूनतम आय 6000 रु पए साल तय की गई। इसका लाभ 12 करोड़ लोगों को होगा। किसानों को यह पैसा सरकार 2000 की तीन किश्तों में सीधा किसानों के बैंक खातों में जमा करवाएगी। बजट में रेलवे के लिए 64,587 करोड़ रु पए रखे गए हैं। रक्षा क्षेत्र का बजट तीन लाख से ऊपर कर दिया गया। वित्तमंत्री ने यह भी घोषणा की कि यदि ज़रूरी हुआ तो रक्षा बजट और बढ़ाया जा सकता है। सरकार ने 15000 रु पए प्रति माह कमाई वालों के लिए पीएम श्रमयोगी मानधन को मंजूरी दी है।

फसलों न्यूनतम मूल्य की घोषणा करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार ने 22 फसलों के न्यूनतम खरीद मूल्य तय किए है। ये मूल्य फसल पर आने वाली कुल लागत में 50 फीसद और जोड़ कर तय किए जाएंगेे। बैंकों और डाकघरों में खुले खातों पर मिलने वाले व्याज पर अब आयकर लगने की सीमा 10,000 से बढ़ा का 40,000 कर दी गई है। पीयूष गोयल ने मानक कटौती सीमा (स्टेंडर्ड डिडेक्शन) को 40 हज़ार से बढ़ा कर 50 हज़ार कर दिया।

वित्तमंत्री ने बताया कि गायों के लिए सरकार कामधेनु योजना शुरू करेगी और मछली पालन के लिए भी आयोग बनेगा। पशुपालन और मछलीपालन के लिए दिए जाने वाले कजऱ् में दो फीसदी की छूट दी जाएगी। कामकाजी लोगों के लिए सरकार ने कहा कि वेतनआयोग की सिफारिशें शीघ्र लागू की जाएंगी और सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना आसान बनाई जाएगी।

बजट में ग्रेच्युटी की सीमा बढ़ा कर 20 लाख कर दी गई है। सरकार ने 21 हज़ार रु पए मासिक से कम वेतन पर काम करने वाले कामगारों को सात हज़ार रु पए का बोनस देने की घोषणा की है।

प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना को मंजूर कर लिया गया है। इसका फायदा 15000 रु पए तक वेतन पाने वाले हर कर्मचारी को होगा। कामगार की अचानक मौत होने पर उसे छह लाभ रु पए का मुआवजा मिलेगा। इसके अलावा जिनका ईपीएफ कटता है उन्हें छह लाख रु पए का बीमा प्रदान किया जाएगा।

आयकर छूट की सीमा को 2.5 लाख से बढ़ा कर पांच लाख करने से मध्य वर्ग को लाभ होगा। यदि कोई करदाता किसी सरकार की बचत योजना में निवेश करता है जो उसके लिए प्रभावी कर मुक्त आय की सीमा 6.5 लाख रु पए होगी। वित्तमंत्री ने कहा कि यह छूट देने से सरकारी खजाने पर 18,500 करोड़ रु पए का बोझ पड़ेगा।

वित्तमंत्री ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के 42 करोड़ कर्मचारी देश के 50 फीसद जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में अपना योगदान देते हैं। उन्होंने कहा कि पीएमएसवाईएम के तहत 60 साल की उम्र के बाद असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को हर महीने 3000 रु पए की पेंशन मिलेगी। इसके लिए पेंशनभोगियों को हर महीने 100 रु पए का योगदान देना होगा।

पीयूष गोयल ने यह भी बताया कि देश को पिछले पांच साल में 239 अरब डालर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) मिला। उन्होंने कहा कि इन पांच सालों में एफडीआई नियमों को बड़े पैमाने पर उदार बनाया गया। वित्तमंत्री ने कहा कि सरकार ने रक्षा, एकल ब्रांड खुदरा, एयरलाइंस और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में एफडीआई नियमों को सरल बनाया। अधिकतर क्षेत्रों में अधिकतम विदेशी निवेश हुआ है। इनमें कंप्यूटर सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर और दूृरसंचार शामिल है।

कालेधन पर वित्तमंत्री ने कहा कि इसके प्रति सरकार गंभीर है और इसे खत्म करके ही रहेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस दिशा में जो कदम उठाए हैं उनसे 1.30 लाख करोड़ रु पए की अघोषित आय का पता चला है। इसके अलावा 50,000 करोड़ रु पए की बरामदगी हुई है। नोटबंदी को देश हित में बताते उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद 2017-18 में 1.06 करोड़ से अधिक लोगों ने पहली बार आयकर रिटर्न भरी।

क्या है लोगों की चिंता : इस बजट की आलोचना करने वालों का कहना है कि जितनी और जैसी घोषणाएं वित्तमंत्री ने कर दी हैं उनके लिए पैसा कहां से आएगा। यह कहीं स्पष्ट नहीं होता। वैसे भी मौजूदा सरकार की वित्तीय हालत ऐसी है कि वह आरबीआई से उसके मुनाफे में हिस्सा मांग रही है। देखा जाए तो सरकार जिस तरह बैंकों की स्वायता में दखल दे रही है वह बहुत ही खतरनाक परंपरा शुरू कर रही है।

बजट में न तो बेरोज़गारी और न ही किसानों की समस्यायों को हल करने की कोशिश की गई। इसके बजाए वेतनभोगियों को खुश करने की कोशिश की गई है। वैसे सरकार ने जिस तरह से आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के लिए 10 फीसद आरक्षण की बात की था उससे लगता है कि आयकर छूट की सीमा आठ लाख रु पए तक होगी, क्योंकि उस योजना में $गरीबी की रेखा आठ लाख रु पए रखी गई है। इसके बाद विवादों का पिटारा तब खुलेगा जब मई 2019 में चुनाव हो चुके होंगे। ये जो रियायतें दी गई है वह कितनी व्यवहारिक साबित होंगी यह भी समय ही बताएगा।

इस बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व वित्तमंत्री पी चिंदबरम ने इसे – ‘वोट ऑन आकांऊट्स’ की जगह ‘अकाऊटस ऑन वोट’ की संज्ञा दी है। शशि थरूर ने इस बजट को ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली कहावत बताई।

तेलगुदेशम के सांसद वाईएस चौधरी ने कहा कि सरकार ने लोगों के उन घावों पर मरहम लगाने की कोशिश की है जो उसने पिछले पांच लाख में आम लोगों को दिए हैं। आप के पूर्व विधायक योगेंद्र यादव ने बजट को किसानों के जख्मों पर नमक बताया। उन्होंने कहा कि 6000 रु पए साल का अर्थ है हर महीने 500 रु पए। पांच लोगों के परिवार ने यह 3.3 रु पए प्रतिदिन के हिसाब से आता है जो कि मनरेगा और बुढ़ापा पेंशन से भी कम है।

देश की तीन विभूतियों को भारत रत्न

भारत रत्न से नवाजे गए प्रणब दा!

भाजपा के नेतृत्व में केंद्र की एनडीए सरकार ने कांग्रेस के कर्मठ कार्यकर्ता और देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से नवाजा है। कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को इस सम्मान से पुरस्कृत करने को देश का सम्मान माना है।

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद छोडऩे के बाद पिछले साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में नागपुर भी गए थे। जब वे देश के राष्ट्रपति थे तभी नरेंद्र मोदी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री बने थे। उस समय राष्ट्रपति की हैसियत से उन्होंने एनडीए सरकार की ओर से आए विभिन्न आर्डिनेंस को भी मंजूरी दी थी। राष्ट्रपति रहते हुए उन्होने देश को हमेशा आगे रखा।

कांग्रेस में रहते हुए वे केंद्र सरकारों में वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय में मंत्री पद पर भी रहे हैं।

वे इंदिरा गांधी की अगुवाई में 1969 में 34 साल की उम्र में पहली बार संसद में पहुंचे थे। जब कांग्रेस में विभाजन हुआ तो भी वे इंदिरा गांधी के ही साथ थे। जब देश में आपातकाल लगा तो उन्होंने उसका पुरजोर समर्थन किया । वे 2012 में राष्ट्रपति बने। जब भाजपा नेता नरेद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो इन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से जो सहयोग मिला उसकी तारीफ उन्होंने राष्ट्रपति पद से प्रणब दा की विदाई पर कही।

प्रणब मुखर्जी की देश की धर्मनिरपेक्ष, बहुल संस्कृति में हमेशा आस्था रही है। उनका कहना रहा है कि यदि धर्म, क्षेत्र, संस्कृति, घृणा और असहिष्णुता के आधार पर विभाजन की बात होगी तो उससे हमारी राष्ट्रीय पहचान को ही नुकसान पहुंचेगा।

भूपेन हजारिका को भारत रत्न: असम में खुशी

लोकसंगीत के साथ शास्त्रीयता के पुट से गायन को असम और पूरे देश में लोकप्रिय बनाने वाले भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने से खासी खुशी है। भूपेन की शिक्षा-दीक्षा गुवाहाटी, वाराणसी और अमेरिका में हुई। वे गायक, संगीतज्ञ, फिल्म निर्माता और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में पूरे देश में जाने जाते हैं। उन्होंने हिंदी, बांग्ला, असमिया में अनेक गीत गाए।

भूपेन हजारिका अंतरराष्ट्रीय सहयोग, समानता, शांति, एकता, आर्थिक और भाषाई समुदायों में एका की बातें करते थे और उसके लिए संघर्ष करते थे। उन्होंने अपने मुद्दों पर अलग-अलग मंच पर गायन किया है।

राजनीतिक पद न लेने वाले नानाजी देशमुख को भी भारत रत्न

नानाजी का पूरा नाम था चंडिकादास अमृतराव। उन्हें भारत रत्न देना पद का ही सम्मान है। उन्हें पूरे देश में ऐसे राजनेता के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने कभी कोई राजनीतिक पद नहीं लिया। वे लंबे समय तक जनसंघ में खजांची थे बाद में यह भाजपा बनी। उनका देश के उद्योगपतियों और किसानों -मज़दूरों के बीच विशाल परिचय क्षेत्र था। उन्होंने देश में हिंदू राष्ट्रवाद के विकास के लिए खासा काम किया। उन्होंने हमेशा ‘गांधीवादी समाजवादÓ पर जोर दिया। कई मुद्दों पर उनके और भाजपा के नेताओं में मतभेद थे। आखिर में वे चित्रकूट और गोंडा चले गए और पार्टी से ही कट गए। उन्होंने विनोवा भावे के भूदान आंदोलन में काम किया था। जय प्रकाश नारायण के ग्रामीण कार्यों में भी उनकी दिलचस्पी थी।

प्रियंका को नई कमान: तुरुप का इक्का या फिर कुछ भी नहीं!

राजनीति में प्रियंका को नई जिम्मेदारी सौंपना और खुद राहुल का इस बात की घोषणा करना यह बताता है कि कांग्रेस अपनी चाल खुद चलने पर भरोसा रखती है।

इससे यह  साफ है कि प्रियंका में जो करिश्मा है उसका लाभ देश की यह पुरानी पार्टी उठाना चाहती है।  पार्टी कितनी बेसब्र है यह इस बात से भी जाहिर है कि प्रियंका का चेहरा उनकी दादी इंदिरा के चेहरे से कितना मेल खाता है और प्रियंका में इंदिरा की इस झलक को पार्टी भुना लेना चाहती है।

अभी हाल ही में पार्टी ने राहुल ने नेतृत्व में खासा बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन लगता है कि पार्टी में अभी भी वह जोश नहीं आया है जिसके कारण पिछले चुनावों में इसे जीत हासिल होती थी। इस कमी को पूरा करने के लिए पार्टी ने प्रियंका का सहारा लिया है।

 इस साल यानी 2019 की चुनावी जंग में कांग्रेस में प्रियंका के आने की खबर के साथ ही भाजपा में मानों खलबली सी मची हुई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सेना के लोगों की ‘वन रैंक वन पेंशन’ की अर्से से चली आ रही मांग को एक नया अर्थ दे दिया है, ‘एक राहुल गांधी-कांग्रेस अध्यक्ष और उनकी बहन प्रियंका गांधी’। इस पर  फौरी टिप्पणी की जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने। उन्होंने कहा,’ यह ‘आडोमॉस’ का ओवरडोज है, सिर्फ मोदी और सिर्फ शाह के लिए’।

बहरहाल, तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा प्रियंका को। उनके एक हाथ की ओर तीर-कमान से लैस मोदी-शाह -योगी हैं। दूसरे हाथ हैं सपा-बसपा-रालोद। पहले हाथ की ओर खड़े तीरंदाजों को गजब का भरोसा है खुद पर जबकि दूसरे हाथ के गठबंधन ने अभी हाल में दो महत्वूपर्ण उपचुनावों में अपने रणनीतिक कौशल के झंडे गाड़ दिए थे। इस गठबंधन ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को दो ही सीटों के लायक समझा और उसके लिए रायबरेली और अमेठी की सीटें छोड़ीं।

प्रियंका के लिए यह सहज नहीं होगा कि वंशवाद का लाभ उन्हें मिले। बल्कि उनकी यह अग्नि परीक्षा होगी जब मौनी अमावस्या और शाही स्नान के मौके पर वे प्रयागराज के अर्धकुंभ मेले में गंगा-यमुना के संगम में डुबकी लगाने के बाद पूर्वी उत्तरप्रदेश में कांग्रेस महासचिव का पदभार ग्रहण करेंगी जिसकी उन्हें कमान दी गई है। पूर्वी उत्तरप्रदेश की सीमा में महराजगंज और कुशी नगर के पूरब में धौरहरा और खीरी और पश्चिम में पीलीभीत और रामपुर हैं।

पार्टी 1989 से इस नक्शे के बाहर रही है। अलबत्ता 2009 में लोकसभा की 21 सीटों पर कांग्रेस को कामयाबी हासिल हुई। इस साल की चुनावी जंग में कांग्रेस पार्टी कितना कुछ कर पाती है उसे देखना वाकई दिलचस्प होगा। कांग्रेस की रणनीति में आए बदलाव का क्या असर मायावती और ममता पर होगा जो देश के भावी प्रधानमंत्री होने का ख्बाब पाल रही थीं?  सेवानिवृत्त नौकरशाह और मायावती के पूर्व सहयोगी पीएल पूनिया कांग्रेस में हैं। वे किसी की हथेली की रेखाओं की तरह उत्तरप्रदेश को भी जानते समझते हैं। उत्तरप्रदेश की चुनावी जंग में अभिनय कौशल, जाति का गणित, दिल को छू लेने वाले नारे और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दे खासे हावी रहते हैं। बतौर वक्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही प्रभावित कर ले जाते हों लेकिन ‘अच्छे दिन’ का प्रलाप इस चुनाव में सिरे से गायब होगा।

प्रियंका गांधी के लिए कांग्रेस को ज़मीनी स्तर से जोडऩा बड़ा कार्य होगा क्योंकि आज इंदिरा गांधी को याद करने वाले मतदाता नहीं हैं बल्कि उनकी जगह मतदाताओं की एकदम नई पीढ़ी है। एक पुरानी पार्टी की राह में रोड़े बहुत हैं। इसमें सबसे बड़ी खामी है संगठन का अभाव। ऐसे में यह कहना ज़रा कठिन है कि प्रियंका को नई कमान का मिलना तुरुप का इक्का है या कुछ भी नहीं।

प्रियंका, सिंधिया और राहुल तीन तिलंगे, चुनावी जंग में

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने आगामी लोकसभा चुनावों के ठीक पहले अपनी छोटी बहन प्रियंका गाँधी के हाथों में सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान बतौर महासचिव सौंप कर और पश्चिमी उत्तरप्रदेश की बागडोर ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथों में देकर इस राज्य की राजनैतिक $िफज़ा ही बदल दी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए चुनावी गठबंधन के बाद अब तक जो राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस को हाशिए पर या चुनावी दौड़ से बाहर मान रहे थे वह भी अब दबी जुबां से कहने लगे हैं कि प्रियंका के आने से सभी पार्टियों के आकलन और समीकरण ध्वस्त हो गए हैं।

राष्ट्रीय महासचिव बन कर प्रियंका गाँधी का सक्रिय राजनीति में उस समय उदय हुआ है जब तीन राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधान सभा चुनावों में जीत के साथ हिन्दी हृदय प्रदेशों में उसकी सरकारें बनने से अन्य प्रदेशों में भी उसके कार्यकर्ताओं के हौसले बुलन्द दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में प्रियंका के सामने सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के संगठन को फिर से खड़ा करने की कठिन चुनौती है।

यह कहना सही न होगा कि प्रियंका के आने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की दशा और दिशा में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। पिछले दिनों उनके पति रॉबर्ट वाड्रा अपने बिज़नेस डीलों को लेकर विभिन्न जाँच एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं। नेपथ्य में पार्टी के जाने का संकट और घरेलू मोर्चे पर बढ़ती जा रही कठिनाइयों का जवाब देने के लिए जिस दृढ़ता के साथ प्रियंका राजनीति में आई हैं उसे देख कर उनके विरोधी राजनीतिक दलों के कार्यकर्त्ता भी उनमें नेतृत्व की असीम संभावनाएं तलाश रहे हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में सुल्तानपुर, अमेठी, फैज़ाबाद, रायबरेली, प्रतापगढ़, इलाहाबाद,  फूलपुर, फतेहपुर, जौनपुर, भदोई, मिजऱ्ापुर, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, गाज़ीपुर, बस्ती, गोंडा,बहराइच, और गोरखपुर जैसे जिले आते हैं जो कभी नेहरू परिवार के गढ़ हुआ करते थे। प्रियंका गाँधी को आधे उत्तर प्रदेश की संसदीय सीटों पर अचेतावस्था में पड़ी पार्टी के लिए संजीवनी बन कर पार्टी संगठन को जिन्दा करने और 40 लोक सभा सीटों पर चुनाव अभियान चलाने का प्रभार सौंपा गया है जो किसी भी प्रादेशिक नेता के बलबूते के बाहर था।

भारतीय जनता पार्टी के हर छोटे -बड़े नेता यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे परिवारवाद बताते हुए प्रियंका पर निशाना साधा है। भाजपा के नेताओं ने प्रियंका के राजनीति में पूर्णकालिक सक्रिता को तवज्जो न देते हुए उनके आगमन को राहुल गाँधी की विफलता की संज्ञा दी। केन्द्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि ‘परिवार शासित पार्टी में ऐसा कदम कोई असामान्य बात नहीं है।’ भाजपा के अतिमुखर प्रवक्ता संबित पात्रा ने तंज़ कसा कि ‘अचानक राजनीति में प्रियंका के आने से साफ हो गया है कि राहुल गाँधी फ्लॉप हो गए।’ यही बात लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी दोहराई।

प्रियंका गाँधी ने 2012 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी में गली-गली प्रचार किया था. लेकिन नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहे। रायबरेली की 5 विधानसभा सीटें, सरेनी, बछरावा, हरचंदपुर, सरेनी, ऊंचाहार से कांग्रेस हार गई थी। जबकि इसी चुनाव में सपा ने यहां से चार सीटें जीती। इसी तरह से अमेठी की चार विधानसभा सीटों में तिलोई, सलोन, गौरीगंज, अमेठी, जगदीशपुर में कांग्रेस सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी। इन तर्कों को देकर भाजपा के नेता यह मानने को तैयार नहीं हैं कि प्रियंका के आने से उनकी पार्टी के भविष्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तब प्रियंका अपने भाई और माँ के प्रचार भर की जि़म्मेदारी निभाती थी पर आज वह पूरी तौर से राजनीति में प्रवेश कर के स्टार प्रचारक की भूमिका में रहेंगी तो बात अलग होगी।

प्रियंका गाँधी को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा जिन परिस्थितियों में बनाया गया है उसमें काँटे ही काँटे हैं। 1989 से इस राज्य में पार्टी ने सत्ता का मुँह नहीं देखा है। 1991 में राजीव गाँधी की आतंकवादी हिंसा में हुई हत्या के बाद से ही सत्ता की धुरी उत्तर भारत से हट कर दक्षिण भारत के पी.वी. नरसिंह्मा राव के हाथ में चली गई जिससे उत्तरोत्तर इस राज्य में कांग्रेस संगठन का अस्तित्व मिटने लगा। कार्यकर्त्ता सत्ता सुख से वंचित होने के कारण मुख्य धारा से अलग थलग पडऩे लगे। कार्यकर्त्ताओं का जमावड़ा वहीं होता है जहाँ से उसके चार काम होते हैं, बनते – बिगड़ते हैं।

सत्ता विमुख तीस साल के अन्तराल में कांग्रेस का संगठन रसातल में चला गया। राज्य में जो भी बड़े नेताओं के गुट हैं उनमें कभी परस्पर एकता नहीं रही। इसलिए लोकतांत्रिक ढंग से मिल बैठ कर निर्णय लेने की बजाय सब के सब छोटे से छोटे मुद्दे पर भी हाई कमान का मुँह देखने लगे जिससे राज्य में नारायण दत्त तिवारी के बाद कभी सर्वमान्य नेतृत्व नहीं उभर सका। प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में रीता बहुगुणा जोशी ने पार्टी को सक्रियता दी थी पर वह भी इन छत्रपों की राजनीति का शिकार हो गईं और उनकी जगह पर आए फिल्म अभिनेता राज बब्बर पार्टी को उबारने में विफल रहे। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ प्रियंका गाँधी ही ऐसी शख्सियत थीं जो कांग्रेस में निर्विवादित सर्वमान्य नेता हो सकती थीं जिन्हें लेकर प्रदेश के छत्रपों में कोई खींचतान नहीं है।

अब जबकि लोक सभा चुनाव में 100 से भी कम दिन रह गए हों, तो प्रियंका से कोई रातों-रात जादूई करिश्मे की उम्मीद कुछ ज्यादा होगी पर प्रदेश के कॉंग्रेसजनों में जिस तरह से इस घोषणा के बाद से जोश व जवानी चढ़ती दिख रही है उससे मृत पड़े संगठन नई जान आ गई है। प्रियंका किस तरह से पार्टी से नाराज चल रहे कार्यकर्ताओं और विमुख हो कर पलायन कर चुके या दूसरी पार्टियों में जा चुके पुराने लोगों को पुन: मना कर अपने साथ लातीं हैं, यह देखना कौतूहल भरा होगा।

कांग्रेस पार्टी में अपनी दम पर बिना किसी अन्य राजनीतिक दलों से गठबंधन किए चुनाव लडऩे का फैसला तब किया जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश में उसके अस्तित्व को नकारते हुए बस दो सीटें राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी के लिए छोड़ कर उसके बचे खुचे जनाधार को भी चुनौती दे डाली। यह अपमान टीम राहुल पचा नहीं सकी और तीन राज्यों में जीत से उत्साहित कांग्रेस ने ‘एकला चलो रे’ का रास्ता पकड़ लिया जो अब उसके लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। प्रियंका के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परम्परागत दलित-मुस्लिम वोट को जोडऩा है जो बाबरी मस्जि़द टूटने से नाराज़ हो कर या विकल्पहीनता के कारण उससे छिटक कर अन्य दलों में चला गया है। ये आसान काम नहीं है पर ये लोग जिन दलों में भी हैं वहाँ भी उपेक्षित हैं और जातीय समीकरणों से घुटन महसूस कर रहे हैं। ऐसे में वोटों का ध्रुवीकरण निश्चित रूप से होना ही है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कानपुर और लखनऊ में बूथ अध्यक्षों और उनसे ऊपर के पदाधिकारियों के साथ 30 जनवरी को बैठक कर के चुनावी तैयारियों का जायज़ा लिया और बूथ मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी। कानपुर के निरालानगर और लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में बैठकों में लगभग 50 हज़ार से अधिक पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की उपस्थिति का दावा किया गया। इससे पहले मुख्यमंत्री आवास 5 कालिदास पर भाजपा कोर ग्रुप की बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महामंत्री संगठन सुनील बंसल, प्रदेश अध्यक्ष डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय और सभी सहप्रभारियों पार्टी की अगली रणनीति की रूपरेखा पर विचार- विमर्श किया। प्रियंका की पूर्वांचल में सक्रियता के कारण भी पार्टी को चुनावी अभियान व रणनीति में कुछ परिवर्तन करने पड़ सकते हैं।

हर गरीब को देंगे हम न्यूनतम आमदनी: भरोसा दिया राहुल ने

देश के गरीबों को राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव है हर महीने न्यूनतम आमदनी का। इनके साथ सिर्फ शर्त यह है कि इस साल हो रहे आम चुनावों में कांगे्रस को वोट दिए जाएं। गरीबी से मुक्ति का यह अनूठा प्रस्ताव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 28 जनवरी 2019 को दिया। देश के अर्थशास्त्री भी कहते हैं कि यह एक बड़ा फैसला है राष्ट्रीय कांग्रेस का। सत्ता में यदि कांग्रेस आती है तो वह गरीब को गरीबी की रेखा से उठा सकती है। सरकार पर उतना आर्थिक दबाव भी नहीं होगा।

आम तौर पर देश में आम चुनाव के पहले अंतरिम बजट लाने की व्यवस्था रही है लेकिन भाजपा ने नेतृत्व की एनडीए सरकार उसे भी मानने से गुरेज करते हुए पूरा बजट पेश कर रही है। बजट को पहली फरवरी को पेश

करने के ऐन पहले कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हर गरीब को न्यूनतम आय की घोषणा करके पूरी एनडीए सरकार को चकित कर दिया। उधर देश के गरीबों ने राहुल की इस घोषणा का स्वागत किया है।

राहुल गांधी ने कहा, ‘हम नया भारत नहीं बना सकते यदि देश के लाखों हमारे भाई बहन गरीबी की रेखा से नीचे जीवन जीने का संघर्ष दिन-प्रतिदिन कर रहे हैं। हम भारत के अंदर दो भारत (एक अमीर और दूसरा गरीब) नहीं चाहते। कांग्रेस ने यह तय किया है कि देश में सत्ता पाते ही वह देश के हर गरीब व्यक्ति को न्यूनतम आमदनी मुहैया करेगी जिससे वह जीवन निर्वाह कर सके। इससे पेट की भूख बुझेगी और गरीबी हटेगी। यह हमारा नज़रिया है और वादा है।’

राष्ट्रीय कांगे्रस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में नया रायपुर में यह सार्वजनिक घोषणा की। कांग्रेस ने यह घोषणा करके एक तरह से नहले पर दहला दागा। ऐसे संकेत थे कि भाजपा बजट में किसान मित्र, समाज के मझोले वर्ग के प्रति उदार और देश के अमीरों और गरीबों के लिए हर महीने यूनिवर्सल आमदनी की घोषणा कर रही थी। कांग्रेस के आंतरिक सूत्रों के अनुसार पिछले कई वर्षों से कांग्रेस देश-विदेश के नामी अर्थशास्त्रियों, स्वयं सेवी संगठनों भारतीय वित्त संगठनों के विशेषज्ञों से इस योजना पर लगातार बातचीत कर रही थी।

कांगे्रस के नेतृत्व में बनी यूपीए सरकारों के दौर में शुरू हुई और सराही गई योजना थी मनरेगा जिस मेें वर्तमान सरकार ने खासी कटौती की लेकिन अब फिर उसे बढ़ावा दिया है। कांगे्रस के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम  इस योजना के अध्यक्ष हैं और उन्होंने यह बताया कि यह योजना हमारे देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए इस योजना की कामयाबी मील का एक पत्थर साबित होगी। कांग्रेस इस प्रस्ताव को आम चुनाव के अपने मैनीफेस्टो में भी रखेगी। जिसमें  इस योजना संबंधी ब्यौरा भी होगा। यह जानकारी भी साफ-साफ होगी इसे अमल में लाते हुए धन कहां- कैसे जुगाड़ा जाएगा।

यूपीए सरकारों के दस साल में कांग्रेस ने अपनी नीतियों मसलन ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और अहम सुरक्षा कानूनों से 14 करोड़ गरीबों के घरों में भूख की समस्या दूर की थी। उसी नीति की कामयाबी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस अब गरीबी उसी नीति की कामयाबी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस अब गरीबी की रेखा से नीचे शहर या गांव में रहने वाले हर घर को मासिक न्यूनतम आमदनी का प्रस्ताव देती है जिससे उस परिवार का भी जीवन स्तर सुधरे और वह भूख के कारण अभाव में न रहे। गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की पहचान उनके आर्थिक-सामाजिक ढर्रे को देखते-समझते हुए की जाएगी।

गरीबों से भी गरीब की आमदनी में सुधार होने से भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत के अनुरूप विकास होगा। इसे यूपीए राजकाज के दौरान जाना-परखा भी गया था। उस पर लगातार काम करते रहने के बाद कांग्रेस ने न्यूनतम आमदनी की संभावना पर तमाम आर्थिक विशेषज्ञों से राय-बात की फिर इसे अपना चुनावी प्रस्ताव भी बनाया।

कांगे्रस अध्यक्ष का कहना है कि ‘यदि 2019 में जनता हमें देश में राज चलाने का मौका देती है तो कांगे्रस हर गरीब व्यक्ति को न्यूनतम आमदनी की गारंटी देती है जिससे वह भूख को शांत कर सके और गरीबी से मुक्त होने के लिए सतत सक्रिय रहे। यह हमारा नज़रिया ही नहीं बल्कि वादा भी है।’

पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के अनुसार भाजपा के नेतृत्व की एनडीए सरकार के बजट में जिस यूबीआई (यूनिवर्सल बेसिक इन्कम) का उल्लेख है उस पर पिछले दो वर्षों में काफी राय-मश्विरा हुआ। इसमें पता लगा कि सारी सब्सीडी खत्म कर दें तो यह ठीक होगी। लेकिन कांग्रेस ने पाया कि इससे बेहतर मनरेगा इसलिए है क्योंकि यह धन समाज के जिन तबकों को ज़रूरी है सीधे वहीं पहुंचता है। संपन्न लोगों के लिए उसकी कोई ज़रूरत है भी नहीं। इसलिए बेहद गरीब तबकों में भूख से पहला मुकाबला फिर खुद को अन्य ज़रूरतों की पूर्ति के लिए तैयार करने के यदि गरीबों से भी गरीब परिवारों में न्यूनतम आय की ही व्यवस्था सरकार की ओर से कर दी जाए तो उन्हें जि़ंदगी में अगली उछाल का अवसर मिल सकेगा।’ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने बताया।

‘कांग्रेस की कोशिश यही है कि देश से गरीबी से नीचे की गरीबी जल्द से जल्द पूरी हो। यदि देश की जनता ने मौका दिया तो देश से गरीबी दूर हो जाएगी। गरीब की इस खाने में छोटे किसान और भूमिहीन किसान और दूसरे समुदायों के तमाम लोग आ जाएंगे। यानी पूरी आबादी के 40 फीसद लोग।

भारत के आर्थिक सर्वे (2016-17) में आज़ाद संपत्ति कोष ‘सावरेज वेल्थ फंड’ का जिक्र है साथ ही नागरिकों की हिस्सेदारी की भी। कांगे्रस नेताओं का मानना है कि न्यूनतम आमदनी का वादा यूपीए सरकारों द्वारा गरीबी हटाओ कार्यक्रमों का ही विस्तृत रूप है। इससे देश की 40 फीसद आबादी को मदद मिलती है। राहुल गांधी की यह घोषणा पूरे देश की आर्थिक तस्वीर बदलने में सक्षम है। वे लगातार बेरोज़गारी नौकरियों का न होना और कृषि कर्ज की माफी की बात अपने भाषणों में करते रहे हैं। उस लिहाज से उन्होंने कांगे्रस की ओर से देश की जनता को एक विकल्प सुझाया है।