‘आजादियों की गुलामी’

इस कड़ी में याद रखना होगा की यही पश्चिम राष्ट्रों का वह गिरोह है जिसने 70 और 80 के दशक में पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, इराक, मिस्र, इंडोनेशिया सहित तमाम एशियाई देशों में उदार, आधुनिक और सेक्युलर शासकों का तख्ता पलट करवाकर अपने पिट्ठू गद्दीनशीन करवाए थे. इन पिट्ठुओं ने अवाम के बीच वैधता पाने के लिए अल्लाहमियां का एजेंट बन धार्मिक कट्टरवादी अनुकूलन का सहारा लिया. मोसद्दिक, भुट्टो, नजीबुल्लाह जैसे अवामी सेक्युलर शासकों को मौत के घाट उतारकर अमेरिकी पिट्ठुओं को धार्मिक कट्टरता के सहारे लाचार अवाम पर थोपने का अपराधी पश्चिम, अब जेहादियों, तालिबानों, ‘इस्लामिक-स्टेट’ से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध लड़ने का ढोंग कर रहा है.

ऐसे सियासी चक्रव्यूह में घिरे और पश्चिम की नफरत के शिकार समाजों में इस्राइल-अमरीका-यूरोप द्वारा पैगंबर साहब का वस्त्रहीन अश्लील, बेइज्जत करता हुआ कार्टून बनाकर अगर कोई प्रगतिशीलता लाने का सपना देख रहा है तो उसने इसके नतीजों पर भी गौर किया होगा. दशकों से पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण के शिकार और भ्रष्ट राजतन्त्र से आजिज नौजवान जब फिदायीन बन खुद को उड़ा सकते हैं तो पेशावर-पेरिस में दूसरों को मारकर, मर भी सकते हैं. जो खुद मरने ही आया है उसे आप कौन-सी सजा दे देंगे?

भारत का संविधान, जिसे एक प्रोग्रेसिव और आधुनिकता का वाहक-दस्तावेज माना जाता है, उसमें भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार  कुछ जरूरी सावधानियों से लैस है

लेकिन मसला तो ये है की एशिया-अफ्रीका के समाजों में धर्म की सियासत को सहिष्णु, सुधारवादी और सहनशील बनाने में लगे उदारवादी, आधुनिक लोग कैसे अपनी मुहिम जारी रखें? जो शार्ली हेब्दो अपने पन्नों पर यहूद-मुखालिफत और इस पर कार्टून की इजाजत नहीं देता उसी शार्ली हेब्दो के मुहम्मद साहब पर बनाए अश्लील कार्टून का लिबरल-मॉडरेट मुसलमान समर्थन करें? ये कैसा इम्तेहान है? आखिर ये धर्म के मूल में आस्था रखनेवाले लोग हैं. इनको अल्लाह और उसके पैगम्बर पर भरोसा है. ये उस मुल्ला वर्ग के विरोधी हैं जिन्होंने धर्म की डरावनी और जड़ व्याख्याएं करके समाज को अपना गुलाम बनाया और तालिबान, बोको हरम, इस्लामिक-स्टेट जैसे संगठनो को विश्वसनीयता प्रदान की. मेरा दावा है की पेशावर-पेरिस काण्ड करनेवाले अपराधी किसी न किसी सिद्धांतकारी उलेमा-गिरोह के प्रभाव में हैं, लेकिन मीडिया, पश्चिम जगत और सिविल सोसाइटी उधर से आंख मूंद लेता है.

खैर, 1990 के बाद से जब दुनिया भर में साम्यवादी व्यवस्थाएं खत्म हुईं, तभी से ऐसे भस्मासुर पैदा किए गए जिनको दिखाकर हथियार उद्योग को सरसब्ज रखा जा सके. तेल के कुओं पर अवैध कब्जा, हथियार मंडी पर कब्जा, और दुनियाभर के बाजारों पर कब्जा जिन्हें हर हाल में चाहिए उन्हें कट्टरवाद और धार्मिक श्रेष्ठतावाद की खेती करनी ही है.

लेकिन हमें शिकायत उस सिविल सोसाइटी, मीडिया और प्रगतिशीलता से है जो आजादी विरोधी फतवों पर तो फिक्रमंद होती है, लेकिन जब शिक्षित-प्रशिक्षित आम मुसलमानों को किराए पर मकान नहीं मिलता तो आंखें मूंद लेती है. जो शर्ली हेब्दो के कार्टून का समर्थन करती है पर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के कार्टून में आहत भावनाओं की कद्र करती है, जो प्रोफेसर आशीष नंदी से दलितों के प्रति नस्लवादी बयान के लिए माफी मंगवाती है पर प्रवीण तोगड़िया के मुसलमानों को बेइज्जत करनेवाले सैकड़ों बयानों पर दूसरी तरफ देखने लगती है, जो असम के नरसंहारों को तो सामान्य अपराध मानती है पर पेशावर के नरसंहार को इस्लामी कृत्य मानती है, जो उपराष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी के प्रोटोकॉल के पालन को देशद्रोह कहनेवालों से सवाल तक नहीं करती.

सियासी सहीपने के आग्रहों से आजिज आ कर एक मुसलमान ने ‘Muslim iCondemn app’ बना लिया है, जिसे रोज मोबाइल फोन में क्लिक करके दुनिया के किसी भी कोने में मुसलमान द्वारा किए गए अपराध की निंदा कर हम भी जवाबदेही से मुक्त हो जाएंगे. बाकी तो जैसा अमेरिका बहादुर तय करे.

1 COMMENT

  1. किसी पिछड़ी हुई कौम की हर हरकत पिछड़ी हुई कहलाती है। प्रगतिशीलता में उस कौम का कोटा नहीं है। वो जो भी करे पिछड़ापन ही है। मुसलमान सिर्फ वोट बैंक है और उसका विमर्श एक छलावा है। और अरब समेत मुसलिम देश विलासता में मसरूफ हैं, उन्हे फर्क नहीं पड़ता कि किसी मुल्क में उनका पिछलग्गू किस हाल में है, फर्क सिर्फ इस ग़रीब मुसलमान को पड़ता है – कोई सऊदी को गाली दे दे तो उसका खून खौलता है। उसके लिए सऊदी उसके मज़हब का हिस्सा है। ये एक गुलामी है। वक्त आ गया है कि इन ज़ंजीरों को तोड़ कर मुसलमान आगे निकले। शीबा जी आपका ये लेख वाकई आंखे खोल देता है। एक एक शब्सद आइना है। मुबारकबाद। लिखती रहिये।

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