‘महाभारत से बेहतर संभवत: दुनिया में कुछ नहीं लिखा गया’

जब जमीन पर हाथ रखते हैं बुद्ध हर बार,
तो वह पूछती है यदि सत्य है
तो पूछते क्यों हो.

क्योंकि मैंने कोशिश की है
और समझ नहीं पाया हूं
कि फल और कर्म क्यों मिल
जाते हैं

मनुष्य के सपने में,
क्योंकि मैं नहीं समझ पाता कि जीवन की
अर्थहीनता सहते हुए भी रोजमर्रे की निराशा क्यों तोड़ देती है,
क्योंकि मृत लोगों की आकांक्षाओं का भार भी

न उठा पाने के कष्ट को संतोष से
ढंकना कठिन हो रहा है,
क्योंकि अपनी उम्मीदों के टोकरे को
सिकोड़ कर मैंने एक अंगूर बना दिया है
वह जब सड़ जायेगा, तो इसकी शराब पीते हुए
देखूंगा कि क्या अन्य भाग गये हैं
यह कहकर – ‘पता नहीं ऐसा क्यों हुआ?’

मुझे बेचारा मत कहो बेचारों,
मुझे मृत कहो,
मृत्यु ही पिछली शताब्दी की
सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है,
तुम रुककर देखो अपने दुःख दूसरों के आंसुओं में
और जानो कि परिष्कार यही है.

हिंसा की मशीन बत्ती जाने पर
और तेज चलती है
और अकारण विश्वयुद्धों में
करोड़ों का नरसंहार वह खेल था
जो प्रकृति ने रचा था
यह बतलाने के लिए कि मूलतः
कुछ नहीं बदलता और मनुष्य
हर क्षण बदलता रहता है.

मशीन के बाद शक्ति आयी
और याद रखो कि सत्य को जो मार पाये
वह बड़ा सत्य होता है,
हमें एतराज है उन लोगों से
क्योंकि भिन्न सोचते हैं
हिम्मत का प्याला सबसे पहले हमारे पास आ गया था
और हमने ही सबसे ज्यादा पिया है
ज्ञान वही है जो हमें हो, प्रेम वही जो हमसे हो
क्योंकि लोग यदि मुझे पसंद करेंगे

तो मैं सच हूं.
या कम से कम वह हूं
जो सच का उत्स है, आधार है,
जैसे सूरज रोशनी का इस
ब्रह्माण्ड में.

मुझे नहीं पता सच क्या है,
हो सकता है आपको भी न पता हो
इसलिए धर्म और कानून और विज्ञान का विष
सुकरात को पिला देते हैं.
आखिर प्रश्न से बड़ा है उत्तर,
संकोच से बड़ा है संदेह,
अनिश्चित अंतःकरण से बड़ा है आत्मविश्वास,
रात में आसमान अंधेरे में नहीं खिलता,
नये बल्ब से सब जगमगा जाता है!

तिलक प्रश्न करते हैं कि क्या मेरा
खामोश बलिदान चाहिए
मेरे देश को
हम उत्तर देते हैं
कि यह काफी है
वैसे भी हम खुश हैं
सभ्यता जाए चूल्हे में.
तिलक देश की और
हम अपनी लाज बचाकर
चले जाते हैं.

शक्ति के बाद आती है क्रांति
जिस पर सिर्फ हमारा अधिकार है
क्योंकि दूसरे झूठे हैं,
केवल हमारा भगवान सच है
क्योंकि केवल हममें दूसरों को गाली देने की हिम्मत है.

हम सबके लिए लड़ रहे हैं
आखिर हम पर आक्षेप तो
रेगिस्तान की रेत पर ओस की
तरह है.
और क्रांति में हिंसा तो शेर की दहाड़ की तरह है.
मूर्ख, शिकार करते समय शेर दहाड़ता नहीं.

यदि हिंसा के विरुद्ध अहिंसा जीत भी जाए
तो उसे इतना अपमानित करो कि
वह विकृत हो जाये और लोग पहले
दूसरों के प्रति अपने सम्मान से और फिर
खुद से नफरत करने लग जायें.
आखिर सफलता ऐसे ही नहीं आती,
मेहनत करनी पड़ती है.

मैं जीने के कारण मर रहा हूं,
किसानों को देख रहा हूं
मैं उनकी फसल हूं
इस साल भी ठीक से नहीं उग
पाया हूं,
वे निराष हैं, मैं निराश हूं,
यह क्षमाप्रार्थी नियति है और
असम्भव आकांक्षाएं हैं,
इन्हें मैं बांट नहीं पा रहा.

क्रांति के बाद आता है संदेह
जो अब पाप है और जिसे पवित्रता की
दरकार भी नहीं
क्योंकि एक समाज ऐसे भी चल रहा है.
अखबारों और संसदों से परे
यह समाज ऐसे ही चल रहा है.

यह नया पागलपन है क्योंकि
बाकी सारे पागलपन अब आदर्श हो गये हैं.
हम खुद के कल्याण के रास्ते में
खुद पर समय व्यर्थ नहीं कर सकते,
जीवन का आकाश अब परछाईं है
सिर्फ एक कदम दूर, हमेशा.

चलो, इसका इलाज हो सकता है
इतना सोचने से कुछ नहीं मिलता
और जो नहीं मिल सकता

वह पाने योग्य नहीं है.

[/box]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here