गहरे दुष्चक्र में शिक्षा

जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा होता गया, इसकी उपयोगिता कुछ कुशल पेशेवर इंजीनियर और रट्टामार अफसर निकालने तक सीमित रह गई.   आखिर क्यों?

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उनकी सक्रियता ने हाल के दिनों में बुरी तरह उपेक्षित शिक्षा के एजेंडे को बहस के केंद्र में ला दिया है. उनके प्रस्तावों में शिक्षा को लेकर एक आधुनिक दृष्टि और समझ भी दिखती है. स्कूली बच्चों की पढ़ाई को अंकों के दबाव से मुक्त रखने की बात हो या नर्सरी में दाखिले की न्यूनतम उम्र तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष करने का सुझाव, या फिर दसवीं और बारहवीं में गणित और विज्ञान की पढ़ाई एक करने का इरादा- इन सबमें वह जरूरी संवेदनशीलता है जिसकी कमी शिक्षा में अरसे से महसूस की जा रही है.

लेकिन शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां कहीं ज्यादा गहरी हैं, उसके सवाल कहीं ज्यादा नुकीले हैं. चाहे बिलकुल प्राथमिक स्तर की शिक्षा हो या उच्च शिक्षा- एक बहुपरतीय गैर-बराबरी के अलावा डरावनी अराजकता से लेकर भ्रष्टाचार तक हमारी शिक्षा व्यवस्था के लगभग स्वीकार्य अंग बन चुके हैं. मिसाल के तौर पर यह प्रश्न किसी को तंग नहीं करता- अब तक हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री को भी नहीं- कि स्कूली शिक्षा में सरकारी और निजी स्कूलों के अलग-अलग स्तर अपनी जड़ता में ऐसी सामाजिक गैर-बराबरी की बुनियाद रखते हैं जिससे उबरना अगर असंभव नहीं तो काफी कठिन जरूर हो चुका है.

आलम यह है कि बच्चे का स्कूल तय होते ही तय हो जाता है कि वह भविष्य में क्या बनेगा. अगर वह ठेठ सरकारी स्कूलों में जा रहा है तो उसकी पढ़ाई बीच में टूट जाएगी या किसी तरह दसवीं-बारहवीं पास कर वह चपरासी या इसके आसपास के कुछ पदों की शोभा बढ़ाएगा. अगर वह आम प्राइवेट स्कूलों में पढ़ता है तो क्लर्क से लेकर अफसर तक की नौकरी में कहीं खप जाएगा. अगर वह महंगे पब्लिक स्कूल का छात्र है तो आईएएस बनेगा या आईआईटी-आईआईएम जैसे अभिजात्य संस्थानों का महत्वाकांक्षी छात्र और भविष्य का आला अफसर या मैनेजर होगा. अगर वह सबसे ऊंचे स्कूलों में पढ़ता है या विदेश में पढ़ाई करके लौटता है तो इस देश पर राज करेगा.

निश्चय ही इस नियम के अपवाद भी हैं. सरकारी स्कूलों के बच्चे भी आईआईटी जैसी प्रतियोगिताओं में कामयाब होते हैं और पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी नाकाम रहते हैं, लेकिन ये अपवाद असल में इस नियम की पुष्टि ही करते हैं. दूसरी बात यह कि सरकारी और निजी के बीच का यह फर्क और फासला हाल के दशकों में ज्यादा तेजी से बढ़ा है. इस फासले के बीच शिक्षा ऐसा निवेश हो गई है जिसमें संसाधन झोंके जा सकते हैं. अलग-अलग इम्तिहानों के लिए ट्यूशन से लेकर कोचिंग तक एक पूरा इंतजाम है और जो इस इंतजाम का लाभ ले सकता है वह कामयाबी के कुछ नुस्खे हासिल कर सकता है.

इसलिए जब कपिल सिब्बल दसवीं और बारहवीं के पाठ्यक्रम एक करके सबको बराबरी के मौके देने की बात करते हैं तो लगता है कि यह चांद पर जाने के लिए सीढ़ी बनाने का काम है. शिक्षा की असमानताएं पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पाठ्यक्रम में वे सबसे कम और सबसे देर से दिखती हैं, सबसे ज्यादा वे उस बुनियादी ढांचे में हैं जो इस देश में शिक्षा के तंत्र को नियंत्रित करता है. कहा जा सकता है कि जो सामाजिक गैर-बराबरी है, वही स्कूली गैर-बराबरी में झांकती है और एक असमान समाज में सिर्फ स्कूली तंत्र से बराबरी के मौके पैदा करने की उम्मीद करना गलत है.

इन दिनों कोई मेधावी छात्र हिंदी, संस्कृत, इतिहास, मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र जैसे विषय पढ़ने तक को तैयार नहीं होता, क्योंकि उसे मालूम है कि इन विषयों के अध्ययन से न नौकरी मिलेगी न सम्मान

लेकिन यह तर्क दरअसल उसी दृष्टि से संचालित है जिस दृष्टि से कपिल सिब्बल का दसवीं और बारहवीं के पाठच्यक्रम एक करने का इरादा निकलता है. यह दृष्टि जैसे दसवीं और बारहवीं में गणित और विज्ञान की पढ़ाई को इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगिताएं पास करने का जरिया मानती है. अंतत: यह वह दृष्टि है जिसके लिए शिक्षा कोई पेशेवर हुनर अर्जित करने का, एक अच्छी नौकरी पाने का और एक सफल आदमी बनने का माध्यम है.

शिक्षा को लेकर इस उपयोगितावादी नजरिए ने अनजाने में शिक्षा को उसी जड़ता के कुएं में धकेल दिया है जिससे बाहर आने की कोशिश में न जाने कितने वर्ष खरचे गए. हालत यह है कि जो सबसे अच्छे छात्र हैं, जिन्हें सबसे अच्छी पढ़ाई हासिल हुई है, वे अपने अध्ययन का सबसे कम इस्तेमाल कर पाते हैं. अकसर हम पाते हैं कि किसी खास अनुशासन में आईआईटी करने के बाद लड़के आईआईएम कर लेते हैं और वहां से टॉप करके सबसे ऊंची सैलरी देने वाली किसी फर्म में साबुन से लेकर शीतल पेय तक बेचने के काम में जुट जाते हैं. हाल के दिनों में सूचना प्रौद्योगिकी का जो हल्ला है, उसमें कई भारतीय युवकों ने अमेरिका में जाकर अच्छा काम किया है, लेकिन वह काम भी सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ उपयोगी सॉफ्टवेयर बनाने से आगे जाता नजर नहीं आ रहा.

सच तो यह है कि जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा होता गया, इसकी उपयोगिता कुछ कुशल पेशेवर इंजीनियर और रट्टामार अफसर निकालने तक सीमित रह गई. ज्यादा दिन नहीं हुए जब टाटा के एक बड़े अफसर ने यह शिकायत की कि अब इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी ज्यादा मौलिक प्रतिभाएं नहीं आ रहीं, क्योंकि कोचिंग करके आए हुए छात्र इम्तिहान को पास कर ले रहे हैं, लेकिन नए ढंग से सोचने का माद्दा उनमें नहीं दिख रहा. विज्ञान के अध्ययन की यह विडंबना कला संकाय में जाकर कहीं ज्यादा डरावनी अराजकता में बदल जाती है. इन दिनों कोई मेधावी छात्र हिंदी, संस्कृत, इतिहास, मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र जैसे विषय पढ़ने तक को तैयार नहीं होता, क्योंकि उसे मालूम है कि इन विषयों के अध्ययन से न नौकरी मिलेगी न सम्मान. एक तरह की उदासी और उदासीनता इन विभागों में दिखती है जिसमें अपने पीछे छूट जाने की खरोंच ज्यादा होती है, अपने बढ़ने और पढ़ने का अभिमान कम.

आखिर यह स्थिति क्यों आती है? बस इसलिए कि शिक्षा हमारे लिए कुछ कामयाब उद्यमी गढ़ने का जरिया भर हो गई है, नए मनुष्य बनाने का, नई संवेदनशीलता पैदा करने का माध्यम नहीं रही. साथ ही, वह इस देश की वर्गीय जड़ता और असमानता को तोड़ने की जगह उसे मजबूत करने का माध्यम हो गई है. इस प्रवृत्ति ने विश्वविद्यालयों को उपेक्षा के परिसरों में बदल डाला है और उनकी जगह कुकुरमुत्तों की तरह उगे ऐसे पेशेवर संस्थानों ने ले ली है जो आधी-अधूरी, बेईमानी भरी डिग्रियां बांटकर पैसा कमाते हैं.

स्कूली शिक्षा के मामले में यह विडंबना कहीं ज्यादा गहरे अंतर्विरोध रचती है. हाल के वषों के सारे प्रयोगों के बावजूद शिक्षा उस बैंकिंग पद्घति की बनी-बनाई लीक पर ही है जिसमें कोई शिक्षक बच्चों को कुछ दी हुई किताबें पढ़ाता है और बच्चे उन्हें रटकर ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की कोशिश करते हैं. इस पद्घति में जोर इम्तिहानों पर है और शिक्षक का काम ऐसे सवाल तय करना है जिनके जवाब देते बच्चे उलझे. जैसे परीक्षा यह खोज निकालने का अभियान है कि बच्चे क्या नहीं जानते. और रट्टा मारते बच्चों की कोशिश एक बाधा दौड़ पार करते हुए इतने अंक ले आने की है कि मनचाहे कॉलेजों में मनचाहे विषय मिल सकें. दरअसल, बच्चे और पढ़ाई दोनों अंकों में बदल गए हैं. 90 फीसदी लाने वाला बच्चा अच्छा बच्चा है और 90 फीसदी दिलाने वाले स्कूल अच्छे स्कूल हैं.

कपिल सिब्बल इस स्थिति को तोड़ना चाहते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन यह काम सिर्फ ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने से नहीं होगा. कायदे से शिक्षा का पूरा चौखटा बदलने की जरूरत है. शिक्षक हमारे समाज में आत्महीन उपस्थिति है जिसका चेहरा जितना आर्थिक अभाव गढ़ रहा है, उससे ज्यादा सामाजिक अभाव. किसी की तैयार की हुई पाठ्य पुस्तक को ऊंची फीस देकर आए बच्चों को पढ़ा भर देना उसका काम है. इससे ज्यादा की न उससे उम्मीद की जाती है, न उसमें योग्यता दिखती है.

साफ है कि इसके लिए शिक्षक नहीं, वह शिक्षा तंत्र दोषी है जो पढ़ाई को कामयाब मैनेजर बनाने का उपक्रम बना देता है. जाने-अनजाने गणित और विज्ञान के पाठ्यक्रम एक करने का कपिल सिब्बल का सुझाव भी इसी स्थिति को मजबूत करता है. निश्चय ही कमी इस सुझाव में नहीं है, उसके पीछे के नजरिए और सुझाव पर अमल की सीमाओं में है. इन सीमाओं का ही नतीजा है कि हमारे शिक्षण संस्थान बच्चों को दृष्टि नहीं, डिग्री दे रहे हैं. कभी शिक्षा साध्य हुआ करती थी जिसके सहारे मनुष्य अपने-आप को, अपनी सभ्यता को, अपनी चेतना को, अपनी मूल्य दृष्टि को नए सिरे से पहचानता था, उसे पुनर्परिभाषित करता था. अब वह सिर्फ साधन रह गई है जिसे अगर मेहनत से नहीं तो दौलत से हासिल किया जा सकता है और जिसका इस्तेमाल और ज्यादा दौलत जोड़ने के लिए किया जा सकता है. मानव संसाधन मंत्री की बातों से लगता है कि वे इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, लेकिन यह साफ नहीं दिखता कि वे इस दुष्चक्र के फैलावों को पहचानते हैं या नहीं.                                                        

प्रियदर्शन