लाचार नौकरशाह,सरकार बेपरवाह

भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस, देश की प्रशासनिक मशीनरी का सबसे अहम पुर्जा. गांव-देहात हो या शहर, आमजन की समस्या जब किसी विभाग का अधिकारी अनसुनी करता है या किसी को कोई प्रताड़ित करता है, तो लोग इस विश्वास से जिला  कलेक्टर के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं कि वहां उनकी समस्या का कोई न कोई हल जरूर निकलेगा. आम लोग ही नहीं, नेता व मंत्री भी कोई सिफारिशी पत्र लिखते हैं तो इन्हीं आईएएस अधिकारियों से काम की उम्मीद करते हैं. कुल मिलाकर व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में इनका योगदान बेहद अहम है. लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों  की प्रतिष्ठा पिछले कुछ सालों में बद से बदतर होती जा रही है. दूसरों की समस्याओं का निराकरण करने वाले आईएएस अधिकारी उत्तर प्रदेश में खुद अपनी समस्याओं और राजनीतिक प्रताड़नाओं के बोझ तले घुटन महसूस कर रहे हैं.

इनकी समस्याएं एकाध नहीं बल्कि अनगिनत हैं जिनमें अकारण निलंबन, स्थानांतरण या फिर योग्य होने के बावजूद राजनीतिक दांवपेंच के कारण किनारे लगा दिया जाना शामिल है. प्रदेश में तैनात आईएएस अधिकारियों की मजबूरी यह है कि उनकी समस्याओं का निपटारा करने वाला कोई नहीं है. पिछले चार साल से हालत यह हो गई है कि वे अपनी समस्या को सरकार या मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का साहस तक नहीं कर पा रहे हैं. समस्या की वजह यह है कि जिस आईएएस एसोसिएशन के माध्यम से अधिकारी अपनी बातें सरकार व मुख्यमंत्री तक पहुंचाते थे वह पिछले चार साल में समाप्त सी हो गई है. इन सालों में एसोसिएशन का न तो चुनाव हुआ न ही स्थायी कमेटी बनी है.

अपने निजी स्वार्थों के चलते कुछ गिने चुने आईएएस अधिकारी सरकार के साथ मिलकर आईएएस एसोसिएशन को खत्म करने पर आमादा हैं

यहां विरोधाभास की स्थिति भी है. सरकारी दबाव और किनारे कर दिए जाने के भय से ज्यादातर अधिकारी तमाम समस्याओं के बावजूद अपना मुंह खोलने के लिए तैयार ही नहीं हैं. केवल चंद आईएएस अधिकारी ही कुछ बोल पाने की स्थिति में हैं.

राज्य की आईएएस एसोसिएशन साल में तीन दिन की वार्षिक जनरल मीटिंग राजधानी लखनऊ में आयोजित करती थी. इसे सर्विस वीक कहा जाता था. पहले दिन मुख्यमंत्री व सरकार के वरिष्ठ मंत्री राज्य के वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को संबोधित करते थे. इस दौरान महत्वपूर्ण योजनाओं की प्रगति, सुधार के सुझाव और अन्य जरूरी मुद्दों पर मुख्यमंत्री और मंत्रियों के साथ अधिकारियों की खुल कर चर्चा होती थी. मीटिंग के बाद एेक्शन प्लान बनता था. विकास संबंधी कार्यों की प्राथमिकता तय होती थी. इसी दिन मुख्यमंत्री के साथ सभी अधिकारियों का दोपहर का भोजन और राज्यपाल के साथ रात्रिभोज होता था. दूसरे दिन अधिकारियों का आपस में ग्रुप लंच होता था. इस दिन फील्ड से आने वाले आईएएस अधिकारी आपस में चर्चा करते थे.

अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी आरएन त्रिपाठी कहते हैं, ‘इससे अधिकारियों को एक-दूसरे को समझने और सीखने का मौका मिलता था जो उनके क्षेत्र में तैनाती के दौरान काम आता था. दूसरे दिन ही एसोसिएशन की मीटिंग होती थी और पदाधिकारियों का चुनाव होता था. तीसरा और अंतिम दिन भी काफी खास होता था. इस दिन आईएएस व आईपीएएस अधिकारियों के बीच क्रिकेट मैच होता था. शाम को सर्विस एेट होम की परंपरा थी जिसका आयोजन बोटेनिकल गार्डेन में होता था. इसमें आईएएस अधिकारियों के अतिरिक्त रेलवे, सेना व केंद्र सरकार से दूसरे विभाग के अधिकारियों को भी बुलाया जाता था.’ अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला बताते हैं, ‘सर्विस एेट होम में दूसरे विभाग के अधिकारियों के आने से सबसे बड़ा फायदा यह होता था कि उन्हें दूसरे क्षेत्रों के अधिकारियों के काम-काज का भी अच्छा ज्ञान हो जाता था और किसी तरह की समस्या आने पर यह अनुभव उनके काम आता था.’ मगर पिछले चार साल से यह आयोजन हो ही नहीं सका है.

2007 से सर्विस वीक न हो पाने की वजह एक आईएएस अधिकारी बताते हैं, ‘सालों से परंपरा रही है कि वीक के दौरान मुख्यमंत्री ही बैठक को संबोधित करते रहे थे. जब प्रदेश में बसपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री से एसोसिएशन ने इसके लिए समय मांगा. लेकिन वहां से कोई जवाब ही नहीं मिला. यह सिलसिला 2007 से लगातार जारी है.’ एक बार मुख्यमंत्री कार्यालय से मुख्यमंत्री के स्थान पर कैबिनेट सेक्रेटरी को मुख्य अतिथि बनाने का प्रस्ताव भेजा गया जिस पर आईएएस अधिकारी तैयार नहीं हुए.

लगातार सर्विस वीक न हो पाने के कारण एसोसिएशन का चुनाव भी नहीं हो सका लिहाजा वह भी धीरे-धीरे छिन्न-भिन्न हो गई. एसोसिएशन के नाम पर तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी संजय भूस रेड्डी कुछ माह पूर्व तक महासचिव के पद पर कार्यरत थे, लेकिन उनका भी तबादला केंद्र सरकार में हो जाने के बाद से यह पद भी खाली पड़ा है. एक आईएएस बताते हैं, ‘सरकार के करीबी कुछ अधिकारियों ने बची-खुची एसोसिएशन को भी खत्म करने का पूरा प्रयास किया. जिस समय संजस भूस रेड्डी महासचिव के पद पर थे उसी समय कुछ वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने बिना राय-मशविरा किए लखनऊ के डीएम रहे चंद्रभानु को रेड्डी की जगह महासचिव मनोनीत कर दिया. जब अन्य अधिकारियों को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने इसका विरोध किया.इसके बाद चंद्रभानु ने अपने कदम पीछे खींच लिए.’

 
अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ल का आरोप है कि एसोसिएशन को कुंद करने के पीछे मौजूदा सरकार का हाथ है. अपने निजी स्वार्थों के चलते कुछ गिने-चुने आईएएस अधिकारी भी सरकार का बराबर साथ दे रहे हैं. सरकार की सोच यह है कि एसोसिएशन के ताकतवर होने की  हालत में वह सरकार के मनमाने फैसलों का विरोध करती है, जिससे उस पर दबाव बनता है. शुक्ला अपनी बातों की पुष्टि एक उदाहरण से करते हैं – मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने आदेश पारित करके पीसीएस अधिकारियों को भी जिलाधिकारी बनाने का निर्णय लिया. सरकार के दो खास पीसीएस अधिकारियों को जिलाधिकारी बना भी दिया गया. जिलाधिकारी का पद भारतीय प्रशासनिक सेवा का है लिहाजा एसोसिएशन के माध्यम से आईएएस अधिकारियों ने मुख्यमंत्री से इस पर कड़ा विरोध जताया. लिहाजा सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा और जो दो पीसीएस अधिकारी जिलों में जिलाधिकारी के तौर पर तैनात किए गए थे उन्हें वापस बुला लिया गया.

शुक्ला दूसरा उदाहरण खुद का देते हुए बताते हैं, ‘1998 में कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वे अपने बेटे राजू की संस्था को मेडिकल कॉलेज के लिए ग्राम समाज की जमीन आवंटित कराना चाहते थे. कल्याण सिंह ने सुबह आठ बजे मुख्यमंत्री आवास पर जमीन के कागजातों पर हस्ताक्षर के लिए बुलाया, लेकिन मैने यह कहते हुए हस्ताक्षर करने से मना कर दिया कि यह गलत है. राजू के नाम जमीन का आवंटन किस तरह गलत है यह समझाने के बाद कल्याण सिंह भी सहमत हो गए.’ शुक्ला कहते हैं, ‘आज स्थितियां ऐसी नहीं हंै. आज सरकार जिस कागज पर हस्ताक्षर करने को कहे और आईएएस मना कर दे तो उसका अंजाम क्या होता है किसी को बताने की जरूरत नहीं.

शुक्ला बताते हैं कि आईएएस एसोसिएशन को छिन्न-भिन्न करने के बाद नियुक्तियों में भी सरकार मनमाना रवैया अपना रही है. कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, वाराणसी, मेरठ और लखनऊ मंडल के कमिश्नर का पद प्रमुख सचिव स्तर का है. इसके लिए भारत सरकार की ओर से 2005 में विज्ञप्ति भी जारी की गई है. इसके बावजूद कानपुर को छोड़ कर अन्य सभी स्थानों पर प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों के बदले सचिव स्तर के अधिकारी को ही सरकार ने तैनात किया है. अधिकारी सब जानते हुए भी मौन साधे हैं, क्योंकि उनके पास विरोध के लिए न तो कोई प्लेटफॉर्म है और न ही सरकार में उनकी सुनी ही जा रही है. शुक्ला के मुताबिक अधिकारियों में अस्थिरता का दौर 1990 के बाद ही आना शुरू हो गया था. यदि कोई अधिकारी किसी सरकार का खास होता था तो उसे दूसरी सरकार में किनारे लगा दिया जाता था. मगर तब इस तरह से  उत्पीड़न नहीं होता था. सरकार का खास बनने वाले लोगों की संख्या भी तब कम थी. ऐसे लोगों को दूसरे आईएएस भी जानते थे जो निजी स्वार्थों के लिए सरकारों के खास बनते थे. लेकिन आज स्थितियां बदतर हो गई हैं. असली सचिवालय मुख्यमंत्री कार्यालय हो गया है असली सचिवालय के अधिकारी सेक्शन अफसर के तौर पर काम कर रहे हैं.

सरकार के काम-काज पर अंगुली उठाने का परिणाम निलंबित आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर के  साथ हुए बर्ताव से लगाया जा सकता  है. तहलका से बातचीत में प्रोमिला कहती हैं, ‘एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की कमिश्नर रहते हुए सितंबर, 2011 में मैंने यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल बोर्ड अथॉरिटी के मास्टर प्लान पर आपत्ति जताई थी. क्योंकि इसे तैयार करने में बोर्ड की मंजूरी नहीं ली गई थी. चूंकि कृषि योग्य भूमि पर हो रहा अंधाधुंध निर्माण भविष्य में सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकता है इसलिए एनसीआर में होने वाले किसी भी अधिग्रहण के लिए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की सहमति जरूरी होती है. इससे सरकार में हड़कंप मच गया. कुछ दिनों बाद ही मुझे यह आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया कि मैं बिना सरकार की अनुमति के विदेश यात्रा पर चली गई थी.’ फरवरी, 2012 में रिटायर होने वाली प्रोमिला शंकर कहती हैं कि सरकार ने यह कदम दूसरे अधिकारियों के बीच यह संदेश देने के लिए उठाया है कि सरकार जैसा चाहे वैसा ही करो.

फायर विभाग के डीआईजी डीडी मिश्रा का जिक्र करते हुए प्रोमिला कहती हैं कि जब मिश्रा ने सरकार के काम-काज पर अंगुली उठाई तो उन्हें पागल करार दिया जा रहा है. वे कहती हैं कि निलंबन के बावजूद वे हारी नहीं हैं. प्रदेश सरकार के इस कदम के खिलाफ उन्होंने केंद्र सरकार को भी पत्र लिख कर राज्य में आईएएस अधिकारियों के साथ हो रहे अन्याय व अत्याचार की पूरी कहानी बयान की है.