एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस ज्यादती, राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों की हिरासत तथा मेट्रो और रेल सेवाओं पर प्रतिबंध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी, कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत और अन्य वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
सुनवाई के दौरान मेनका गुरुस्वामी ने सवाल उठाया कि क्या राज्य यह कह रहा है कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है? वहीं, गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि शनिवार को दिल्ली में हालात ऐसे थे कि हम पुलिस स्टेट से एक कदम दूर थे। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत मौलिक अधिकारों के अतिक्रमण को रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपने दायित्व से बंधी है।
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहें, इंटरनेट सुविधाएं बाधित न हों और दिल्ली में लोगों की आवाजाही सुनिश्चित की जाए। अदालत ने शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की हिरासत के मामले में भी कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
साथ ही, अधिकारियों को पिछली सुनवाई के आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट और अवमानना याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए मंगलवार तक का समय दिया गया।
क्या राज्य कह रहा है कि अघोषित आपातकाल है?’
राजनीतिक नेताओं और अन्य लोगों की कथित अवैध हिरासत के मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर बहस करते हुए कहा कि मामला सिर्फ अदालत के आदेश की अवहेलना का नहीं है। सवाल नागरिकों के मौलिक अधिकारों, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और स्वतंत्र आवाजाही का भी है। उन्होंने अदालत से कहा, “मेट्रो को बाधित करके आप मेरी आवाजाही की क्षमता छीन लेते हैं। इंटरनेट बंद कर दिया गया। लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें हैं। राज्य हिरासत में लिए गए लोगों की कोई आधिकारिक संख्या नहीं बता रहा है।” दिल्ली में 45 हिरासत केंद्र बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं को उठाया गया और सांसदों को उनके घरों में ही सीमित कर दिया गया। युवा शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता है कि चुनाव व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 358 कहता है कि आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 19 के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। क्या राज्य यह कह रहा है कि अघोषित आपातकाल लागू है?” बंदी प्रत्यक्षीकरण नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक उपाय है। याचिका दायर करते समय उन्हें हिरासत में लिए गए लोगों की वास्तविक संख्या और स्थिति का पूरा अंदाजा नहीं था। इंटरनेट बंद होने से सूचनाएं जुटाना भी मुश्किल हो गया था।
कोर्ट से सवाल- फिर मंगलवार तक का समय क्यों?
गुरुस्वामी ने अदालत से सवाल किया कि जब मेट्रो सेवाओं को लेकर पहले ही आदेश दिया जा चुका था, तब अधिकारियों को यह बताने के लिए मंगलवार तक का समय क्यों दिया जा रहा है कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ। उन्हें अदालत के आदेश की अवहेलना जारी रखने के लिए और समय क्यों दिया जाए? गुरुस्वामी ने इस मामले को नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रताओं से जुड़ा गंभीर सवाल बताया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत को बताया कि कई लोगों को प्रदर्शन स्थल से काफी दूर से हिरासत में लिया गया और कुछ वकीलों को भी कथित रूप से पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। कल शहर में स्थिति बेहद दमनकारी थी। लोगों को वहां खड़े होने तक की अनुमति नहीं थी। मुझे उठाकर एक चलती हुई बस में डाल दिया गया था। यह मामला सिर्फ वकीलों के अधिकारों तक सीमित नहीं है। सवाल नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का है। कल मुझे जो महसूस हुआ, उसके मुताबिक हम पुलिस स्टेट से एक कदम दूर थे। कृपया राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के नागरिकों के अधिकार को बहाल कीजिए। कल इस अधिकार को खत्म कर दिया गया था। उन्होंने अदालत के सामने कथित पुलिस ज्यादती के वीडियो और अन्य सामग्री का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, कुछ वीडियो में निहत्थे लोगों के साथ मारपीट और बल प्रयोग दिखाई देता है। बिना पहचान चिह्न वाले पुलिसकर्मियों की कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही का सवाल भी गंभीर है। लोगों की आवाजाही बहाल की जाए, बैरिकेड हटाए जाएं और मेट्रो सेवाओं को सामान्य किया जाए। जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
वकीलों तक पहुंच रोकना सुप्रीम कोर्ट की गरिमा के खिलाफ’
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने अदालत में वकीलों की भूमिका और न्याय तक पहुंच के अधिकार का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था में अधिवक्ताओं का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि वकीलों को अपने मुवक्किलों तक पहुंचने या पुलिस थानों में कानूनी सहायता देने से रोका जाता है, तो इससे न्याय तक पहुंच प्रभावित होती है। हेगड़े ने कहा, न्याय तक पहुंच का अर्थ वकीलों तक पहुंच भी है। यदि वकीलों को अपना काम करने से रोका जाता है, तो सीधे इस अदालत की गरिमा प्रभावित होती है। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर वकील अपने मुवक्किल तक पहुंच सके और पुलिस थानों में उसे कानूनी सहायता दे सके। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ वकीलों के साथ पुलिस थानों में मारपीट की गई और पुलिसकर्मियों ने उन्हें प्राथमिकी दर्ज करने की धमकी दी। एक महिला अधिवक्ता ने भी अदालत में अपना अनुभव बताते हुए कहा कि करीब 150 वकील शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहे थे, तभी उनमें से कुछ को पकड़कर पुलिस वाहन में बैठा लिया गया। कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मियों के नाम या पहचान चिह्न दिखाई नहीं दे रहे थे।
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अनुच्छेद 19 के तहत हमारे पक्ष में सब कुछ है’: शोएब
वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने नागरिकों की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकारों का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 को पढ़ने पर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त आधार मिलता है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अनुच्छेद 19 के तहत अधिकारों पर अनुच्छेद 19(2) के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रतिबंध का प्रावधान अधिकारों पर पूर्ण निषेध नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार नियमन की अनुमति देता है। आलम ने आरोप लगाया कि लोगों को दिल्ली के बाहर से भी हिरासत में लिया गया। कुछ लोगों के घरों पर छापे मारे गए, ताकि वे प्रदर्शन स्थल तक न पहुंच सकें। उन्होंने कहा कि लोगों को हिरासत में लेकर 24 घंटे से कम समय में छोड़ दिया जाना भी इस सवाल को खत्म नहीं करता कि उन्हें हिरासत में लेने का आधार क्या था। आलम ने दावा किया कि करीब 6,000 से 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि वह हिरासत के दावों और मामले की गंभीरता को समझती है।
सिब्बल बोले- ‘मामला सिर्फ अवमानना से कहीं बड़ा है’
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अदालत के सामने मौजूद मामला केवल अवमानना याचिका तक सीमित नहीं है। इसमें नागरिकों की आवाजाही, सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार जैसे व्यापक मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों को ट्रेनों से उतारकर या उनके आसपास से हिरासत में लिया गया। प्रदर्शन स्थल से कई किलोमीटर दूर भी लोगों को पकड़े जाने की बात कही गई। सिब्बल ने कहा कि मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और रेल सेवाओं को प्रभावित करने से नागरिकों की सामान्य आवाजाही पर असर पड़ा। उन्होंने अदालत से अंतरिम राहत देने की मांग की। उनकी दलील थी कि ट्रेनों को उनके मूल स्थान से दिल्ली आने की अनुमति दी जानी चाहिए और अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाए जाने चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए नागरिकों को हर बार अलग से अनुमति लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित वैधानिक प्रतिबंध लागू रह सकते हैं। सिब्बल ने इंटरनेट सेवा बहाल रखने और पत्रकारों को अपना काम करने देने का भी मुद्दा उठाया।
जस्टिस बागची- ‘हम राष्ट्र की सेवा में हमेशा उपलब्ध हैं’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत को पता है कि परिस्थितियों ने वकीलों को परेशान किया है और इसी कारण वे रविवार को सुनवाई के लिए उपस्थित हुए हैं। जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विशेष सुनवाई के लिए अदालत का आभार जताया, तो जस्टिस बागची ने कहा, “इसमें धन्यवाद देने जैसी कोई बात नहीं है। हम राष्ट्र की सेवा में हमेशा उपलब्ध हैं।” पीठ ने यह भी कहा कि अदालत किसी वकील को सुनवाई का अवसर देने से इनकार नहीं करना चाहती। इसलिए पहले उन वकीलों को सुना जाएगा, जो बिना सूचीबद्ध मामलों का उल्लेख करना चाहते हैं। इसके बाद सूचीबद्ध मामलों पर सुनवाई होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह हिरासत, मेट्रो सेवाओं और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी पहलुओं पर संबंधित पक्षों को सुनना चाहती है।
एसजी का पक्ष- ‘मेट्रो तो सामान्य रूप से चल रही थी’
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उनके पास मौखिक रूप से उल्लेख किए गए सभी मामलों के पूरे दस्तावेज नहीं थे और उन्हें कुछ मामलों में जवाब देने के लिए समय चाहिए। मेट्रो सेवाओं के बारे में उन्होंने कहा कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चल रही थी, हालांकि कुछ स्टेशनों के प्रवेश द्वार बंद किए गए थे। उन्होंने अदालत को बताया कि दिल्ली मेट्रो के 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों को बंद या प्रतिबंधित किया गया था। उनके मुताबिक, सभी मेट्रो स्टेशन शनिवार रात 10 बजे से खोल दिए गए और ट्रेनें सामान्य समय-सारणी के अनुसार चल रही थीं। पीठ ने अधिकारियों से कहा कि बंद किए गए 45 स्टेशनों की स्थिति नक्शे पर दिखाई जाए, ताकि यह समझा जा सके कि इन प्रतिबंधों का लोगों की आवाजाही पर क्या असर पड़ा? मेहता ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई है। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई, हिरासत और सार्वजनिक सेवाओं पर प्रतिबंध के संबंध में कई आरोप लगाए। अदालत ने इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।
अंतरिम आदेश- मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रहें
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
1. मेट्रो और रेल सेवाएं: मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलेंगी। सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक होने पर कानून के अनुरूप नियमन किया जा सकता है।
2. लोगों की आवाजाही: दिल्ली में लोगों की मुक्त आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी। यातायात और कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा की जाएगी।
3. इंटरनेट सेवा: इंटरनेट सुविधाएं बाधित नहीं की जाएंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत सरकार की वैधानिक शक्तियों को समाप्त नहीं कर रही है।
4. हिरासत: कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने विशेष रूप से धारा 163 के तहत प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की हिरासत के संबंध में यह निर्देश दिया।
5. वकीलों और पत्रकारों का काम: किसी भी अधिवक्ता को उसके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन से बाधित नहीं किया जाएगा। पत्रकारों और अन्य पेशेवरों की आवाजाही तथा काम में भी अनावश्यक बाधा नहीं डाली जाएगी।
6. सुप्रीम कोर्ट के आसपास प्रतिबंध: अदालत के आसपास धारा 163 लागू होने का बोर्ड यदि अब भी लगा है, तो उसे हटाने का निर्देश दिया गया, ताकि अदालत तक पहुंचने और वहां से बाहर निकलने को लेकर कोई आशंका न रहे।
अधिकारियों को मंगलवार तक जवाब देना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर के अपने पूर्व आदेश के कथित उल्लंघन को लेकर संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अधिकारियों को हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। साथ ही, उन्हें पहले दिए गए निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी। पीठ ने कहा कि मेट्रो सेवाओं, लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और हिरासत से जुड़े आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का जवाब जरूरी है। अदालत ने सभी अनलिस्टेड याचिकाओं और आवेदनों को मुख्य मामलों के साथ जोड़कर मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। इस मामले में अब मंगलवार की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, जब अधिकारियों को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि 9 अक्टूबर के आदेश का किस तरह अनुपालन किया गया और प्रदर्शन के दौरान कथित हिरासत तथा पुलिस कार्रवाई के लिए क्या कानूनी आधार था।




