उमा की उम्मीदवारी, भाजपा की मजबूरी

बात कुल सात माह पुरानी है. जून 2011 में भाजपा से निष्कासन के बाद उमा भारती एक बार फिर से पार्टी में शामिल कर ली गई थीं. उस वक्त उनके गृह प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाईकमान के सामने शर्त रखी थी कि उन्हें मध्य प्रदेश से दूर रखा जाएगा. पार्टी ने चुनावी जरूरतों के चलते बीच का रास्ता निकाला और फायरब्रांड संन्यासिन का रुख उत्तर प्रदेश की ओर मोड़ दिया.

उमा को उस वक्त आधिकारिक तौर पर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने की बात तो कही गई थी लेकिन प्रदेश में उनके प्रति असंतोष के चलते यहां की राजनीति में उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं हो पा रही थी. लेकिन पिछले दो-तीन सप्ताह के दौरान उमा उत्तर प्रदेश की सियासत में बेहद महत्वपूर्ण हो गईं हैं. पार्टी ने न केवल उन्हें बुंदेलखंड की चरखारी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला किया है बल्कि उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बताया जा रहा है. हालांकि कुछ समय पहले तक राज्य के सभी बड़े नेता इस बात को दोहराते थे कि उमा न तो प्रदेश में चुनाव लड़ेंगी और न ही वे यहां के मुख्यमंत्री पद की ही दावेदार हैं.

मूलत: अगड़ों के प्रभाव वाली भाजपा के साथ एक विचित्र विरोधाभास यह जुड़ा हुआ है कि उत्तर प्रदेश (कल्याण सिंह) से लेकर मध्य प्रदेश (उमा और अब शिवराज) और महाराष्ट्र (गोपीनाथ मुंडे) तक उसकी सूबाई सियासत के चमकदार अध्याय पिछड़ों के नाम ही रहे हैं. इस विरोधाभास ने ही पार्टी अध्यक्ष गडकरी को उमा की तरफ झुकाने में अहम भूमिका निभाई है. नतीजतन राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र जैसे सवर्ण नेताओं की मौजूदगी में भी भाजपा बाहरी और पिछड़ी जाति की उमा पर दांव लगाने का फैसला कर चुकी है. इस सच्चाई को प्रदेश इकाई के एक बड़े नेता खुले शब्दों में नहीं स्वीकारते लेकिन घुमा-फिरा कर जो बातें होती हैं उसमें उनका दर्द छलक जाता है.

पिछले करीब एक साल से पार्टी कांग्रेस व बसपा की तर्ज पर ब्राह्मण चेहरों को तवज्जो दे रही थी. उसकी नजर में मायावती की दलित -ब्राह्मणों वाली सोशल इंजीनियरिंग से हासिल 2007 की मायावी सफलता थी  तो कांग्रेस की ब्राह्मण अध्यक्ष रीता जोशी भी उसे इसके लिए मजबूर कर रही थीं. लिहाजा भाजपा ने भी कलराज मिश्र को आगे कर दिया था.

जल्द ही भाजपा को इस बात का अहसास हो गया कि सिर्फ ब्राह्मण चेहरे से काम चलने वाला नहीं है. उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग उत्तर प्रदेश की सियासत की एक महत्वपूर्ण धुरी है. मंदिर आंदोलन के दौर में जब भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से प्रदेश में बनी थी उस समय पार्टी में कई बड़े ओबीसी चेहरे मौजूद थे, जैसे कल्याण सिंह, विनय कटियार, ओम प्रकाश सिंह आदि. आज कल्याण पार्टी छोड़ चुके हैं तो विनय कटियार केंद्र में रमे हुए हैं जबकि ओम प्रकाश सिंह हाशिये पर चले गए हैं. ऐसे में जब कांग्रेस ने ओबीसी आरक्षण की साढ़े चार फीसदी सीटों पर छुरी चलाई तो भाजपा को एक मजबूत ओबीसी चेहरे की जरूरत महसूस हुई.

कहने को मुलायम सिंह भी पिछड़ों की ही राजनीति करते हैं लेकिन उनके लिए अन्य पिछड़ा वर्ग का मतलब सिर्फ यादव ही हैं. ओबीसी की बाकी जातियों में इसे लेकर लंबे समय से असंतुष्टि का भाव पनप रहा है. भाजपा इसी असंतोष को भुनाने की फिराक में है और उमा जैसी कुशल वक्ता इस काम को बखूबी अंजाम दे सकती हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘उमा का कद बढ़ने की एक वजह कुशवाहा प्रकरण भी रहा. कुशवाहा के पार्टी में शामिल होने का पूरे समाज में गलत संदेश गया. इससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए उमा को आगे करना पार्टी को जरूरी लगने लगा था.’

जब से उमा ने उत्तर प्रदेश का रुख किया है, यहां के स्थानीय नेताओं ने इसका खुलकर भले ही विरोध न किया हो लेकिन भितरखाने में खलबली जोरों पर है. पार्टी के ही एक नेता कहते हैं, ‘पार्टी हाईकमान को जब उमा जी पर इतना ही भरोसा है तो पूरे प्रदेश में कहीं से भी चुनाव लड़ सकती थीं, चरखारी ही क्यों.’ इसका जवाब वे खुद देते हुए कहते हैं, ‘एक तो चरखारी में लोध बिरादरी का वोट सबसे अधिक है जिससे उमा ताल्लुक रखती हैं. दूसरा उनका घर भी मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में ही है.’उमा भारती को अचानक खास तवज्जो दिए जाने पर कलराज मिश्र कहते हैं, ‘चुनाव के बाद ही तय होगा कि सीएम कौन बनेगा. पार्टी नेतृत्व ने अभी किसी को भी सीएम तय नहीं किया है.’ जबकि पार्टी के दूसरे बड़े नेता व सांसद लालजी टंडन साफ कहते हैं, ‘उमा जी यहां सीएम बनने नहीं आई हैं.’

हालांकि भाजपा की जो हालत है उसमें सत्ता दूर की नहीं बल्कि चांद पर पड़ी कौड़ी लगती है. लेकिन प्रदेश के नेता खुद को बयानबाजी से रोक नहीं पा रहे हैं. चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश भाजपा की हालत ‘सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ’ वाली हो गई है.