
एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश में कारोबार बढ़ रहा है, डिजिटल भुगतान का दायरा फैला है और बुनियादी ढांचे पर निवेश भी हो रहा है। इसके बावजूद एक अहम सवाल बना हुआ है- क्या आम नागरिक और कारोबारी अपने आर्थिक फैसले पर्याप्त स्वतंत्रता के साथ ले पा रहे हैं? क्या उनकी संपत्ति सुरक्षित है? क्या अदालतों से समय पर न्याय मिलता है? और क्या कारोबार शुरू करने से लेकर उसे चलाने तक नियमों का बोझ कम है?
कनाडा के फ्रेजर इंस्टीट्यूट की ‘इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द वर्ल्ड’ रिपोर्ट इन्हीं सवालों से जुड़े पहलुओं को पांच प्रमुख कसौटियों पर परखती है। भारत में यह रिपोर्ट फ्रेजर इंस्टीट्यूट की साझेदार थिंक टैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) के सीईओ डॉ. अमित चंद्रा ने सोमवार को जारी की। रिपोर्ट के 2026 संस्करण में उपलब्ध नवीनतम आंकड़े वर्ष 2024 के हैं। भारत को 10 में 6.62 अंक के साथ 165 देशों में 88वां स्थान मिला है।
यह रैंकिंग अपने आप में भारत की अर्थव्यवस्था के अच्छा या खराब होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। लेकिन यह जरूर बताती है कि आर्थिक फैसले लेने की आजादी, कानूनी सुरक्षा और कारोबारी माहौल के मामले में भारत कहां खड़ा है और किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत हो सकती है।
पांच कसौटियों पर भारत का प्रदर्शन एक जैसा नहीं
आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में सरकार का आकार, विधिक व्यवस्था और संपत्ति के अधिकार, स्थिर मुद्रा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता तथा नियमन को आधार बनाया गया है। इन पांच क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन एक जैसा नहीं है। सरकार के आकार में भारत को 10 में 7.85 अंक और स्थिर मुद्रा में 7.76 अंक मिले हैं। इसके मुकाबले अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता में 6.27, नियमन में 5.94 और विधिक व्यवस्था तथा संपत्ति के अधिकार के क्षेत्र में महज 5.27 अंक मिले हैं।
यही आंकड़े इस रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण इनसाइट सामने लाते हैं। भारत की चुनौती केवल आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन संस्थागत व्यवस्थाओं और नियमों को भी मजबूत करना है जिनके भरोसे नागरिक अपनी संपत्ति सुरक्षित रख सकें, निवेशक पूंजी लगाने का फैसला कर सकें और कारोबारियों को कानूनी अनिश्चितता का सामना कम करना पड़े।
सीसीएस के सीईओ डॉ. अमित चंद्रा ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, “इस वर्ष न केवल भारत की रैंकिंग में गिरावट आई, बल्कि विभिन्न मानकों के आधार पर होने वाली स्कोरिंग में भी भारत का प्रदर्शन गतवर्ष की तुलना में खराब रहा।”
कानून और संपत्ति के अधिकार सबसे कमजोर कड़ी
भारत का सबसे कम स्कोर विधिक व्यवस्था और संपत्ति के अधिकार के क्षेत्र में है। 10 में 5.27 अंक का यह परिणाम सवाल खड़ा करता है कि आर्थिक गतिविधियों के लिए जरूरी कानूनी सुरक्षा और संस्थागत भरोसे के मामले में भारत की स्थिति कैसी है? आर्थिक स्वतंत्रता का मतलब केवल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को कारोबार शुरू करने या निवेश करने की अनुमति मिल जाए। यह भी जरूरी है कि उसकी संपत्ति सुरक्षित हो, किसी कारोबारी समझौते का उल्लंघन होने पर उसे प्रभावी कानूनी उपाय मिल सके और विवाद का निपटारा निष्पक्ष तरीके से हो।
मसलन, किसी उद्यमी ने जमीन खरीदी, कारखाना लगाया या किसी दूसरी कंपनी के साथ करोड़ों रुपये का अनुबंध किया। बाद में संपत्ति या भुगतान को लेकर विवाद हो गया तो उसके निवेश की सुरक्षा इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कानूनी प्रक्रिया कितनी भरोसेमंद है और विवाद के समाधान में कितना समय लगता है।
फ्रेजर इंस्टीट्यूट इस श्रेणी में न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्ष अदालतों, संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा, कानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता और अनुबंधों को लागू कराने जैसे पहलुओं का आकलन करता है। इसलिए भारत का कमजोर स्कोर कानूनी संस्थाओं और संपत्ति संबंधी सुरक्षा के विस्तृत विश्लेषण की जरूरत बताता है। हालांकि, इस संयुक्त स्कोर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में न्यायिक स्वतंत्रता या संपत्ति के अधिकार की कोई एक खास समस्या सबसे बड़ी है। इसके लिए अलग-अलग उप-संकेतकों के आंकड़ों को देखना होगा। साथ ही, लंबित मुकदमों, कारोबारी विवादों के निपटारे और अनुबंध लागू कराने की प्रक्रिया से जुड़े दूसरे आंकड़ों से भी तुलना करनी होगी।
कारोबार पर नियमों के बोझ को कम करने की गुंजाइश
नियमन के क्षेत्र में भारत को 10 में 5.94 अंक मिले हैं। यह दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहां सुधार की गुंजाइश दिखाई देती है। कारोबार चलाने के लिए नियम और सरकारी निगरानी जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन नियमों का पालन सरल, पारदर्शी और अनुमान के मुताबिक है? किसी छोटे कारोबारी को दुकान खोलने, उत्पादन शुरू करने, कर्मचारियों को रखने और कारोबार का विस्तार करने के लिए कई तरह की मंजूरियों तथा कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ सकता है। यदि नियम जटिल हों, उनकी व्याख्या अलग-अलग अधिकारियों के स्तर पर बदलती हो या अनुपालन की लागत अधिक हो तो छोटे कारोबार पर इसका अपेक्षाकृत ज्यादा बोझ पड़ सकता है।
इसका असर केवल कारोबारियों तक सीमित नहीं रहता। नए उद्यम शुरू करने की लागत बढ़ने, प्रतिस्पर्धा सीमित होने या उत्पादन महंगा होने की स्थिति में रोजगार और उपभोक्ताओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन नियमन के कम स्कोर को किसी खास कानून या विभाग की विफलता का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। यह समझने के लिए श्रम बाजार, ऋण बाजार और कारोबार संबंधी नियमों के अलग-अलग संकेतकों की जांच जरूरी है। असली सवाल यह है कि आवश्यक सुरक्षा और जवाबदेही बनाए रखते हुए नियमों को कितना सरल बनाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी भारत के समक्ष चुनौती
अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता के मामले में भारत का स्कोर 6.27 है। इस श्रेणी में आयात-निर्यात पर शुल्क, गैर-शुल्क बाधाएं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार की लागत जैसे पहलुओं को देखा जाता है। किसी भारतीय उद्योग को मशीनें, पुर्जे या कच्चा माल विदेश से मंगाना हो तो सीमा शुल्क और अन्य प्रक्रियाएं उसकी लागत को प्रभावित कर सकती हैं। इससे उत्पादन की लागत, प्रतिस्पर्धा और कुछ उत्पादों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, आयात शुल्क या व्यापार संबंधी प्रतिबंध हमेशा नुकसानदेह नहीं होते। सरकारें घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, राजस्व और रणनीतिक जरूरतों के लिए भी ऐसे कदम उठाती हैं। इसलिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि व्यापार नीति से मिलने वाले लाभ और उससे पैदा होने वाली लागत के बीच संतुलन कितना प्रभावी है। भारत के 6.27 के स्कोर को समझने के लिए आयात-निर्यात संबंधी नियमों, सीमा शुल्क और कारोबारियों पर पड़ने वाली अनुपालन लागत की अलग-अलग पड़ताल जरूरी होगी।
सरकार के आकार और मुद्रा में बेहतर प्रदर्शन
सरकार के आकार के मामले में भारत को 7.85 और स्थिर मुद्रा के क्षेत्र में 7.76 अंक मिले हैं। ये दोनों इस सूचकांक में भारत के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन वाले क्षेत्र हैं। सरकार के आकार की श्रेणी में सरकारी उपभोग, सब्सिडी और हस्तांतरण, सरकारी निवेश, सरकारी स्वामित्व तथा सीमांत कर दरों जैसे पहलू शामिल होते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में 7.85 अंक मिलने का अर्थ यह नहीं है कि भारत की सरकार हर लिहाज से छोटी है या देश में सरकारी खर्च कम है। यह निर्धारित संकेतकों का संयुक्त स्कोर है।
इसी तरह स्थिर मुद्रा का आकलन केवल रुपये की डॉलर के मुकाबले कीमत से नहीं होता। इसमें महंगाई और उसकी अनिश्चितता, मुद्रा की वृद्धि तथा विदेशी मुद्रा में बैंक खाते रखने की स्वतंत्रता जैसे संकेतक भी शामिल हैं। इन दोनों क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर स्कोर यह दिखाता है कि आर्थिक स्वतंत्रता के अलग-अलग पहलुओं में किसी देश का प्रदर्शन अलग हो सकता है। एक क्षेत्र में अच्छे अंक मिलने से दूसरे क्षेत्रों की कमजोरियां खत्म नहीं हो जातीं।
आर्थिक स्वतंत्रता में दुनिया में हांगकांग शीर्ष पर
फ्रेजर इंस्टीट्यूट के 2024 के देशवार आंकड़ों में हांगकांग 8.53 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। स्विट्जरलैंड 8.45 अंकों के साथ दूसरे और सिंगापुर 8.43 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है। न्यूजीलैंड 8.38 अंकों के साथ चौथे और अमेरिका 8.21 अंकों के साथ पांचवें स्थान पर है। आयरलैंड 8.16 अंकों के साथ छठे, डेनमार्क 8.13 अंकों के साथ सातवें और ऑस्ट्रेलिया 8.06 अंकों के साथ आठवें स्थान पर हैं। मॉरीशस 7.97 अंकों के साथ नौवें स्थान पर है। फिनलैंड, ब्रिटेन और नीदरलैंड के 7.96 अंक हैं और ये दसवें स्थान पर संयुक्त रूप से आते हैं।
शीर्ष देशों की यह सूची बताती है कि आर्थिक स्वतंत्रता का आकलन केवल किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था या प्रति व्यक्ति आय के आधार पर नहीं होता। इसमें कानूनी सुरक्षा, कारोबार संबंधी नियमों और आर्थिक फैसले लेने की स्वतंत्रता से जुड़े पहलू भी शामिल हैं। हालांकि, ऊंची रैंकिंग का यह अर्थ भी नहीं है कि इन देशों में हर नागरिक की आर्थिक स्थिति बेहतर है या कारोबार के सामने कोई बाधा नहीं है। यह केवल निर्धारित कसौटियों पर उनके संयुक्त प्रदर्शन का तुलनात्मक परिणाम है।
अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की स्थिति?
भारत की स्थिति को समझने के लिए जानी-मानी अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका पांचवें स्थान पर है। ब्रिटेन दसवें, जापान 13वें और जर्मनी 19वें स्थान पर हैं। फ्रांस 39वें, इटली 47वें और दक्षिण कोरिया 53वें स्थान पर है। ब्राजील 85वें स्थान पर है, जबकि भारत 88वें स्थान पर है। नेपाल 90वें, चीन 110वें, श्रीलंका 119वें, बांग्लादेश 129वें, पाकिस्तान 133वें और रूस 143वें स्थान पर हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि बड़ी अर्थव्यवस्था या औद्योगिक ताकत होना अपने आप आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में ऊंची रैंक की गारंटी नहीं है। फ्रांस और इटली जैसे औद्योगिक देशों की रैंकिंग भी अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी से नीचे है। वहीं चीन और रूस की रैंकिंग भारत से नीचे है। भारत और ब्राजील के आंकड़ों में एक दिलचस्प अंतर भी है। भारत का स्कोर 6.62 और ब्राजील का 6.57 है, फिर भी ब्राजील 85वें और भारत 88वें स्थान पर है। इसका कारण यह है कि रैंकिंग में दूसरे देशों के स्कोर और उनके बीच के अंतर भी मायने रखते हैं। किसी देश का स्थान केवल उसके अपने स्कोर से तय नहीं होता।
आम आदमी के लिए इस रैंकिंग का क्या मतलब?
आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक को आम आदमी की जिंदगी से जोड़कर समझना जरूरी है। यदि संपत्ति के अधिकार सुरक्षित हों, कारोबारी समझौते भरोसेमंद तरीके से लागू हों और नियमों का पालन करना आसान हो तो नागरिकों तथा उद्यमियों के लिए आर्थिक फैसले लेना अधिक आसान हो सकता है। इसके उलट, यदि किसी संपत्ति पर लंबे समय तक विवाद बना रहे, कारोबारियों को कानूनी प्रक्रियाओं में अधिक समय लगाना पड़े या नियमों की जटिलता से अनुपालन की लागत बढ़े तो आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
लेकिन इस सूचकांक से यह सीधे नहीं बताया जा सकता कि भारत में कितने रोजगार पैदा होंगे, महंगाई कितनी रहेगी या किसी परिवार की आमदनी कितनी बढ़ेगी। यह विकास दर, गरीबी, आय में असमानता या रोजगार मापने वाला सूचकांक नहीं है। इसका उद्देश्य आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़े संस्थागत और नियामकीय पहलुओं की तुलना करना है। इसीलिए भारत की 88वीं रैंकिंग को न तो अर्थव्यवस्था की नाकामी का अंतिम प्रमाण मानना चाहिए और न ही इसे महज एक संख्या कहकर खारिज करना चाहिए।
भारत के लिए रैंकिंग से आगे की असली हकीकत क्या?
भारत के विधिक व्यवस्था और संपत्ति अधिकार के क्षेत्र में 5.27 अंक तथा नियमन में 5.94 अंक दो महत्वपूर्ण सवाल सामने रखते हैं। क्या संपत्ति विवादों और कारोबारी मुकदमों के निपटारे में देरी निवेशकों के भरोसे को प्रभावित करती है? क्या कारोबार संबंधी नियमों की जटिलता और अनुपालन की लागत छोटे उद्यमों के लिए असमान बाधाएं पैदा करती है? इन सवालों का ठोस जवाब देने के लिए सूचकांक के उप-संकेतकों को भारत में लंबित मुकदमों, अनुबंध लागू कराने की प्रक्रिया, कारोबारी मंजूरियों और नियामकीय अनुपालन की लागत से जुड़े आंकड़ों के साथ मिलाना होगा। इसके बिना किसी एक संस्था, कानून या सरकारी नीति को भारत की रैंकिंग के लिए जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी।
भारत की आर्थिक प्रगति का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हो रही है। यह भी देखना जरूरी है कि नागरिक अपनी संपत्ति और कमाई के बारे में कितने भरोसे के साथ फैसले ले सकते हैं, निवेशक कानूनी सुरक्षा को लेकर कितने आश्वस्त हैं और कारोबारियों के लिए नियमों का पालन कितना आसान है।
आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक का सबसे अहम संदेश यही है कि विकास के साथ कानूनी भरोसे, संपत्ति की सुरक्षा, कारोबार में सरलता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता को मजबूत करना भी जरूरी है। भारत की 88वीं रैंकिंग इन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत पर सवाल उठाती है, लेकिन सुधार की सही दिशा तय करने के लिए प्रत्येक संकेतक और उससे जुड़े वास्तविक आंकड़ों की गहराई से जांच करनी होगी।




