चौ. देवीलाल |1914-2001|

1977 में जब देश आपातकाल विरोध की लहर में जकड़ा हुआ था तब देवीलाल हरियाणा में जनता पार्टी के उपाध्यक्ष थे. विधानसभा चुनाव के बाद जनता पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहे दलित नेता चौधरी चांदराम के सहयोग से उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री की कमान संभाली. हालांकि हरियाणा में जाट नेता देवीलाल का मुख्यमंत्री बनना उस समय किसान राजनीति के अगुवा चौधरी चरण सिंह को रास नहीं आया था, लेकिन एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद देवीलाल उत्तर भारत में कांग्रेस विरोध के बड़े क्षत्रप के तौर पर स्थापित हो गए थे. पंजाब और हरियाणा विधानसभा के कई बार सदस्य रहे चौधरी देवीलाल के जीवन में 1989 में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया. वे वीपी सिंह की जनता दल सरकार के उपप्रधानमंत्री बने. 11 महीने बाद ही वीपी सिंह की सरकार गिर गई. इसके बाद देवीलाल के नेतृत्व में एक वैकल्पिक सरकार के गठन की चर्चा जोरों पर थी. उनके समर्थकों के मुताबिक देवीलाल ने खुद ही उस सरकार का नेता बनने से मना कर दिया क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई दसवीं से भी कम की थी यानी उन्होंने जान-बूझकर प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं किया.

उनके इनकार के बाद चंद्रशेखर चार महीने की समाजवादी सरकार के मुख्यमंत्री बन गए और देवीलाल को इतिहास ने दोबारा वह मौका कभी नहीं दिया. इस दौरान घटी कुछ दूसरी घटनाओं ने भी उनके राजनीतिक जीवन को अस्थिर किया. 1989 में रोहतक संसदीय सीट पर उन्होंने दो लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की थी पर उन्होंने लोकसभा में सीकर का प्रतिनिधित्व करने का फैसला लिया. हरियाणा की जनता ने अपने ताऊ को इस बात के लिए कभी माफ नहीं किया. इसके बाद अगले तीन लोकसभा चुनावों में रोहतक की जनता ने देवीलाल को हराया और वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा लगातार तीन बार ताऊ को हरा कर कांग्रेस और हरियाणा की राजनीति में स्थापित होते चले गए. इसी दौरान हरियाणा के महम कस्बे में हुए महम कांड ने भी देवीलाल की छवि पर विपरीत असर डाला. इन दो घटनाओं के साथ ही ताऊ की पार्टी की पकड़ जाट पट्टी का दिल कहे जाने वाले रोहतक संसदीय क्षेत्र के इलाके में कमजोर होती चली गई. अपने जीवन के अंतिम पांच साल वे राज्यसभा सांसद रहे और अप्रैल, 2001 में उनका निधन हो गया. इस तरह हरियाणा का यह जाट नेता हमेशा के लिए पीएम इन वेटिंग वाली लिस्ट में ही रह गया.

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