जोन बड़ी है जहमत

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jahmat

उत्तराखंड में इन दिनों ईको सेंसटिव जोन का मुद्दा सुर्खियों में है. राजनीतिक दलों समेत तमाम संगठन ईको सेंसटिव जोन को लेकर सड़क पर हैं. खास बात यह है कि प्रदेश का सत्ताधारी दल कांग्रेस तथा मुख्य विपक्षी दल भाजपा, दोनों इसके विरोध में हैं. साथ ही सूबे में इसके समर्थक भी मौजूद हैं. लेकिन मजेदार बात यह है कि इनमें से कई लोगों को पता ही नहीं है कि ईको सेंसिटिव जोन दरअसल है क्या?

18 दिसंबर 2012 को भारत सरकार ने शासनादेश के जरिए उत्तराखंड में भागीरथी नदी के किनारे 100 किलोमीटर लंबे और 4179.59 वर्ग किलोमीटर जल संभरणवाले इलाके को ईको सेंसटिव जोन घोषित किया था. इसके बाद इस इलाके में निर्माण कार्यों के लिए मंजूरी हासिल करना खासा कठिन हो गया था.

इस अधिसूचना के जारी होने के बाद दो साल का समय राज्य सरकार को इस इलाके के लिए आंचलिक महायोजना या मास्टर जोनल प्लान बनाने के लिए दिया गया था. इस मास्टर जोनल प्लान को बनाने के लिए राज्य सरकार को राज्य के कई विभागों को साथ लेकर चलना था. इनमें पर्यावरण, वन, शहरी विकास, पर्यटन नगरपालिका, राजस्व, लोक निर्माण विभाग, पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जल संसाधन, बागवानी, ग्रामीण विकास जैसे विभागों की समान भागीदारी तय थी.

पहाड़ की जटिल भू-संरचना और पारिस्थितिकी को देखते हुए इस मास्टर जोनल प्लान को बनाने में स्थानीय महिलाओं से विशेष परामर्श लिए जाने की बात कही गई थी. मास्टर जोनल प्लान में जहां ईको सेंसटिव जोन में पड़नेवाली इमारतों, होटलों, रिसोर्ट के निर्माण में परंपरागत वास्तु के उपयोग की बात कही गई है, वहीं नदियों और सहायक नदियों की प्राकृतिक सीमाओं में कोई परिवर्तन न हो इसकी बाध्यता भी रखी गई है. इसके साथ ही वन और कृषि क्षेत्र में भी किसी तरह का क्षरण न हो इसका प्रावधान रखा गया है. सड़क निर्माण के मसले पर भी इस अधिसूचना में निर्देश दिए गए हैं. इसके मुताबिक ईको सेंसटिव जोन में बननेवाली सड़कों का निर्माण मास्टर जोनल प्लान के तहत होगा.

उत्तराखंड के साथ विद्युत परियोजनाओं का मुद्दा हमेशा से जुड़ा रहा है. उत्तराखंड की सरकारें हमेशा से राज्य को ऊर्जा प्रदेश बनाने की बात करती रहीं हैं. इसका आधार राज्य की नदियों की अथाह जलराशि है. ईको सेंसटिव जोन में इन बिजली परियोजनाओं के लिए भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं. ईको सेंसटिव जोन में किसी भी नई बिजली परियोजना की सख्त मनाही है. इसके साथ ही पुरानी किसी भी परियोजना के विस्तार की अनुमति तभी मिलेगी, जब वह स्थानीय लोगों के लिए आवश्यक हो.

राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस व विपक्षी भाजपा, दोनों दलों ने इस जोन का विरोध किया है. मुख्यमंत्री हरीश रावत भी इसके खिलाफ हैं. उनका कहना है कि राज्य सरकार कोई मास्टर जोनल प्लान नहीं तैयार कर रही है. इस तरह वे गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल देते हैं. उनकी मांग है कि केंद्र सरकार खुद मास्टर जोनल प्लान तैयार करे. ईको सेंसटिव जोन का मामला उत्तराखंड कैबिनेट में भी उठा. कैबिनेट ने भी इस मसले पर मुख्यमंत्री का साथ दिया और तय हुआ कि मुख्यमंत्री इस मामले में प्रधानमंत्री से मुलाकात करेंगे और ईको सेंसटिव जोन को वापस लेने की मांग करेंगे.

पूरे मामले का दिलचस्प पहलू ये है कि ईको सेंसटिव जोन की अधिसूचना 18 दिसंबर 2012 को जारी हुई थी और तब केंद्र में संप्रग सरकार थी और उस समय हरीश रावत ने इसका विरोध नहीं किया था. दो साल बाद 2014 में अधिसूचना लागू हो चुकी है, केंद्र में भाजपा की सरकार बन गई है और इस बीच हरीश रावत बतौर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री इस जोन के विरोधी बन चुके हैं.

राज्य के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी ईको सेंसटिव जोन का विरोध शुरू कर दिया है. भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्य में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ईको सेंसटिव जोन को विकास के लिए रुकावट मानते हैं. उनका कहना है, ‘ईको सेंसटिव जोन बन जाने से भागीरथी नदी के किनारे के इलाकों में विकास की गतिविधियां पूरी तरह से ठप्प हो जाएंगी. इससे पलायन बढ़ेगा. इसके अलावा यह जोन देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है. ईको सेसंटिव जोन की वजह से चीन से सटे सीमांत क्षेत्रों में पलायन होगा और गांव खाली हो जाएंगे. ऐसी दशा में देश की सीमाओं पर हो रही पड़ोसी देश की गतिविधियों का पता नहीं चलेगा या फिर देर से चलेगा.’ इन्हीं वजहों को आधार बनाकर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ईको सेंसटिव जोन पर पुनर्विचार की सलाह दी है.

भागीरथी नदी के किनारे 100 किलोमीटर लंबे और 4179.59 वर्ग किलोमीटर जल संभरण वाले इलाके को केंद्र सरकार ने ईको सेंसटिव जोन घोषित किया था

ईको सेंसटिव जोन का विरोध अदालत के दरवाजे तक भी पहुंच चुका है. उत्तरकाशी के लोकेंद्र बिष्ट ने ईको सेंसटिव जोन के विरोध में नैनीताल उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है. इस याचिका में लोकेंद्र ने ईको सेंसटिव जोन से जुड़ी आपत्तियां नहीं सुने जाने का आरोप लगाया है. ईको सेंसटिव जोन के विरोध में उतरे लोकेंद्र ईको सेंसटिव जोन की व्यावहारिकता पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘पहाड़ की वन संपदा का प्रयोग पहाड़ में रहनेवाले नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’ लगे हाथ लोकेंद्र वन अधिनियम का भी जिक्र करना नहीं भूलते. लोकेंद्र की राय में वन अधिनियम में भी कहीं ये नहीं लिखा कि वन क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण नहीं होगा, लेकिन कठिन शर्तों की वजह से सड़कों का निर्माण सालों तक लटका रहता है. उनका मानना है कि वन अधिनियम की तरह ही सरकारी अफसर ईको सेंसटिव जोन का भी सहारा लेकर वाजिब और जरूरी कामों में रोड़े अटकाएंगे. लोकेंद्र की नाराजगी इस बात को लेकर भी सामने आती है कि पिछले दो साल के वक्त में राज्य की सरकार ने कभी भी ईको सेंसटिव जोन में आने वाले गांवों और कस्बों के लोगों से बात नहीं की. सरकार का कोई नुमाइंदा इन लोगों के पास नहीं आया. न तो लोगों को ईको सेंसटिव जोन के बारे में बताया गया और न ही उनकी राय मांगी गई. लोकेंद्र ने अदालत में दायर अपनी याचिका में भी इस बात का उल्लेख किया है.

ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में सिर्फ ईको सेंसटिव जोन का विरोध ही हो रहा है. राज्य में कई लोग ऐसे भी हैं जो ईको सेंसटिव जोन के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं. विकास का रास्ता पर्यावरण सरंक्षण के साथ निकालने की राय रखनेवालों में से एक शख्स हैं राजीव नयन बहुगुणा. राज्य से जुड़े मुद्दे पर बेबाक राय रखनेवाले राजीव विरोध और समर्थन के सवाल पर आने से पहले ही पूछते हैं, ‘क्या उत्तरकाशी का क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज के संवेदनशील नहीं है? आज जरूरी है कि उत्तरकाशी और आस-पास के क्षेत्र में ईको सेंसटिव जोन की बाध्यता को कड़ाई से लागू की जाए.’ राजीव बहुगुणा की मानें तो ईको सेंसटिव जोन लागू होने के बाद क्षेत्र के लोगों का कोई नुकसान नहीं होगा. नुकसान होगा तो सिर्फ पूंजीपतियों का.

हालांकि कई लोग ऐसे भी हैं, जो ईको सेंसटिव जोन का सीधे तौर पर न तो समर्थन करते हैं और न ही विरोध. इनको मौजूदा स्वरूप में ईको सेंसटिव जोन स्वीकार नहीं है. ऐसे ही एक शख्स हैं, इंद्रेश मैखुरी. उत्तराखंड में जनसरोकार के मुद्दों पर मुखर रहने वाले इंद्रेश मैखुरी ईको सेंसटिव जोन की अवधारणा पर सवाल खड़ा करते करते हुए कहते हैं, ‘ईको सेंसटिव जोन एक पर्यावरणीय सनक की तरह पेश किया जा रहा है, जो पूंजीपतियों के रिजोर्ट के लिए रास्ता बनाएगा. सरकार तय ही नहीं कर पाई कि उसे पहाड़ों में विकास कैसे करना है? पहाड़ों में रहने वालों  को मूलभूत सुविधाएं भी मिल जाएं और पर्यावरण को नुकसान भी न हो, इस तरह की कोई योजना आज तक बन ही नहीं पायी है.’

इंद्रेश कहते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में ही ईको सेंसटिव जोन का मुद्दा पटल पर आया और अटल सरकार इसकी हिमायती थी. लेकिन भाजपा अब इसका विरोध कर रही है. वहीं हरीश रावत को आड़े हाथों लेते हुए इंद्रेश सवाल पूछते हैं कि केंद्रीय मंत्री रहते हुए हरीश रावत ने विरोध नहीं किया तो अब क्यों कर रहे हैं?

ईको सेंसटिव जोन की हद में 88 गांव आ रहे हैं. इनमें रहनेवाली लगभग पचास हजार से अधिक आबादी इस ईको सेंसटिव जोन के दायरे में आती है. ईको सेंसटिव जोन के दायरे में बड़ा वन क्षेत्र आ रहा है. प्राकृतिक रूप से बेहद संपन्न इस क्षेत्र में पौधों की कई दुर्लभ प्रजातियां पाईं जाती हैं. उत्तराखंड में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा के बाद राज्य के विकास कार्यों को लेकर नई बहस छिड़ गई है. भले ही सरकारें ये न मानें कि केदारनाथ में आई आपदा के लिए पहाड़ों पर असंतुलित विकास जिम्मेदार है, लेकिन इतना सभी मानते हैं कि अगर इस इलाके में हो रहे निर्माण कार्यों पर नजर रखी गई होती, तो आपदा के प्रभाव को कम किया जा सकता था.

नियोजित विकास की अवधारणा का राज्य में कितना अभाव है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरकाशी में सीवरेज सिस्टम के लिए अस्सी के दशक में एक योजना बनी, लेकिन अभी तक ये काम पूरा नहीं हो पाया. सीवेज ट्रीटमेंट प्लान का निर्माण भी अब तक नहीं हो पाया है। जाहिर है कि ऐसे में इस पूरे क्षेत्र का मल-जल सीधे नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है. ये महज एक उदाहरण हैं जो बताता है कि पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं.

ईको सेंसटिव जोन के विरोध में उत्तराकाशी और आस-पास के क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन भी होने लगे हैं. व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद रखकर भी ईको सेंसटिव जोन का विरोध दर्ज कराया गया. हो सकता है कि ईको सेंसटिव जोन को लेकर केंद्र सरकार की अधिसूचना में कुछ व्यवहारिक दिक्कतें हों, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उत्तराखंड में विकास के नाम पर बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिनके परिणाम आनेवाले समय में परेशान करनेवाले होंगे.

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