चिंताकारी चाय

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DSC_4658एक चाय, हजार अफसाने. कुछ ऐसी ही स्थिति है इस देश में चाय की. शायद ही कोई हो जिसके पास सियासत से लेकर अड्डेबाजी तक तमाम चीजों का जरिया बन चुकी चाय से जुड़ी एकाध दिलचस्प कहानी न हो. अब तो देश के प्रधानमंत्री भी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने कभी चाय बेचकर जीवन-यापन किया था. लेकिन हो सकता है कि जो चाय आप पी रहे हैं उसमें चीनी की मिठास के साथ खतरनाक जहर भी घुला हो. पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली चर्चित गैर सरकारी संस्था ग्रीनपीस द्वारा हाल में किए गए एक व्यापक सर्वेक्षण के नतीजे कुछ ऐसा ही कह रहे हैं. अगस्त के पहले पखवाड़े जारी हुई इस सर्वेक्षण रिपोर्ट की मानें तो देश की तमाम छोटी-बड़ी चाय उत्पादक कंपनियां अपने चाय बागानों में भारी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग कर रही हैं. गौरतलब है कि कुछ साल पहले आए एक दूसरे और चर्चित सर्वेक्षण में पाया गया था कि देश की तमाम कोला कंपनियां अपने पेय में कीटनाशकों का उपयोग कर रही हैं. देश में चाय पीनेवाली आबादी का आंकड़ा कोला कंपनियों के उत्पाद इस्तेमाल करन ेवाले लोगों की संख्या से कहीं बड़ा माना जाता है. इस लिहाज से ग्रीनपीस की यह हालिया रिपोर्ट चिंताजनक है. साफ है कि देश के औद्योगिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा यह परवाह किए बगैर उत्पादन प्रक्रिया में धड़ल्ले से कीटनाशकों का उपयोग कर रहा है कि इसका सीधा दुष्प्रभाव लोगों की सेहत पर पड़ सकता है.

चाय उत्पादन में भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है. अगर हम निर्यात के नजरिए से देखें तो भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा चाय निर्यातक है. चाय राज्य तथा केंद्र सरकार की आय का एक बड़ा जरिया भी है. साल 2011-12 में भारत सरकार ने चाय के निर्यात से लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए कमाए. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक भारत की चाय कंपनियां दस लाख से अधिक लोगों के रोजगार का जरिया हैं. लेकिन ग्रीनपीस की रिपोर्ट बता रही है कि चाय कंपनियों का चेहरा आंकड़ों में जितना गुलाबी दिखता है हकीकत में उतना है नहीं. इसके कुछ स्याह पहलू भी हैं.

भारत में जितनी चाय पैदा होती है उसका 80 फीसदी हिस्सा देश के भीतर ही इस्तेमाल होता है. यदि ग्रीनपीस की मानंे तो एक आंकड़ा यह भी है कि देश में उपलब्ध चाय के अधिकतर ब्रांडों में कोई न कोई कीटनाशक मौजूद है. कह सकते हैं कि जो चाय देश का राष्ट्रीय पेय होने की हैसियत रखती है वह एक बड़ी आबादी की सेहत के लिए खतरा भी बन सकती है.

ग्रीनपीस ने साल 2013 से 2014 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग ब्रांडों के कुल 49 चाय नमूने इकट्ठा कर उनका परीक्षण करवाया. इस परीक्षण में देश के शीर्ष आठ चाय ब्रांड शामिल थे. गौरतलब है कि इन आठों ब्रांडों का ही देश के चाय बाजार के करीब 65 फीसदी हिस्से पर कब्जा है. इनमें सबसे ऊपर हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड और टाटा ग्लोबल बेवरिजेस लिमिटेड का नाम है जिनकी भारतीय चाय बाजार में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है. इनके अलावा इस सर्वेक्षण में वाघ-बकरी टी, गुडरिक टी, ट्विनिंग्स, गोल्डेन टिप्स, खो-चा और गिरनार कंपनियों के उत्पाद शामिल थे.

ग्रीनपीस की जांच के नतीजे जितना चौंकाते हैं उतना ही चिंता में भी डालते हैं. 49 नमूनों में सिर्फ तीन सुरक्षित पाए गए यानी इनमें कोई भी कीटनाशक नहीं मिला. बाकी बचे 46 नमूनों में किसी न किसी प्रकार के कीटनाशक मौजूद थे. इन नमूनों में जांचकर्ताओं ने कुल 34 किस्म के कीटनाशक पाए. इस आंकड़े के हिसाब से मौजूदा समय में भारतीय बाजार में उपलब्ध लगभग 94 फीसदी चाय ब्रांडों में कोई न कोई कीटनाशक मौजूद है. 46 प्रदूषित नमूनों में से 29 ऐसे थे जिनमें एक साथ 10 से ज्यादा किस्म के कीटनाशक मौजूद थे. एक नमूना तो ऐसा भी था जिसमें कुल 20 किस्म के कीटनाशक एक साथ इस्तेमाल हुए थे.

ये आंकड़े हमें क्या बताते हैं? इनके सहारे अगर हम भारतीय चाय उत्पादक कंपनियों और सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली समझने की कोशिश करें तो कंपनियों के लिहाज से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे मुनाफे की नीयत से इस तरह के हानिकारक तत्वों का इस्तेमाल करती होंगी. लेकिन सरकारी मशीनरी के स्तर पर समस्या कहीं ज्यादा बड़ी है.

नमूनों में पाए गए कुल 34 कीटनाशकों में से बड़ी संख्या ऐसे कीटनाशकों की है जिनका चाय के उत्पादन में कहीं कोई योगदान ही नहीं है. कम से कम ये कीटनाशक भारतीय कृषि से जुड़े किसी भी नियम कानून में चाय उत्पादन के लिए आवश्यक नहीं बताए गए हैं. यानी इनके इस्तेमाल के बिना भी चाय का उत्पादन हो सकता है. दुनिया के दूसरे हिस्सों में जहां सुरक्षा मानक कड़े हैं वहां चाय उत्पादक कंपनियां ऐसा कर भी रही हैं. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. गैर जरूरी होने के बावजूद चाय कंपनियां धड़ल्ले से इन कीटनाशकों का इस्तेमाल चाय बागानों में करती आ रही हैं. ऐसे कीटनाशकों की संख्या 23 है. सवाल खड़ा होता है कि जब इनके इस्तेमाल की अनुमति या आवश्यकता ही नहीं है तब भी इनका उपयोग ये कंपनियां क्यों कर रही हंै. ग्रीनपीस से जुड़ीं नेहा सहगल कहती हैं, ‘रेगुलेशन (नियमन) के स्तर पर बड़ी समस्या है. अवैध और प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल पर टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है. उनका सिर्फ इतना कहना है कि हमारी चाय भारतीय मानकों के अनुरूप है जबकि सच्चाई यह है कि हमारे अधिकतर नमूनों में प्रतिबंधित कीटनाशक मिले हैं.’

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यह एक बड़ी समस्या की तरफ इशारा है. देश में कीटनाशकों के निर्माण और उनकी उपलब्धता में इतना झोल है कि इस दिशा में सरकारी स्तर पर आज तक प्रभावी नियंत्रण स्थापित ही नहीं हो सका है. हालत यह है कि लोग आत्महत्या तक करने के लिए सल्फास जैसे जहरीले कीटनाशक आसानी से दुकानों से खरीद लाते हैं. इस विषय में टी बोर्ड ऑफ इंडिया से बात करने की तहलका की कोशिश नाकाम रही. बोर्ड के चेयरमैन सिद्धार्थ और मीडिया प्रमुख को ईमेल द्वारा भेजे गए प्रश्नों का भी खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला. ग्रीनपीस से ही जुड़े जीतेंद्र कुमार बताते हैं, ‘टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने पहले ही दिन पूरी रिपोर्ट को खारिज कर दिया था.’

हालांकि कुछ कंपनियों ने इस रिपोर्ट पर अपनी स्थिति साफ कर दी है. हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड ने एक प्रेस वक्तव्य जारी किया है जिसमें कहा गया है, ‘हमारे सभी चाय उत्पाद पूरी तरह से सुरक्षित हैं. लोग बिना किसी भय के अपने पसंदीदा पेय का इस्तेेमाल कर सकते हैं. हम फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) के मानकों का कड़ाई से पालन करते हैं… एचयूएल के पास किसी चाय बागान का मालिकाना हक नहीं है. हम चाय उगाते नहीं हैं. हम चाय दूसरे बागानों से नीलामी के माध्यम से खरीदते हैं.’ ग्रीनपीस के नतीजे बताते हैं कि एचयूएल के दो ब्रांडों लिप्टन और ब्रुक बॉन्ड में बड़ी संख्या में कीटनाशक मिले हैं.

एचयूएल की तर्ज पर ही टाटा ग्लोबल बेवरिजेस और गिरनार टी ने भी अपनी सफाई दी है. टाटा बेवरिजेस का कहना है, ‘टाटा ग्लोबल बेवरिजेस चाय खेती में इस्तेमाल होने वाले सुरक्षा उपायों (कीटनाशक) से उत्पन्न किसी भी समस्या को न्यूनतम रखने के लिए प्रतिबद्ध है… हमारा लक्ष्य है कि चाय उत्पादन और संरक्षण की प्रक्रिया में रसायनों का इस्तेमाल न्यूनतम रखा जाए.’ इन दोनों अगुआ कंपनियों के उलट गिरनार टी ने अपनी सफाई बेहद साफ शब्दों में दी है. कंपनी के शब्दों में ‘गिरनार चाय उत्पादन के क्षेत्र में नान पेस्टिसाइड मैनेजमेंट (एनपीएम) का समर्थन करने की घोषणा करती है. इससे कीटनाशकों को चाय उत्पादन की प्रक्रिया से हटाने में मदद मिलेगी.’

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एक स्थिति तो यह है कि देश के चाय बगानों में इस्तेमाल हो रहे ज्यादातर कीटनाशक अनावश्यक रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं. दूसरा पक्ष यह है कि चाय कंपनियां तमाम ऐसे कीटनाशक भी इस्तेमाल कर रही हैं जिनका उपयोग सालों पहले देश में प्रतिबंधित किया जा चुका है. इनमें से कुछ तो दुनिया के सबसे जहरीले कीटनाशकों में शुमार होते हैं. यह और भी ज्यादा चिंता की बात है. उदाहरण के तौर पर डीडीटी जिसे भारत में कृषि क्षेत्र के लिहाज से 1989 में ही प्रतिबंधित किया जा चुका है, वह चाय बागानों में आज भी इस्तेमाल हो रहा है. यह घातक कीटनाशक 49 में से 33 नमूनों में पाया गया है. मोनोक्रोटोफॉस भी ऐसा ही एक कीटनाशक है जिसके चाय की खेती में इस्तेमाल की मनाही है. यह कीटनाशक विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सर्वाधिक जहरीले कीटनाशकों की श्रेणी में रखा गया है. 2013 में जब बिहार के सारण में 23 स्कूली बच्चों की मौत मिड डे मील में मोनोक्रोटोफॉस की मिलावट से हुई थी तो फूड एवं एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन (एफएओ) ने ऐसे कीटनाशकों का इस्तेमाल धीरे-धीरे बंद करने की अपील की थी. ट्राइजोफॉस भी इसी श्रेणी का एक अन्य कीटनाशक है जो कुल पांच नमूनों में पाया गया है. एक नाम टेब्युफेनपाइराड का है. यह कीटनाशक भारत में रजिस्टर्ड ही नहीं है, लेकिन चाय के नमूनों में यह मौजूद है. एक और कीटनाशक एंडोसल्फान को तो उच्चतम न्यायालय ने 2011 में देश में बनने से ही प्रतिबंधित कर दिया था. पर कुछ बागान आज भी अवैध रूप से एंडोसल्फान का इस्तेमाल कर रहे हैं. जांच के आठ फीसदी नमूनों में एंडोसल्फान पाया गया है.

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल का प्रभाव दो रूपों में सामने आता है. पहला तो इसके पर्यावरणीय प्रभाव जो बेहद घातक हैं और दूसरा मानव शरीर पर पड़नेवाला असर. पर्यावरणीय प्रभाव तो इसके कमोबेश वही हैं जो सामान्य खेती में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशकों के होते हैं. मिट्टी, पानी और हवा तीनों ही इसकी चपेट में हैं. इस देश में चाय की पहुंच जितनी व्यापक है उसे देखते हुए मानव शरीर पर पड़ने वाले इसके असर को भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है. मानव शरीर दो तरीकों से इसकी चपेट में आ रहा है. ग्रीनपीस के मुताबिक एक बड़ा हिस्सा तो वह है जो चाय पीता है. यह वह हिस्सा है जो कीटनाशक की थोड़ी मात्रा के संपर्क में आता है. इससे होने वाला असर लंबे समय में दिखता है. संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक लंबे समय तक इसका उपयोग करने वालों में पेट की तकलीफें, जननांगों में विकार, तंत्रिका संबंधी समस्याएं और कैंसर जनित दिक्कतें पैदा हो जाती हैं.

दूसरा हिस्सा उन लोगों का है जो चाय बगानों में काम करते हैं और सीधे-सीधे कीटनाशकों के संपर्क में रहते हैं. अलग-अलग समय पर चाय बागानों में काम करने वालों पर किए गए परीक्षण से पता चला है कि यहां के कामगार सांस, मुंह या त्वचा के माध्यम से बड़ी मात्रा में कीटनाशकों के संपर्क में आ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक प्रतिवर्ष कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली मौतों में लगभग 20 हजार खेती से जुड़े लोगों की होती है. इनमें चाय बागान के कामगारों की भी एक बड़ी संख्या है.

चाय की पहुंच और उसकी लोकप्रियता का दायरा देखते हुए ग्रीनपीस के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जिस सरकारी मशीनरी (टी बोर्ड ऑफ इंडिया) के ऊपर चाय कंपनियों की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी है उसका रवैया इस रिपोर्ट के प्रति नकारात्मक दिख रहा है.

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