हक की जंग

0
46
वजीरपुर इलाके में स्थित एक गरम रोला फैक्ट्री. फोटो: विकास कुमार
वजीरपुर इलाके में स्थित एक गरम रोला फैक्ट्री. फोटो: विकास कुमार

लेकिन इस समझौते को लेकर जब तक मजदूर अपनी जीत का जश्न मनाते तब तक कुछ कंपनी मालिकों ने फिर से पलटी मार ली और 12 घंटे काम करने की पुरानी बात पर अड़ गए. हालांकि इस बीच कुछ कंपनियां ऐसी भी थीं जिन्होंने समझौते के तहत नौ घंटे का नियम लागू कर लिया था.

इस तरह देखा जाए तो अब गरम रोला की 23 फैक्ट्रियों में तीन अलग-अलग स्थितियां बन गई थीं. पहली यह कि 23 में से आठ कंपनियां न्यूनतम मजदूरी तथा नौ घंटे काम करने की मांग पर राजी हो गईं. ऐसी ही एक कंपनी A-72 के मालिक जेके बंसल का कहना था कि उनकी फैक्ट्री में मजदूरों से 12 के बजाय नौ घंटे ही काम लिया जाएगा. इसके अलावा उन्होंने समझौते में रखी गई सभी शर्तों का पालन करने की बात कही. दूसरी स्थिति बिल्कुल इसके उलट थी. इस समझौते के बाद भी 10 कंपनियां ऐसी थीं जो किसी भी कीमत पर 12 घंटे से कम काम करने को तैयार नहीं हुई. इसके अलावा तीसरी और सबसे विचित्र स्थिति तब सामने आई जब पांच फैक्ट्रियों ने अपने यहां काम कर रहे सभी मजदूरों का हिसाब चुकता करने के साथ ही कंपनियों को बंद करने का फैसला कर लिया.

इन मजदूरों से न सिर्फ नियम से ज्यादा समय तक काम कराया जाता है बल्कि उन्हें दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती

फिलहाल इन तीनों स्थितियों का लब्बोलुबाब यही है कि एक नियत उद्देश्य को लक्ष्य बना कर एक महीने से चल रहा यह आंदोलन अब एक तिराहे पर पहुंच गया है. यानी कुछ मजदूरों को जहां 12 घंटे काम करने से आजादी मिल गई है वहीं अब भी कुछ मजदूर 12 घंटे काम करने को मजबूर हैं इसके अलावा जिन कंपनियों ने मजदूरों का हिसाब किताब करके अपने कारखाने बंद कर दिए हैं, उन मजदूरों के पास अभी कोई काम नहीं है.

अब सवाल उठता है कि डेढ़ महीने की इस कठिन परीक्षा के बाद मजदूरों के हिस्सों में अलग-अलग परिणाम क्यों आए जबकि उन सभी ने इस परीक्षा में एक समान प्रदर्शन किया था. सवाल यह भी है कि एक तरफ कुछ मालिक, मजदूरों की सभी मांगें मानने के लिए तैयार हो चुके हैं तो फिर बाकी मालिकों ने इन मांगों को मानने से इंकार क्यों कर दिया.

पहले सवाल का जवाब तलाशने के क्रम में जो बात सबसे प्रमुख तौर पर उभरती है वह मजदूरों की गरीब पृष्ठभूमि और काम की मजबूरी से जुड़ी है. दरअसल वजीरपुर में काम करने वाले मजदूर बेहद गरीब पष्ठभूमि के हैं. इन मजदूरों के पूरे परिवार की जिंदगी इनकी कमाई पर निर्भर करती है. ऐसे में कई मजदूरों ने हड़ताल के बाद भी 12 घंटे काम करना इस लिए स्वीकार किया क्योंकि ऐसा न करने पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने का खतरा पैदा हो रहा था. उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले बाबू लाल ऐसे ही एक मजदूर हैं, जिनके पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके खुद के जिम्मे ही है. ढाई साल से वजीरपुर में रह रहे बाबू लाल अब तक तीन अलग-अलग फैक्ट्रियों में काम कर चुके हैं. वे कहते हैं, ‘आटा, चावल से लेकर लत्ते-कपड़े और मकान का किराया जिस रफ्तार से बढ़ रहा है उसका मुकाबला करने में हमारी तनख्वाह पूरी तरह फेल है. हालत इतनी खराब है कि दिनरात एक करने के बाद महीने के आखिर में मिलने वाले पैसों से न तो खुद की जरूरतें पूरी हो पाती हैं और न ही मैं इतना पैसा गांव भेज पाता हूं जिससे परिवार की दाल-रोटी ठीक से चल सके. ऐसे में अगर 12 घंटे काम नहीं करूंगा तो यह नौकरी भी हाथ से निकल जाएगी.’ ऐसे मजदूरों की पूरे वजीरपुर में भरमार है.

इसके अलावा कई लोगों के मुताबिक श्रम कानूनों को लेकर जागरूकता का अभाव होना भी इन मजदूरों के लिए बड़ी समस्या बन कर उभरा है. करावल नगर मजदूर यूनियन से जुड़े योगेश कहते हैं,  ‘मालिक मजदूरों को तमाम तरह से धमका कर रखते हैं जिसके चलते मजदूर कई बार उनकी हर ज्यादती चुपचाप सह लेते हैं.’ मजदूर बिगुल के अभिनव कहते हैं, ‘इतना बड़ा आंदोलन होने के बाद भी जो मजदूर 12 घंटे काम करने को तैयार हैं, उनके साथ यही सारी समस्याएं हैं.’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि धीरे-धीरे ही सही इन मजदूरों को समझाने में उन्हें कामयाबी जरूर मिलेगी.

अब दूसरे सवाल पर आते हैं कि कुछ मालिकों द्वारा मजदूरों की सभी मांगें मानने के बाद भी बाकी कंपनियां 12 घंटे काम करवाने के फैसले पर क्यों अड़ी हुई हैं ?

दरअसल नौ घंटे काम करवाने की शर्त को मानने से इंकार करने वाले इन अधिकांश कारखानों का तर्क है कि ऐसा करने से उनकी कंपनियां घाटे में चली जाएंगी. नाम न बताने की शर्त पर एक फैक्ट्री के प्रतिनिधि कहते हैं, ‘सिर्फ नौ घंटे काम करवाने से बेहतर तो यही है कि हम अपनी फैक्ट्री ही बंद कर दें. काम में तीन घंटे की कटौती हमारे लिए हर तरह से घाटे का सौदा है.’ लेकिन वजीरपुर के अधिकतर मजदूर इस तर्क से सहमत नहीं दिखते. रघुराज कहते हैं, ‘गरम रोला की प्रत्येक फैक्ट्री हर महीने 10 से लेकर 20 लाख तक की कमाई करती है. अगर ये फैक्ट्रियां मजदूरों से नौ घंटे काम करवाने और उन्हें न्यूनतम मेहनताना देने पर राजी हो जाएं तो भी इन कंपनियों को हर महीने पहले के मुकाबले एक से डेढ़ लाख रुपये ही अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे. और इसके बाद भी इनका मुनाफा आठ से लेकर 18 लाख तक रहेगा. ऐसे में आप ही बताइए कि फैक्ट्रियों को नुकसान कहां से हो रहा है ?’ वे आगे कहते हैं, ‘पिछले साल भी मजदूरों ने इन मांगों को लेकर हड़ताल की थी, लेकिन तब भी मालिक वेतन बढ़ाने और बोनस देने जैसे वादों से मुकर गए थे. क्योंकि उस वक्त हमारा आंदोलन थोड़ा कमजोर पड़ गया था इसलिए मालिकों को लग रहा है कि इस बार भी वे वादों से मुकरकर अपने बढ़े हुए मुनाफे को बरकरार रख सकते हैं.’

बहरहाल इस आंदोलन की दिशा को लेकर असमंजस की इन स्थितियों के बाद भी वजीरपुर के मजदूर अपनी जीत को लेकर आशावान नजर आ रहे हैं. गरम रोला मजदूर एकता समिति की कानूनी सलाहकार और इस आंदोलन में मजदूरों की प्रतिनिधि शिवानी कहती हैं, ‘जिन कंपनियों में अब भी 12 घंटे काम चल रहा है वहां के मजदूरों को दुबारा संगठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. साथ ही हमने उन कंपनियों के खिलाफ लेबर कोर्ट जाने की तैयारी कर ली है जिन्होंने नौ घंटे काम करने से इंकार करते हुए अपनी फैक्ट्रियां बंद कर दी हैं. इन कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को पिछले छह महीने का बोनस तथा एरियर दिलाने के लिए हमारा संगठन हर तरह की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है.’

मजदूरों और कंपनी मालिकों के बीच महीनेभर से चल रही इस लड़ाई में श्रम विभाग की भूमिका का जिक्र किए बगैर यह पूरी कथा अधूरी है. वजीरपुर के अधिकतर मजदूरों को इस पूरे आंदोलन के दौरान विभाग की भूमिका भी संदेहास्पद नजर आती है. मजदूर नेता नवीन कहते हैं, ‘सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि श्रम विभाग की मध्यस्थता में तीन-तीन बार समझौता हो गया फिर भी यह समझौता लागू क्यों नहीं हो सका?’ हालांकि दिल्ली के उप श्रम आयुक्त राजेश धर इस पूरे प्रकरण में विभाग की कार्रवाई को बेहद सराहनीय बताते हैं, वे कहते हैं, ‘एक महीने की इस हड़ताल के बाद मालिकों ने मजदूरों के हितों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई है जिसका प्रमाण यह है कि कुछ फैक्ट्रियों में नौ घंटे काम करने का नियम लागू हो चुका है. बाकी कारखानों में भी जल्द ही यह सब शुरू हो जाएगा. वरना इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई तय है.’

लेकिन मजदूरों की नजर में ये बातें आश्वासन से अधिक कुछ नहीं. हड़ताली मजदूरों के एक नेता सनी कहते हैं, ‘मजदूरों का शोषण कोई आज की बात नहीं है. वजीरपुर की बात करें तो श्रम विभाग का उदासीन रवैया ही यहां के कारखानों मंे हो रहे श्रम कानूनों के खुलेआम उल्लंघन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है. हम पिछले कई सालों से विभाग के अधिकारियों को कंपनियों के काले कारनामों से अवगत कराते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रम विभाग की कार्रवाई नोटिस देने तक ही सीमित रही है.’ वे आगे कहते हैं, ‘वजीरपुर के इस औद्योगिक इलाके के पास ही निमड़ी कालोनी नाम की एक कालोनी है, जहां पर श्रम न्यायालय है. अगर वाकई में श्रम कानूनों को लागू करवाने को लेकर श्रम विभाग गंभीर होता तो क्या वजीरपुर के पास ही स्थित इस न्यायालय का खौफ कंपनी मालिकों के मन में नहीं होता ?’

बहरहाल, महीने भर से जारी इस लड़ाई में अब तक निकले अलग-अलग परिणामों वाले ताजा सूरते हाल को देखते हुए साफ तौर पर कहना मुश्किल है कि इसमें मजदूरों को आधी जीत मिली या आधी हार?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here