लाल पानी पर लगाम

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अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की रामपरी देवी कहती हैं, ‘सिर्फ सरकारी स्तर पर शराबबंदी का मामला नहीं है. हमारा आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक गांव-गांव में अवैध शराब की बिक्री बंद नहीं हो जाती है.’ रामपरी जैसी महिलाएं जानती हैं कि शराबबंदी के महज ऐलान कर देने से कुछ नहीं होने वाला उसका स्वरूप बदलेगा और उसका प्रकोप भी, क्योंकि चुलाई वाली शराब (महुवे से बनने वाली खतरनाक देसी शराब) से स्थितियां और बदतर होगी. लोजपा नेता व सांसद चिराग पासवान भी इसी बात को दोहराते हैं. चिराग कहते हैं, ‘नीतीश कुमार की इस घोषणा का स्वागत है लेकिन उनके ही राजकाज में शराब गांव-गांव तक पहुंची है. ऐसे में वे अपने इस फैसले को लागू कैसे करवाएंगे, यह देखना होगा.’ हालांकि भाजपा नेता गिरिराज सिंह जैसे लोग इस फैसले के बारे में दूसरे किस्म की बात करते हैं. गिरिराज कहते हैं, ‘नीतीश कुमार के इस फैसले का लागू होना इस बात पर निर्भर करेगा कि इसमें लालू प्रसाद यादव की कितनी सहमति है. अगर लालू की सहमति है तो बेहतर होता कि यह ऐलान नीतीश कुमार उनसे ही करवाते.’

गिरिराज जैसे नेता जानते हैं कि लालू यादव इतनी आसानी से सरेआम शराबबंदी का ऐलान नहीं करने वाले हैं. बिहार में शराब का सीधा रिश्ता वोट से है. चुनाव के वक्त शराब बांटे जाने के मामले तो होते ही हैं. देसी शराब की बंदी से एक बड़ा समूह है जो बिदक सकता है. जबकि दूसरी ओर नीतीश जानते हैं कि शराबबंदी के ऐलान से उन्हें देर-सबेर राजनीतिक तौर पर भी फायदा होगा. महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने जितने काम किए हैं और जिस वजह से महिलाएं राजनीतिक तौर पर उनकी मुरीद हुई हैं, उसमें बस शराब ही एक ऐसा पेंच रहा है, जिसके कारण वे नीतीश से अलग हो सकती थीं.

खैर यह तो राजनीतिक दांव-पेंच है. दूसरा सवाल राजस्व का खड़ा हुआ है. बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत शराब ही रहा है. 2012 से अब तक देखें तो हर साल शराब से राजस्व में लगातार बढ़ोतरी होती रही है. वित्तीय वर्ष 2012-13 में जहां शराब से 2,600 करोड़  रुपये राजस्व प्राप्ति हुई थी, वह 2013-14 में बढ़कर 3,100 करोड़ रुपये हुई, उसके अगले साल 3,250 करोड़ और फिर 2015-16 में अब तक बढ़कर 4,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है. शराब से बिहार में प्राप्त होने वाले राजस्व का एक गणित यह भी है कि इससे उत्पाद विभाग के अलावा वाणिज्य कर विभाग भी राजस्व वसूलता है.

इस आधार पर देखें तो चालू वित्तीय वर्ष में यह 5,300 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है. इससे अधिक राजस्व बिहार को सिर्फ वाणिज्य कर से मिल रहा है, जिससे वित्त वर्ष 2014-15 में 21,375 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई.

अगर बिहार जैसे राज्य के आर्थिक हित को ध्यान में रखकर देखें तो यह एक बड़े नुकसान की ओर संकेत देता है लेकिन इसको भी झेलने को तैयार होकर शराबबंदी की घोषणा करना नीतीश कुमार के राजनीतिक व्यक्तित्व को और बड़े रूप में स्थापित करने वाला फैसला साबित होगा, इसकी उम्मीद की जा रही है. नीतीश कुमार खुद कहते हैं, ‘उन्हें मालूम है कि शराब से करोड़ों के राजस्व की प्राप्ति होती है. यह राजस्व इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि हमने उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग में राजस्व की चोरी रोकने का उपाय किया. इसी वजह से यह पांच सालों में एक हजार करोड़ से बढ़कर चार हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा.’ नीतीश कुमार के मुताबिक राजस्व की इस क्षति को वह दूसरे तरीके से प्राप्त करने की कोशिश करेंगे लेकिन महिलाओं के हित को ध्यान में रखकर इस फैसले को जरूर लागू करेंगे. नीतीश कुमार जितने दृढ़ संकल्प के साथ इस बात को दोहरा रहे हैं, उससे यह भरोसा मिलता है कि बिहार में अप्रैल से शराबबंदी लागू होगी. हालांकि कुछ लोगों को आशंका है कि इसका भी 1977-78 वाला ही हाल होगा. बिहार में पहली बार पूर्णतः शराबबंदी की घोषणा 1977-78 में हुई थी लेकिन वह कारगर साबित नहीं हो सकी थी. फिलहाल शराबबंदी की घोषणा के बाद बिहार में 4,939 शराब दुकानों की ओर रोज देखा जा रहा है और उन्हें कहा जा रहा है कि आपके दिन जाने वाले हैं. दूसरी ओर कई जगह से यह सूचनाएं भी मिल रही हैं कि शराबबंदी की घोषणा के बाद शराब के कारोबारी तेजी से शिक्षा के धंधे में आने की तैयारी में हैं. वे स्कूल और कॉलेज आदि खोलने में लग गए हैं.