क्यों न जाएं मंदिर में महिलाएं?

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Photo by Srinivas Mangalapurapu
फोटोः एसके मोहन

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी रोक पर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए मंदिर के ट्रस्ट से इस पाबंदी को हटा लेने के लिए कहा है. राज्य के दूसरे मंदिरों में भी माहवारी के दौरान महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी है, लेकिन सबरीमाला मंदिर में 10-50 की उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है.

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के वकील केके वेणुगोपाल से पूछा है, ‘किस तर्क के आधार पर बोर्ड ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाई हुई है.’ बेंच ने यह भी कहा कि कोई भी मंदिर या इसका प्रशासनिक निकाय महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से नहीं रोक सकता क्योंकि यह उनका संवैधानिक अधिकार है. कोर्ट ने मंदिर की ओर से पेश होने वाले वकील से इस बाबत सबूत भी देने के लिए कहा कि मंदिर के पिछले 1500 वर्ष के इतिहास में एक भी महिला ने मंदिर में प्रवेश नहीं किया है.

मंदिर के वकील और कोर्ट की विशेष बेंच के बीच आधे घंटे की बहस में वेणुगोपाल ने कहा कि यह पाबंदी मंदिर की प्राचीन विशिष्ट प्रथा के आधार पर लगी हुई है. उन्होंने बताया कि कड़े प्रायश्चित के लिए भक्त 41 दिनों तक सादगी से जीवन जीने के लिए इस मंदिर में आते हैं. इस अवधि में उन्हें सांसारिक सुखों से दूर रहना होता है. इसके अलावा मंदिर के प्रमुख देवता अयप्पा सनातन संन्यासी हैं. बहरहाल कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि 8 फरवरी दी है. कोर्ट ने अगली सुनवाई से पहले राज्य सरकार से इस बाबत नया शपथ-पत्र जमा करने के लिए भी कहा है.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के सवाल पर केरल में पिछले दो दशकों से बहस जारी है. तीर्थ यात्रा के हर सीजन में यह बहस परवान चढ़ती है और सीजन खत्म होते ही यह भी खत्म हो जाती है. पिछले सीजन में एक सरकारी बस में बैठे सबरीमाला के तीर्थयात्रियों ने एक महिला को बस में नहीं चढ़ने दिया. महिला की शिकायत के बाद अब केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) ने दूसरे यात्रियों के साथ महिलाओं को भी विशेष सबरीमाला बसों में यात्रा करने की अनुमति दे दी है. गुरुवयूर मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश ये दो धार्मिक सवाल हैं, जिन पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार बहस चल रही है.लगातार होने वाला यह बवाल पारंपरिक मान्यताओं तथा प्रगतिशील विचारों के बीच टकराव का परिणाम है.

सीपीएम के राज्य समिति सदस्य और पूर्व देवाश्वम मंत्री जी. सुधाकरण ने कहा, ‘आज के युग में इस तरह की प्रथा को जारी रखने का कोई मतलब नहीं है. इस संबंध में इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन ने जो याचिका दायर की है वह मेरे मंत्रीत्व में ही उनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जमा शपथ-पत्र पर आधारित है. उन्होंने यह शपथ-पत्र तब जमा किया जब 2006 में महिला वकीलों ने त्रावणकोर राजपरिवार की महिलाओं के मंदिर में जाने का पक्का सबूत देते हुए कोर्ट में सबरीमाला मंदिर की इस पाबंदी पर सवाल उठाए थे. इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार का पक्ष तलब किया था.’

‘यह कहना बिलकुल वाहियात है कि मंदिर में बैठा एक देवता महिला की उपस्थिति में अपनी पवित्रता खो देगा. क्या वह देवता अपने ब्रह्मचर्य को सुरक्षित रखने में असमर्थ है’

सुधाकरण का यह भी कहना है, ‘अगर तीर्थयात्रा के दौरान महिलाओं के लिए सुरक्षा का सवाल कोई है तो उनके लिए विशेष समय नियत किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. यह मसला एक या दो दिन में हल होने वाला नहीं है, क्योंकि इससे कई लोगों के हित प्रभावित होंगे. इसके लिए कोर्ट को समाजशास्त्री,  कानूनविद और वैदिक विशेषज्ञ को लेकर एक समिति तैयार करनी चाहिए.’

इस बीच राज्य सरकार ने कहा है कि वह भक्तों की आस्था की रक्षा के लिए नया शपथ-पत्र जमा करेगी. देवाश्वम मंत्री वीएस शिवकुमार का कहना है, ‘केरल की यूडीएफ सरकार की नीति मंदिर की उन परंपराओं और प्रथाओं की रक्षा करने के लिए है जो सदियों से चली आ रही हैं. जब हम शपथ-पत्र जमा करेंगे तो हम लोगों की आस्था और परंपरा को ध्यान में रखेंगे.’

त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड (टीडीबी) का कहना है, ‘सदियों से सबरीमाला में चली आ रही परंपरा को बदलने का उनका कोई इरादा नहीं है.’ टीडीबी के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन का कहना है, ‘पूर्व की एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के अवलोकन के लिए जिम्मेदार है. पूर्व सरकार द्वारा जमा किया गया यह शपथ-पत्र गलत था, जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई. कोर्ट ने मंदिर की परंपरा के आधार और मंदिर के देवता की विशिष्टता को बिना समझे अपना वक्तव्य दिया है.’

गोपालकृष्णन यह भी साफ करते हैं, ‘टीडीबी भक्तों के हित में केस लड़ेगा. मंदिर की प्रथाएं सदियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा हैं. टीडीबी का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी कीमत पर इनकी रक्षा करे.’ शिवकुमार और गोपालकृष्णन के तर्कों को सुधाकरण खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ‘यह फैसला लेने वाले वे दोनों कौन होते हैं? यह बेवकूफी है. महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से कोई वंचित नहीं कर सकता. इसके अलावा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश करने के कई उदाहरण हैं.’

स्कूल ऑफ भगवद्गीता के संस्थापक स्वामी संदीपानंदगिरि का कहना है, ‘तर्क दिया जा रहा है कि यह हिंदू आस्था के खिलाफ है. यह कहना बिलकुल वाहियात है कि मंदिर में बैठा एक देवता महिला की मौजूदगी में अपनी पवित्रता खो देगा. क्या वह देवता अपने ब्रह्मचर्य को सुरक्षित रखने में असमर्थ है और लालसाओं से मुक्त नहीं हुआ है? अगर महिलाओं की इच्छा है तो उन्हें मंदिर में जाने देना चाहिए.’ सुधाकरण मंदिर से जुड़े पुजारियों की भी आलोचना करते हुए कहते हैं कि पैसा उनकी प्राथमिकता है, भक्तों का कल्याण नहीं. वहीं प्रसिद्ध कवियत्री और पर्यावरणविद सुगाथा कुमारी का कहना है, ‘मैं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के किसी भी फैसले का विरोध करूंगी. हमें कुछ परंपराओं का सम्मान करना ही चाहिए और महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में जाने की कोई जरूरत नहीं है. पहाड़ से नीचे भी बहुत से अयप्पा मंदिर हैं, वे वहां जा सकती हैं और पूजा कर सकती हैं.’

इस बीच एक माह पूर्व गोपालकृष्णन द्वारा दिए गए विवादित वक्तव्य की प्रतिक्रिया में ‘हैप्पी टू ब्लीड’ अभियान की शुरुआत करने वाली निकिता आजाद ने तहलका से बातचीत में कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का वक्तव्य वाकई प्रशंसनीय है. कोर्ट के वक्तव्य ने हमारे अभियान में जान फूंक दी है और मैं वकीलों को धन्यवाद कहना चाहूंगी जिन्होंने यह याचिका कोर्ट में दायर की है. मुझे लगता है कि इससे माहवारी के समय महिलाओं के मंदिरों में प्रवेश करने के विषय पर चर्चा को बढ़ावा मिलेगा.’

वह कहती हैं, ‘सारे देश और विशेषकर केरल के युवाओं ने हमारे अभियान को शानदार प्रतिक्रिया दी. अभियान ने इस बहस को लोकतांत्रिक बनाने में मदद की है. यह अभियान और वकीलों का दृढ़ निश्चय था जिसने इस बहस को आगे बढ़ाया.’

हिंदू ऐक्यवेदी संगठन के राज्य महासचिव आरवी बाबू कहते हैं, ‘यह मसला हिंदू धर्म का आंतरिक मसला है और इससे हिंदू भावनाओं को चोट पहुंचने की संभावना है, इसलिए कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए था. बेहतर हो कि पुजारी और मंदिर प्राधिकारी इस बारे में फैसला करें.’ उनका कहना है हिंदू ऐक्यवादी संगठन को बदलते समय के अनुसार प्रथाओं और कर्मकांडों में बदलाव लाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ऐसा विचार-विमर्श के बाद ही होना चाहिए.

इस बीच भाजपा की ओर से सधा हुआ बयान आया है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुम्मनम राजशेखरण ने कहा है, ‘बेहतर होगा कि मंदिर की प्रथाओं पर फैसला लेने का अधिकार धार्मिक विद्वानों पर छोड़ दिया जाए और कोर्ट केवल अवलोकन करे.’