गाय और गोमांस की राजनीति

इन संगठनों द्वारा प्रसारित प्रचार साहित्य पर निगाह डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी दिलचस्पी गाय की रक्षा करने के बजाय ‘गोमांस खाने वाले मुसलमानों’ को मारने में ज्यादा है. उनका अभियान हमेशा गुजरात की अहिंसा की समृद्ध परंपरा का आह्वान करता रहा लेकिन गाय को मारने और गोमांस खाने वाले मुस्लिमों के प्रति हिंसक ही रहा. अभियान में चालाकी से यह संकेत किया गया कि मुसलमानों की खानपान संबंधी हिंसक प्रवृत्तियां उनकी दैहिक इच्छाओं और क्रियाओं पर भी प्रतिबिंबित होती हैं. उन्हाेंने मुसलमान पुरुषों की कामेच्छा को भी खतरनाक ढंग से उत्तेजक और तामसिक बताया. इस अभियान में डर का पुट जोड़कर, ऐसे पुरुषों को शाकाहारी (सात्विक) उच्च जातीय हिंदू और जैन महिलाओं के लिए खतरा बताकर पेश किया गया. इस अभियान ने एक बड़े सजातीय वर्ग की सामान्य समझ को प्रभावित किया जो हिंदुओं के ध्रुवीकरण में सहायक हुआ.

2002 की हिंसा से जुड़े कई अध्ययनों में कहा गया है कि ‘मांसाहारी मुसलमानों की लैंगिकता’ के उस डर ने बहुत से हिंदू पुरुषों को मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्रूर यौन हिंसा के लिए उकसाया. इन सब के बावजूद, इस हिंसा को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताते हुए मोदी को गुजरात पर्यटन की ‘अहिंसा टूरिज्म’ की योजना की घोषणा करने में कोई हिचक महसूस नहीं हुई.

‘अहिंसा’ और पवित्र गाय का मिथक मोदी के लिए गुजरात में खुद की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में कारगर साबित हुआ और यहां तक कि उनके दिल्ली तक पहुंचने में भी यह तरीका काफी उपयोगी साबित हुआ. 2012 में मोदी ने जैन समुदाय के अंतराष्ट्रीय व्यापार संगठन के साथ बैठक में गोरक्षा का आह्वान किया और इसी साल महाराणा प्रताप की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में यही बात दोहराई. दो साल बाद, दिल्ली में बाबा रामदेव द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भी उन्होंने हूबहू वही बातें कहीं. मोदी के लोकसभा चुनाव प्रचार सभाओं के दौरान बिहार के नवादा और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में यही राग दोहराया गया.

‘पिंक रिवोल्यूशन’ (मांस व्यापार) को बढ़ावा देने वाली यूपीए सरकार से नजदीकी के लिए मुलायम सिंह यादव आैैर लालू यादव पर हमला करने के लिए मोदी ने बड़ी होशियारी से भगवान कृष्ण के गाय के प्रति अनुराग की छवि का इस्तेमाल किया. मुस्लिम कसाइयों की गायों को चुराती हुई तस्वीरों को भी व्यापक रूप से फैलाया गया.

गोरक्षा के लिए किए गए इतने प्रचार के बावजूद, मोदी जब सत्ता में आए तब उन्हाेंने भारत में बढ़ रहे बीफ निर्यात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. वास्तविक स्थिति यह है कि मोदी सरकार के पहले साल में बीफ निर्यात में बढ़ोतरी हुई है. इस बीच, उनकी पार्टी के लोग उनकी शाकाहारी छवि पेश करने के लिए अतिरिक्त रूप से सतर्क हैं. दूसरी ओर बड़ी सावधानी से ‘दूसरे मांसाहारी’ लोगों की छवि हिंदू भारत में ‘म्लेच्छ’ के रूप में पेश की जा रही है.

वैज्ञानिक इतिहास लेखन ने यह सिद्ध किया है कि गाय कोई पवित्र जानवर नहीं है जैसा कि हिंदुत्व के स्वयंभू रक्षकों द्वारा दावा किया जाता है. मशहूर इतिहासकार डीएन झा के लीक से हटकर किए गए शोध में यह बताया गया है कि संघ परिवार जिस ऐतिहासिक काल की गाथा गाता है, उस वैदिक और उत्तर वैदिक युग में उच्च जातीय हिंदुओं द्वारा धड़ल्ले से गोहत्या की जाती थी और उसका मांस खाया जाता था. मुस्लिमों, दलितों, आदिवासियों और अन्य बीफ खाने वालों के बारे में रूढ़िबद्धता है, वह सीधे तौर पर हिंदुत्व से संबंधित है और हिंदू राष्ट्र के ड्रीम प्रोजेक्ट का अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हिंदुत्व की राजनीति के माहिर हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी के लिए मोहम्मद अखलाक के परिवार के प्रति सच्ची संवेदनाएं जाहिर करना असंभव लगता है.

1 COMMENT

  1. गोहत्या के नाम पर राजनीति तो जरूर हो रही है, धर्म के नाम पर मतभेत बन रहे है. ऎसा करके नेता लोग देश में फिरसे हिन्दू मुस्लिम भाईचारगी में फुट डाल रहे है. इस तरह की राजनीती हिन्दू व् मुस्लिम धर्म के खिलाफ है. अगर हमारे देश में फुट डालने की रीती ऎसा ही चलता रहा तो भारत को खतरा हो सकता है. जहाँ तक हो सके हम सब राजनीती नेता देश को महासत्ता बनाने की और हर समाज में विकास की बात करे.

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