साहस या मजबूरी?

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नीतीश के सामने अगर सिर्फ लोकसभा में बुरी तरह से हार जाने का मामला होता तो शायद वे इस रास्ते को नहीं अपनाते. लेकिन वे कई तरफ से घिर रहे थे. विधानसभा उपचुनावों में भी बुरी तरह से हार जाना, हार के बाद तुरंत पार्टी नेताओं का विरोध में बयान आने लगना, विधानसभा में भी संख्या बल के लिहाज में रिस्क जोन में पहुंच जाना उनके लिए बड़ी परेशानी खड़ी करता दिख रहा था. बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं. एक सीट खाली है. नीतीश कुमार की पार्टी के खाते में फिलहाल 113 सीटें है. कांग्रेस के चार, भाकपा के एक और छह निर्दलीय विधायकों के सहारे उनकी सरकार चल रही है. कुल मिलाकर बहुमत बनाए और सरकार चलाए रखने के लिए उन्हें 122 सीटें चाहिए. वैसे तो नीतीश कुमार के पास 124 सीटें हैं. बहुमत से दो ज्यादा. लेकिन मुश्किल यह है कि अब उनका बुरा समय है तो निर्दलीय सरकार को बचाए रखने की कीमत तो वसूलने की कोशिश करेंगे ही. उधर, कांग्रेस जो राष्ट्रीय स्तर पर अब तक के सबसे बुरे दौर में आ चुकी पार्टी है, किसी भी समय नीतीश से दामन छुड़ा सकती है. लोकसभा चुनाव तक तो कांग्रेस लालू प्रसाद और नीतीश कुमार, दोनों को एक साथ साधती रही. दिल्ली की सत्ता के लिए उसने लालू का साथ लिया और बिहार में नीतीश की सरकार को भी समर्थन देकर बचाए रखा. बिहार में विधानसभा चुनाव भी अगले ही साल होनेवाला है, इसलिए जानकारों के मुताबिक कांग्रेस को तय करना होगा कि वह लालू और नीतीश में से किसका साथ लेगी या देगी. प्रदेश में 40 लोकसभा सीटों पर हुए चुनाव में करीब 34 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा से राजद ही लड़ाई में रहा. यानी राजद की स्थिति ठीक रही. इसलिए संभव है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नीतीश की बजाय लालू के साथ ही जाए. उधर, सब जानते हैं कि बिहार की राजनीति में भी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी का भविष्य अब कांग्रेस के ही आजू-बाजू जाकर सिमट गया है, भले ही कांग्रेस बुरे दौर में आ गई पार्टी हो.

जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार जानते हैं कि भाजपा या दूसरे दलों के खेल की बात तो बाद में आती है, अब उनके लिए अपने ही दल के नेताओं की बगावत झेलना या उनका खेल समझना इतना आसान नहीं होगा. इसलिए उन्होंने आखिरी दांव के तौर पर यह चाल चली और विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की. विश्लेषक कह रहे हैं कि ऐसा करके नीतीश कुमार ने शहादत भी दी और विकल्प भी अपने पाले में बचाए रखा. उन्होंने यही सोचकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की ताकि फिर उनके दल के नेता उनमें विश्वास जताएं और तब वे अपनी पार्टी के नेताओं को हिदायत दे सकें कि यदि उनके साथ, उनके नेतृत्व में चलना है तो फिर विधानसभा चुनाव तक उनके कहे अनुसार चलना होगा. नीतीश कुमार के लिए अब यह जरूरी हो गया था कि वे अपने विधायकों को एक साथ बिठाकर निकट भविष्य में बगावत के उभरनेवाले स्वर को अभी से ही दबाने की कोशिश करें. वरना खतरा जदयू विधायकों के ही विद्रोह से नेता के बदलने से लेकर उनके भाजपा के संग मिलकर नयी सरकार बना लेने तक का था. उनका यह दांव काम करता भी लग रहा है. खबर लिखे जाने तक कई विधायक और मंत्री इस फैसले के विरोध में मुख्यमंत्री निवास के बाहर जमा भी हो गए थे. एक ने तो नीतीश द्वारा इस्तीफा वापस न लिए जाने पर आत्मदाह की धमकी भी दे डाली.

नीतीश के सामने मुश्किलें और भी मोर्चों पर हैं. पिछले कई महीने से मंत्रिपरिषद की 12 सीटें खाली हैं. इतने विभागों का काम नीतीश अपने पास ही रखे हुए हैं और उन विभागों को आईएएस अधिकारी संचालित करते हैं. इससे जदयू नेताओं में नाराजगी पहले से ही है. नीतीश पर दबाव होगा कि वे मंत्रिमंडल का विस्तार जल्द करें. उन्हें मजबूरी में यह विस्तार करना होगा. लेकिन इसकी अपनी मुश्किलें हैं. जदयू के विधायक पहले से उम्मीद लगाए बैठे हैं. निर्दलीय समर्थन देने के एवज में मलाईदार विभाग मांगेंगे. सौदेबाजी करेंगे. एक की सुनें तो दूसरा नाराज.

नीतीश कुमार को लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बाद हार के कारणों की समीक्षा की बजाय इतने सारे सवालों से पहले निपटना था. उनकी पार्टी अलग-थलग पड़ चुकी है. वे खुद भी अलग-थलग पड़ चुके हैं. ऐसे में नीतीश के सामने यही एक मजबूत वैकल्पिक रास्ता था कि वे इस्तीफा देकर एक साथ कई मसले सुलझा लें. यानी राष्ट्रीय स्तर पर नैतिकता के रास्ते चर्चा में आ जाएं. अपने दल का अंतर्कलह शांत कर लें. बागी-विरोधी नेताओं को साधकर फिर से अपनी पार्टी पर मजबूत पकड़ बना लें ताकि अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव को भी अपनी रणनीति के साथ लड़ सकें.

नीतीश के इस्तीफे की वजह नैतिक रही या यह एक आखिरी दांव की तरह रहा, इसे तब तक कोई नहीं जान सकता जब तक नीतीश खुद के पत्ते खुद ही न खोल दें. अगर वे फिर से पार्टी नेताओं के दबाव की दुहाई देकर मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो माना जाएगा कि यह नाखून कटाकर शहीद होने जैसा था. हालांकि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने साफ कर दिया है कि विधायक दल के नेता का चुनाव होगा. लेकिन नीतीश के इस्तीफे का एक मतलब यह भी है कि वे चाहते हैं कि भाजपा आनन-फानन में कोई खेल करे ताकि वे अभी से ही जनता की अदालत में चले जाएं और सबको समझाएं कि आप तय कीजिए कि बिहार में कौन चाहिए! लेकिन भाजपा भी अभी इस तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती. पार्टी विधायक दल के नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने अपने दल के अंदर के विद्रोह को दबाने की कोशिश में इस्तीफा दिया है. इसका कोई दूसरा मतलब नहीं है.’ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय कहते हैं, ‘यह इस्तीफा एक नाटक है. नीतीश कुमार अपने काम के आधार पर ही लोकसभा चुनाव में वोट मांग रहे थे, लोगों ने उनके काम को नकार दिया, वोट नहीं दिया तो उन्हें मुकम्मल इस्तीफा देना चाहिए था. आगे क्या होगा, आगे की बात है.’

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