रांची वाया दिल्ली

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सब गोलमटोल बातें रखते हैं, लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या वाकई भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी के नाम पर विधानसभा की भी वैतरणी पार कर लेना इतना आसान होगा. क्या लोकसभा में 14 में से 12 सीटों को पा लेने का मतलब इसके लिए आश्वस्त होना है कि विधानसभा में भी वैसा ही जादू चलेगा?

इस सवाल का कुछ ठीक-ठाक जवाब भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान देते हैं. वे कहते हैं, ‘हमारी पार्टी ने अकेले ही विधानसभा में चुनाव लड़ने का मन बनाया है लेकिन राजनीति में कभी किसी से परहेज नहीं होता. हमेशा बातचीत के रास्ते खुले होते हैं.’ अतीत की याद दिलाते हुए वे बताते हैं कि 2004 में पार्टी को लोकसभा में मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा था जबकि उसी वक्त विधानसभा में 31 सीटें आई थीं. फिर 2009 में लोकसभा में जब भाजपा के सांसदों की संख्या आठ हो गयी तो विधानसभा में सीटें घट गईं. प्रधान कहते हैं, ‘इस बार हमें 14 में से 12 सांसद मिले हैं तो इतिहास देखते हुए बिल्कुल ही अलग रणनीति से चुनाव लड़ना होगा.’

प्रधान की चिंता वाजिब है. लोकसभा के आधार पर विधानसभा का अनुमान लगाना इतना आसान नहीं. यानी नरेंद्र मोदी के नाम पर केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने का मतलब यह नहीं कि उनके ही नाम पर रांची की सत्ता पर भी कब्जा हो जाए. और फिर इस बार झारखंड विधानसभा में भाजपा के सामने इसके पहले वाले विधानसभा चुनाव से ज्यादा बड़ी चुनौती भी है. बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 67 सीटों पर चुनाव लड़ा. 24.44 फीसदी वोट के साथ उसकी सीटों की संख्या 18 रही. उसकी मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़कर 21.43 प्रतिशत मतों के साथ 14 सीटें पाने में सफल रही थी. झामुमो ने 78 सीटों पर चुनाव लड़ा. 15.79 प्रतिशत वोट पाए और उसकी सीटों की संख्या भाजपा के ही बराबर रही यानी 18. उधर, महज 25 सीटों पर चुनाव लड़कर बाबूलाल मरांडी की पार्टी का वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा रहा. 28.24 प्रतिशत वोट पाकर झाविमो 11 सीटों पर कब्जा करने में सफल हो गई. लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने 56 सीटों पर चुनाव लड़ा और 7.28 प्रतिशत वोटों के साथ पांच सीटें पाईं. उधर, बिहार में नीतीश कुमार की लोकप्रियता के उफानी दिनों में उनकी पार्टी जदयू 14 सीटों पर नीतीश कुमार के ही नाम पर चुनाव लड़ी और 5.94 प्रतिशत वोटों के साथ दो सीटें हासिल करने में सफल रही.

ये आंकड़े भाजपा की चुनौतियों को बड़ा करते हैं. साफ है कि एक-दो प्रतिशत का वोट इधर-उधर होना भी खेल बिगाड़ सकता है. भाजपा के विरोधी इसकी तैयारी भी कर रहे हैं. भाजपा के खिलाफ जदयू, राजद, कांग्रेस और झामुमो महागठबंधन बनाने की तैयारी है. यानी बिहार की तर्ज पर ही समीकरण बन सकता है. बिहार में विगत माह उपचुनाव के आये नतीजे से यह महागठबंधन बनने की प्रक्रिया और तेज हुई है. जैसे बिहार में नीतीश और लालू प्रसाद के मिलने से भाजपा को नुकसान हुआ, वैसे ही झारखंड में विरोधियों को लगता है कि सबके मिलने से वोट प्रतिशत अचानक बढ़ेगा और भाजपा चारों खाने चित्त हो जाएगी.

यह अनुमान लगाना कोई हवाई महल बनाने जैसा भी नहीं. ऐसा हो सकता है. लेकिन दूसरी ओर भाजपा को इससे लाभ होने की भी गुंजाइश होगी, क्योंकि तब भाजपा बनाम अन्य की लड़ाई होगी. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तब भाजपा को शहरी मतदाताओं के साथ-साथ सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में आसानी होगी. महागठबंधन बनने की स्थिति में भाजपा के पास दो दलों से गठबंधन करने की गुंजाइश बनती दिखती है. राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो की पार्टी आजसू के साथ और दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झाविमो के साथ. दोनों को साथ लेकर एक साझा गठबंधन बनाने का विकल्प भी है. सूत्र बता रहे हैं कि इसके लिए कोशिशें जारी हैं. दोनों ही ओर से. लेकिन सीटों पर बात नहीं बन पा रही. आजसू से तो फिर भी भाजपा को कोई परहेज-गुरेज नहीं, क्योंकि दोनों वर्षों साथ-साथ रह चुके हैं. हालांकि लोकसभा चुनाव में आजसू के ही मुखिया सुदेश महतो ने भाजपा को कमजोर करने के लिए रांची संसदीय सीट से खुद चुनाव लड़ा था. फिर भी यह इतना बड़ा मसला नहीं कि दोनों का मेल न हो सके. संभव है दोनों में साझा-समझौता हो जाए, लेकिन बाबूलाल मरांडी, जो इन दिनों सबसे मुश्किल दौर में हैं और जिनके विधायक समूह बनाकर भाजपा में जा चुके हैं, उनसे तालमेल करना भाजपा के लिए इतना आसान नहीं होगा. हालांकि संघ का एक बड़ा खेमा और भाजपा में भी एक छोटा खेमा यह चाहता है कि बाबूलाल की घर वापसी हो जाए यानी वे फिर भाजपा में आ जाएं या कम से कम भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ें.

लेकिन, बाबूलाल मरांडी की महात्वाकांक्षा दूसरी है. शिबू सोरेन काफी बुजुर्ग हो चले हैं. सक्रिय राजनीति में उतने सक्रिय नहीं रहते. अपने बेटे हेमंत को लगभग राजपाट सौंप चुके हैं. जानकारों के मुताबिक हेमंत भले नंबर गेम के तहत मुख्यमंत्री बन गये हैं लेकिन अभी भी उनमें अपने पिता की तरह राजनीतिक नेतृत्व के गुण और गुर नहीं दिखते. बाबूलाल की महत्वाकांक्षा शिबू सोरेन के बाद सबसे बड़ा और सर्वमान्य आदिवासी नेता बनने की है. इसी के चलते वे एक बड़ा दांव खेलते हुए सोरेन से टकराने संथाल परगना चले गए थे. यह अलग बात है कि चुनाव हार गए.

दूसरी बात यह भी है कि बाबूलाल किसी भी तरह भाजपा से सटें, यह भाजपा के ही कई नेता नहीं चाहते. कम से कम अर्जुन मुंडा तो कतई नहीं क्योंकि वे बाबूलाल के समय में ही अचानक उभरे थे और बाबूलाल के बाद मुख्यमंत्री बन गए थे. मुंडा जानते हैं कि बाबूलाल अगर किसी तरह भाजपा से सट गए तो भाजपा में आदिवासी नेता होने की वजह से उन्हें वह तरजीह नहीं मिलेगी, जो संघ से संबंध होने की वजह से बाबूलाल को मिल सकती है.

उधेड़बुन के ऐसे ही दौर से गुजर रही भाजपा के बीच नरेंद्र मोदी पिछले माह तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पिछले सप्ताह कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच चुनावी शंखनाद कर जा चुके हैं. मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने का असर क्या होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी है. बस भाजपा के लिए सुकून की बात यही है कि कांग्रेस अभी आपस में ही माथाफोड़ी दौर में है. राज्य के वर्तमान मंत्रियों के कारनामे सामने आ रहे हैं. और इस वजह से कांग्रेस से लेकर झामुमो के खिलाफ एक निराशा का माहौल है.

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