सरकारी बदमाशी, बेबस आदिवासी | Tehelka Hindi

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सरकारी बदमाशी, बेबस आदिवासी

आदिवासियों के अधिकारों का जमकर उल्लंघन हो रहा है. मामला मध्य प्रदेश के बैतूल का है जहां वन विभाग की एक कार्रवाई ने उनके सिर से छत छीन ली है. वे इसका विरोध कर रहे हैं लेकिन प्रशासन इसकी अनदेखी कर रहा है

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गले में फांसी का फंदा, हाथों में हथकड़ी और मुंह पर पट्टी बांधे मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के कलेक्टर कार्यालय के सामने आदिवासियों का जमावड़ा लगा हुआ है. वे कोई नुक्कड़ नाटक नहीं दिखा रहे. यह तरीका है प्रशासन के खिलाफ उनके अनोखे प्रदर्शन का. ये तरीका है प्रशासन को उसकी वादाखिलाफी याद दिलाने, अपनी जमीन पर अधिकार पाने के संघर्ष और प्रशासन को संदेश देने का, तभी वे अपने प्रदर्शनों में कह रहे हैं…

‘जीने दो या फांसी दो, जमीन दो या मौत दो’

 बैतूल जिले के चिचौली क्षेत्र पश्चिम वन मंडल की सांवलीगढ़ रेंज में उमरडोह वनग्राम है. लगभग आधा सैकड़ा आदिवासी किसान परिवार यहां वर्षों से छप्पर बनाकर रह रहे हैं. वह यहीं खेती किसानी करते हैं और अपना परिवार पालते हैं. लेकिन 19 दिसंबर की सुबह उनसे उनका आशियाना छीन ले गई. उस दिन भी वह रोजमर्रा के कामों मे लगे थे. तभी अचानक वन विभाग की टीम पुलिस और एसएएफ के जवानों के साथ आ धमकी. उनके साथ जेसीबी मशीन भी थी. आदिवासी परिवार कुछ समझते, उससे पहले ही उनके आशियाने जेसीबी की जद में आ चुके थे. लगभग दो सौ लोगों का अमला तीन भागों में बंटकर पूरे क्षेत्र को घेर चुका था. असहाय आदिवासी मूकदर्शक बने बस अपने उजड़ते आशियानों को देख रहे थे.

 पुंदिया बाई भी उनमें से एक थीं. वह बताती हैं, ‘उन्होंने हमारा सब उजाड़ दिया. वर्षों से हम जिन पेड़-पौधों को बच्चों की तरह पाल रहे थे, उन्हें भी जड़ से उखाड़ दिया. टप्पर तोड़ दिए गए. विरोध करने पर मारपीट की गई.’ शिवपाल बताते हैं, ‘जाते-जाते वो बोल गए थे, पानी मत पीना… फसलें मत खाना… उनमें जहर मिला दिया है.’

उस दिन वन विभाग की टीम ने आदिवासी किसान परिवारों के सिर्फ आशियाने ही नहीं तोड़े बल्कि उनकी गेहूं की फसल को ट्रैक्टर से रौंद दिया. जेसीबी से खेत खोद दिए. पीने के पानी और फसल में कीटनाशक डाल दिया.

बीते 19 दिसंबर को वन विभाग ने बैतूल के उमरडोह वनग्राम के आदिवासी किसानों को उजाड़ दिया. वन विभाग ने इन परिवारों के सिर्फ घर ही नहीं तोड़े बल्कि उनकी फसल को भी रौंद दिया

क्षेत्र में दो दशकों से आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ रहे श्रमिक आदिवासी संगठन के अनुराग मोदी कहते हैं, ‘जिस जमीन पर ये परिवार दशकभर से अधिक समय से रह रहे हैं, वन विभाग उसे अपनी जमीन बताता है. इसलिए इन परिवारों को वहां से हटाना चाहता है. लेकिन  अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी अधिनियम (वन अधिकारों की मान्यता), 2006 के तहत यह गैरकानूनी है. इस कानून में प्रावधान है कि वे आदिवासी जो 2005 के पहले से जिन वन क्षेत्रों में रह रहे हैं उन्हें वहां से हटाया नहीं जाएगा. पर वन विभाग वन अधिकार अधिनियम 1927 के पुराने कानून के तहत काम कर रहा है. यह गलत है.’

उमरडोह वासियों के साथ ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ. इससे पहले भी वन विभाग 2011 में एक ऐसी ही कोशिश कर चुका है. लेकिन स्थानीय पत्रकार अकील अहमद बताते हैं, ‘2005 से ही वन विभाग के ऐसे प्रयास जारी हैं. पर हर बार वन विभाग के अमले के जाते ही ये लोग अपने छप्पर फिर से डालकर रहना शुरू कर देते थे.’ जिस दिन वन विभाग की यह कार्रवाई हुई उस दिन बैतूल में पारा लगभग चार डिग्री था. वो रात आदिवासी परिवारों ने अपने बच्चों सहित खुले आसमान के नीचे गुजारी. उन्हें उम्मीद थी कि बस एक-दो दिन की ही तो बात है. फिर से पहले की तरह छप्पर डाल लेंगे. लेकिन इस बार वन विभाग उन्हें हटाने की पूरी तैयारी में था. उनकी आजीविका का साधन उनकी फसल तो पहले ही नष्ट कर दी गई थी. चार दिन तक इन परिवारों ने सर्द रातें खुले आसमान के नीचे गुजारीं. जब बात नहीं बनी तो 24 दिसंबर को जिला कलेक्ट्रेट के आगे धरने पर बैठ गए. उनकी मांग थी कि वन अधिकार कानून 2006 को उसकी मूल भावना और प्रावधानों के साथ लागू किया जाए. साथ ही  उमरडोह में प्रशासन के दल ने वनभूमि से आदिवासियों के कब्जे हटाते समय ज्यादती की थी. उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के तहत बैतूल में बने शिकायत निवारण प्राधिकरण से जांच करवाकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए. जब आठ दिन धरने को हुए तो शासन-प्रशासन के माथे पर बल पड़ा.  मामले में राज्य के मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा. मुख्यमंत्री के आदेश पर स्थानीय विधायक हेमंत खंडेलवाल और जिला कलेक्टर ज्ञानेश्वर वी. पाटिल ने आदिवासियों की सभी मांगें मानने का आदेश देकर उन्हें धरने से उठाया. वे  वापस उमरडोह लौट गए. लेकिन उनके वहां पहुंचने से पहले ही वन विभाग वहां से उनका पूरा सामान भरकर ले जा चुका था. तब से ही वह कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं. वन विभाग की चौकी यहां से महज 500 मीटर की दूरी पर है. वन विभाग का अमला कभी भी आ धमकता है. गाली-गलौच करता है. महिलाओं से छेडछाड़ करता है. ठंड के कारण बच्चों की तबियत बिगड़ रही है. पर वह अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहते.

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फूलवती बाई बताती हैं, ‘हमारे घर तोड़ दिए तब भी उन्हें सुकून नहीं मिला. अब आते हैं, हमारे साथ जोर आजमाइश करते हैं. सामान में आग लगा देते हैं. नहीं तो यहां से भाग जाने को कहते हैं. रात को 10-10 बजे आते हैं. क्या सरकार ने रात की कार्रवाई के आदेश दिए हैं?’

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