टनाटन पर्यटन

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ऐसा नहीं है कि सड़कें आनंद के स्वर्ग तक नहीं ले जातीं. लेकिन पर्यटन और तीर्थ के स्थानों तक आनन-फानन में पहुंचाने की यह व्यवस्था अपने साथ एक विचित्र भीड़-भाड़, भागमभाग, कुछ कम या ज्यादा गंदगी, थोड़ी बहुत छीना-झपटी, चोरी-चपाटी सब कुछ लाती है. ऐसे में नरक बनती जा रही इन सड़कों से आनंद के स्वर्ग की यात्रा कठिन भी बनती जा रही है और पर्यटकों, तीर्थयात्रियों के मन में उस जगह दुबारा न आने का फैसला छोड़ जाती है.

चट्टी वाले दौर में देश के आम माने गए लोगों को हिमालय का अद्भुत सौंदर्य देखने को मिलता था. सड़क आने से यह दर्शन तो और भी सुलभ होना चाहिए था. पर सड़क से सिर्फ पर्यटक या तीर्थयात्री ही नहीं आते. पूरा व्यापार आता है. उस व्यापार ने यहां के जंगलों का सौदा भी बड़ी फुर्ती से कर दिखाया है. अब हरिद्वार से बस में बैठा पर्यटक पूरा हिमालय पार कर ले- उसे कहने लायक सुंदर दृश्य, सुंदर जंगल कम ही दिखेंगे.

पर्यटन की किसी भी जगह पर उतरते ही कौन-सा पर्यटक मेरा है, कौन-सा तेरा- इसका खुला बंटवारा, झगड़ा होने लगता है

फिर तुरत-फुरत पैसा कमाने की होड़ ने, दौड़ ने कई रास्ते बदल दिए हैं. पहले की यात्रा में तुंगनाथ और रुद्रनाथ शामिल थे. इनमें तुंगनाथ तो पूरे चार धाम के अनुभव में विशेष स्थान रखता था. उसके रास्ते में चोब्ता नाम की एक जगह के पास बनी चट्टियों में सचमुच ‘अनुपम सौंदर्य आपकी प्रतीक्षा में’ खड़ा मिलता था. इस पैदल सड़क को बनाने वाले पीडब्ल्यूडी विभाग ने एक बोर्ड यहां ऐसा ही लिखकर टांग दिया था. बताया जाता है कि सन1975 में आपातकाल को लगाने, दिन-रात राजनीतिक उठापटक से बिलकुल थक गई श्रीमती इंदिरा गांधी ने दो-चार दिन आराम करने के लिए चोब्ता को ही चुना था. घने जंगलों से ढकी इस अदभुत देवभूमि में बने एक छोटे-से डाक बंगले में श्रीमती गांधी के इस पर्यटन की भनक शायद देवताओं के अलावा किसी को भी नहीं लग पाई थी.

पर्यटन ने इस शांति को, आनंद को थोड़ा हटाकर टनाटन पैसा कमाने की एक नयी व्यवस्था कायम कर ली है. यह नया ढांचा विज्ञापन और स्वामित्व के तरह-तरह के दावों से पटा पड़ा है. पर्यटन की किसी भी जगह पर उतरते ही कौन-सा पर्यटक मेरा है, कौन-सा तेरा- इसका खुला बंटवारा, झगड़ा होने लगता है.

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ऐसी छीना-झपटी के कड़वे अनुभवों से बिलकुल अलग थीं राजस्थान की भर्तृहरि और चाकसू तीर्थक्षेत्रों की व्यवस्थाएं. अलवर और जयपुर जिलों में बने इन स्थानों में आज भी कोई 50 हजार यात्री पहुंचते हैं. यहां की पूरी बसावट कुछ अलग ढंग की है. यहां प्रवेश करते ही आपको अनेक धर्मशालाएं चारों तरफ दिखने लगेंगी. पर आपकी आंखों में कुछ खटकने लगेगा. इनमें से किसी भी धर्मशाला में न दरवाजे हैं, न खिड़कियां. भवन छोटा हो या बड़ा, प्रवेश द्वार तक नहीं मिलेगा यहां. सब कुछ पूरा खुला खेल. किसी भी धर्मशाला में बोर्ड नहीं, नाम नहीं, चौकीदार नहीं, दफ्तर या प्रबंधक नहीं. जहां मन करे, जगह मिल जाए, उसी कमरे में रुक जाएं.

ऐसी व्यवस्था बहुत सोच-समझकर बनाई गई थी. तीर्थक्षेत्र में अपना नाम, अपना महत्व, अपना पैसा, खानदान, स्वामित्व की भावना सब कुछ बिसार दो, सब कुछ भुला दो. तीर्थयात्री के रहने का प्रबंध करो और श्रेय प्रभु-अर्पण कर दो. स्वामित्व विसर्जन- यानी यह तेरे लिए है जरूर पर है तो मेरा- इसे भूल जाओ. कहो कि यह तेरा ही है. तेरे लिए ही है.

एक पुराना किस्सा बताता है कि यहां किसी सेठ ने तीन मंजिल की एक सुंदर धर्मशाला बनाई थी. उनके मुंशी की किसी गलती में उस नवनिर्मित भवन में बस पहले ही दिन कुछ क्षणों के लिए ‘यह मेरा है’ की गंध आई थी. तीर्थक्षेत्र में यह दुर्गंध तेजी से फैली. तीर्थक्षेत्र ने तुरंत सेठ को आदेश दिया कि यह पूरी धर्मशाला, तीन मंजिला भवन तुम अपने हाथ से हथौड़ा मार-मारकर गिरा दोगे. सेठ ने खूब समझाया कि मिल्कियत का निशान तो अब मिटा दिया है. इतनी सुंदर बनी हुई इमारत भला क्यों तुड़वा रहे हो. न जाने कितने सालों तक कितने ही तीर्थयात्रियों के काम आएगी यह. पर निर्णय हो चुका था. पूरी धर्मशाला तोड़ दी गई.

यह किस्सा शायद 500 बरस से यहां आने वाले हर तीर्थयात्री को याद है- एक आदर्श की तरह. ऐसी सख्ती तब नहीं दिखाई गई होती तो वह धर्मशाला भी मुंबई की आदर्श सोसायटी की तरह सीना तानकर खड़ी रहती और यहां आने-जाने वालों को कानून तोड़ने का सुंदर रास्ता, सुंदर तर्क सुझाते रहती.

भाग-दौड़ भरी इस नयी जिंदगी में यदि कुछ समय बचा लिया है, कुछ पैसा जमा कर लिया है तो फिर ‘बिस्तरा बांध’ पर्यटन के लिए निकल पड़ें. इसमें कोई आगा-पीछा न करें. हां, इतना जरूर करें कि जहां भी जाएं वहां यदि देशाटन और तीर्थाटन की पुरानी यादें खोज सकें तो इस टनाटन पर्यटन में भी कुछ नया आनंद जुड़ सकेगा.

मुलत: पर्यटन विशेषांक (15 जून 2011) में प्रकाशित

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