कोलकाता का हाथ रिक्शा : मेहनत ज्यादा, मेहनताना कम | Tehelka Hindi

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कोलकाता का हाथ रिक्शा : मेहनत ज्यादा, मेहनताना कम

कोलकाता की पहचान रहा हाथ रिक्शा इतिहास का एक अध्याय बनने की ओर अग्रसर है. लोगों में परिवहन के आधुनिक साधनों को अपनाने की ललक की वजह से कम मेहनताने और ज्यादा मेहनत वाले इस पेशे से जुड़े रिक्शाचालकों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है

तहलका ब्यूरो 2016-02-15 , Issue 3 Volume 8

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता कई तरह की संस्कृतियों को अपने आप में समेटे हुए है. ‘सिटी ऑफ जॉय’ के नाम से मशहूर इस शहर में मौजूद तमाम धरोहरों में से एक हाथ रिक्शा  भी है. कोलकाता जा चुके लोग इससे भलीभांति परिचित होंगे. यह वही हाथ रिक्शा है, जिसे बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में अभिनेता बलराज साहनी खींचते नजर आते हैं. आप बेशक इन्हें कोलकाता या फिर पश्चिम बंगाल की धरोहर मान सकते हैं लेकिन जब आप इन रिक्शों पर सवार होकर सैर पर निकलेंगे तब आप जान पाएंगे कि यह धरोहर चंद लोगों की लाचारगी या बेचारगी से ज्यादा अब कुछ नहीं है.

कहते हैं कि विकास की इबारत लिखते वक्त सिर्फ उन्हीं किस्सों या फिर उन्हीं लोगों को जगह दी जाती है जिन्हें समाज में कुछ तवज्जो मिलती है. शायद यही वजह है कि आपको कोलकाता के मशहूर हाथ रिक्शों के इतिहास या फिर इनकी शुरुआत कहां से हुई, ऐसे सवालों को तलाशने में कुछ मुश्किलें हों. इनके इतिहास को खोजने में आपको काफी समय लगेगा.

आप इन रिक्शों को पालकी से जोड़कर देख सकते हैं. वही पालकी जिन पर शिमला की वादियों में शाही घरानों की महिलाएं सफर किया करती थीं. उन रास्तों से इन पालकियों को अपने कंधों पर रखकर प्रवासी मजदूर बड़ी मुश्किलों से उनकी मंजिल तक पहुंचाते थे.  शिमला की वादियों से निकली पालकी हाथ रिक्शा के रूप में कोलकाता की गलियों तक आ पहुचीं. कभी शाही परिवार की सवारी रहा हाथ रिक्शा ब्रिटिशराज में अफसरों की पत्नियों यानी मेमसाहबों की सवारी बन गया था. वह रोज शाम को इन रिक्शों पर सैर के लिए निकलती थीं.

हाथ रिक्शा ने धीरे-धीरे तरक्की की और फिर इसे एक ऐसे ठेले में तब्दील कर दिया गया जिसे खींचने की जिम्मेदारी एक बेबस और लाचार इंसान के हाथों पर होती थी. धीरे-धीरे हाथ से खींची जाने वाली यह गाड़ी कोलकाता के जमींदार और उच्च वर्गों के बीच लोकप्रिय होती गई और दूसरों को आराम पहुंचाने के लिए मजबूर मजदूर इसे खींचने के लिए तैयार होता गया.

कोलकाता के ‘शंभू महतो’

एक धरोहर के अलावा कोलकाता के हाथ रिक्शे अब सामंतवादी प्रथा का एक अमानवीय चेहरा भी बन गए हैं. यह रिक्शे आधुनिकता की ओर बढ़ते एक शहर के लिए किसी पराजय से कम नहीं हैं. ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने उस किसान शंभू महतो की भूमिका निभाई है, जिसे अपनी जमीन छुड़ाने के लिए इस रिक्शे को खींचने के लिए मजबूर होना पड़ता है. कोलकाता में आज आपको ऐसे ही कई ‘शंभू महतो’ मिल जाएंगे जो कभी अपनी जीविका तो कभी किसी मजबूरी की वजह से इन रिक्शों को खींच रहे हैं.

दरअसल कोलकाता के इन हाथ रिक्शों की असली कहानी आपको वर्ष 1971 से देखने को मिलेगी. उस समय युद्ध के माहौल के बीच बांग्लादेश से कई प्रवासी यहां पहुंचे और इस शहर में अपनी गुजर-बसर के लिए पैसे कमाने के माध्यम के तौर पर उन्होंने हाथ रिक्शा चुना. उस दौर में रिक्शे के सामान्य किराये की वजह से रिक्शों का शहर में एक अलग दबदबा था. दूसरी ओर शहर में मौजूद परिवहन के दूसरे माध्यम भी अपनी लोकप्रियता  हासिल कर रहे थे. इसका नतीजा हुआ कि शहर के कई इलाकों में रिक्शे या तो बंद हो गए या फिर उनकी आवाजाही को सीमित कर दिया गया.

 प्रतिबंध की थी तैयारी

पश्चिम बंगाल में जब बुद्धदेब भट्टाचार्य की अगुवाई वाली कम्युनिस्ट सरकार थी, उस समय घोषणा की गई थी कि शहर में हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. सरकार इसे मानवता के साथ अन्याय का प्रतीक मानती थी और चाहती थी कि शहर को इससे छुटकारा मिल जाए. इन रिक्शों पर कलकत्ता वाहन विधेयक (संशोधित)  के तहत पूरी तरह से प्रतिबंध सुनिश्चित किया गया था. इसे वर्ष 2006 में विधानसभा में पेश भी किया गया था.  

उस समय इस प्रस्ताव को रिक्शा चालकों की ट्रेड यूनियनों की ओर से खासे विरोध का सामना करना पड़ा. यूनियनें रिक्शा चालकों के पुनर्स्थापन से जुड़े पैकेजों को लेकर आश्वस्त नहीं थीं. सरकार भी उस समय इन रिक्शा चालकों की बेहतर जिंदगी से जुड़े विकल्पों को उनके सामने रखने में असफल रही. विधेयक के सामने लगातार चुनौतियां आती गईं और अंत में हाई कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया.

हालांकि, वर्ष 2005 में हाथ से खींचने वाले रिक्शा के लिए लाइसेंस की व्यवस्था खत्म कर दी गई लेकिन रिक्शावाले यूनियनों की ओर से जारी समर्थन की बदौलत अपना काम करते रहे. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस समय तकरीबन 6,000 लोग इस काम से जुड़े हुए हैं. वहीं ऑल बंगाल रिक्शा यूनियन के आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो ये संख्या 6,000 नहीं बल्कि 24,000 है और इसमें गैर-लाइसेंसी रिक्शा चालक भी शामिल हैं. इन आंकड़ों में उन लाखों लोगों का कोई जिक्र नहीं है जो दो वक्त की रोजी रोटी के लिए इस रिक्शा पर निर्भर हैं. 

प्रवासी मजदूरों का पेशा

इन आंकड़ों को समझने और इस पूरे मामले पर नजर डालने के बाद आपको कोलकाता की गलियों में नंगे पैर और तन को सिर्फ एक लुंगी से ढंके हुए रिक्शा खींचते मजबूर लोग नजर आएं तो हैरान न हों. खुद को मिटाने की इनकी कोशिश उस घंटी के बिना पूरी नहीं हो पाती है, जिसके जरिए ये लोगों को आवाज लगाते हैं.

कोलकाता की सड़कों पर नजर आने वाले रिक्शा खींचने वाले ज्यादातर लोग अप्रवासी हैं. ये बिहार और झारखंड जैसे दूसरे राज्यों के विभिन्न शहरों से यहां आकर बसे हैं. घर के नाम पर अगर उनके पास कुछ है तो वह है डेरा यानी गैराज, रिपेयर सेंटर और शयनागार का एक मिलाजुला रूप. जो लोग इन ‘विलासिताओं’ का खर्च नहीं उठा पाते हैं वे सड़कों पर सोने को मजबूर हैं. वहीं डेरा मालिक इन रिक्शावालों को रोजाना कमीशन के आधार पर रिक्शा देते हैं. यहां पर आपको बता दें कि रिक्शावालों के कमरे का किराया इससे अलग होता है.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 3, Dated 15 February 2016)

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