जोगी थे सो मिट गए, अब योगी का ही राज…

हम गोरखपुर में बार-बार पूछते रहे कि इतनी बार सांसद रहे आदित्यनाथ, उसके पहले उनके गुरू भी सांसद रहे,  तो ऐसा कोई निर्माणकार्य है जो इनके कार्यकाल में हुआ हो! कोई जवाब नहीं दे पाता. यह जरूर पता चलता है कि हर साल योगी आदित्यनाथ की सांसद निधि का एक बड़ा हिस्सा उपयोग न होने की वजह से लैप्स हो जाता है. सुनने में आया है कि फिलहाल उनका जो अपना आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज है, वे उसे मेडिकल कॉलेज में बदलने की तैयारी में है. कहने के लिए योगी इसे जरूर भविष्य में अपनी एक बड़ी उपलब्धि बता सकते हैं. बाकी जो काम गोरखपुर में दिखता है, वह वीर बहादुर सिंह  ने किया था. ऐसा है तो आखिर आदित्यनाथ हमेशा चुनाव कैसे जीत जाते हैं?  जवाब मिलता है, ‘ सभी दल के लोग मिलकर सहयोग करते हैं और आदित्यनाथ नाथ भी जानते हैं कि दलों के साथ जनता को मिलकर सहयोग करना ही होगा, नहीं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे! ‘ इसका बड़ा सीधा सा गणित है. आदित्यनाथ और उनकी हिंदू ब्रिगेड, हिंदू वाहिनी सेना ने पूरे इलाके में हिंदू-मुसलमानों के बीच सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर इतनी दूरी बढ़ा दी है कि अब सबको यह लगता है कि एक बार भी योगी आदित्यनाथ नहीं रहे तो इतने वर्षों का बदला उनसे लिया जा सकता है. जबकि यह आदित्यनाथ के लोगों द्वारा फैलाए गए भ्रम के अलावा कुछ भी नहीं है. लेकिन इस भ्रम का असर ऐसा हुआ है कि गोरखपुर के जो असल जोगी होते थे,  सारंगी लेकर चलने वाले, उनकी नई पीढ़ी ने उनकी सारंगियों को तोड़ दिया है कि तुम मुसलमान हो तो हिन्दू फकीरी क्यूं करोगे!

हम बार-बार पूछते हैं लोगों से कि यह शहर इंसेफलाइटिस की बीमारी का गढ़ है, हर साल बच्चे मरते हैं, आदित्यनाथ की ओर से क्या किया गया उसे लेकर. बताया गया कि योगी जी ने एक फॉर्मूला तय कर लिया है. हर साल एक पैदल मार्च निकालते हैं इंसेफलाइटिस के खिलाफ, अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियां और तस्वीरें आती हैं और फिर संसद में कुछ सवाल उठाते हैं, कुछ दिनों बाद उनकी बुकलेट तैयार होकर बांट दी जाती है कि देखिए सांसद जी ने कितने सवाल उठाए गोरखपुर वालों के लिए. यहां के लोगों की बात से मालूम हो जाता है कि आदित्यनाथ की असली ताकत गोरखपुर का विकास या गोरखपुर को आगे ले जाने की रणनीति वाली राजनीति नहीं बल्कि मानसिक तौर पर और पीछे, और पीछे बनाकर ही खुद को आगे बढ़ाने की रणनीति रही है. देशभर में आदित्यनाथ के बयानों पर विरोध होता है लेकिन गोरखपुर में ऐसा क्यों नहीं है. इसका जवाब कोई नहीं देता. सब कहते हैं कि विरोध करनेवाली संस्थाएं सिमट गई हैं. व्यक्ति भी सिमट गए हैं. नाटक की सौ से ज्यादा मंडलियां यहां थीं, सबकी गतिविधियां थमी हुई हैं. कई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन थे, जो विरोध के स्वर निकालते थे. सब अपने अपने काम में लगे हुए हैं. दूसरे दल के नेता भी गोरखपुर तभी आना चाहते हैं या गोरखपुर पर तभी बात करना चाहते हैं, जब उन्हें चुनाव का टिकट मिल जाए. बाकी समय योगी को वॉकओवर मिला रहता है, मनमर्जी की राजनीति करने का और कुछ भी काम नहीं कर के सिर्फ इलाके का दौरा कर नेता बने रहने का.

8 COMMENTS

  1. सारी दूरी हिन्दू युवा वाहिनी ने ही बढाई है? और तेरे अब्बू मुसलमान तो बिलकुल भेड के बच्चे की तरह मासूम हैं

  2. kia jaha ki M. P Shiri yogi ji nahi hi ya hindu youa wahni nahi hi waha par hindu samaj aasurakhchhit hi…. (nirala ji aap true likhte rahe thanx)

  3. Nepal ke border par basa gorakhpur aaj agar surakshit hai to kewal Hindu yuva vahini ke karan, nahi to kabhi ka ISI ka headquarter ban gaya hota

    • Nirala ji aaj Jo lekh likh rahe hain woh kewal Hindu rashtra mein rahne ki wajah se hi sambhav hai, pak mein me kattaron ke agst koi lekh likha hota to 160/- kg ke hisab se bik gaye hote aagle hi din

  4. abey nirala wo baki sab nausikhiy or ghag reporter sirf fame k liy jo yogi aadityanath or hindu vahini par kechad fakney wala jab tumhare ye shantidoot (tumhare abbu) tumhari hi betio ko utha le jayenge tab rote huay aaoge ……thooo tum sab fame k bhuke jalil kutto par

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