राष्ट्रवाद की बहस पुनर्जीवित हुई है | Tehelka Hindi

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राष्ट्रवाद की बहस पुनर्जीवित हुई है

आरएसएस एक समृद्ध संगठित ताकत है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती? यह भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन का यथार्थ है.

2016-03-15 , Issue 5 Volume 8

RSS Camps. Photo by Prakash Hatvalne/Tehelka

राष्ट्रवाद की परिभाषा और राष्ट्रवाद का वर्तमान संदर्भ दोनों को समझना पडे़गा. वर्तमान संदर्भ फिर से उस बहस को पुनर्जीवित कर रहा है जिस बहस को 1920 में रोक दिया गया था. मैं 1920 इसलिए कह रहा हूं कि बाल गंगाधर तिलक का निधन 1920 में हुआ था. औपनिवेशिक काल में एक ऐसा युग आया जब महर्षि अरविंद, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, राजनारायण बसु ऐसे तमाम लोग जो अलग-अलग भाषा और प्रांतों के लोग थे, उन्होंने राष्ट्रवाद की बहस को भारतीय संदर्भ में शुरू करने की कोशिश की. इस बहस ने भारत के राष्ट्रवाद को एक मजबूत धरातल पर प्रस्तुत किया था. राष्ट्रवाद में जो एक नकारात्मकता थी, उसमें एक सकारात्मकता जोड़ने की कोशिश की थी. उनके पूरे मूल्यांकन में, उनकी बहस में प्रगतिशील भारतीय संस्कृति के तत्व थे. उन्होंने कभी रूढ़िवादी तत्वों को इसमें नहीं रखा, प्रगतिशील तत्वों को रखा ताकि राष्ट्रवाद को ताकत मिले. लेकिन हुआ यह कि इन लोगों के बाद राष्ट्रवाद की पूरी बहस यूरोप द्वारा स्थापित मापदंडों के आधार पर शुरू हो गई. यूरोप ने जो राष्ट्रवाद की परिभाषा, जो मापदंड दिया उसके आधार पर शुरू हो गई. वही बहस आज तक चलती रही है. इस बहस में जिन लोगों ने भी हस्तक्षेप करने का काम किया, या तो उनमें मौलिकता नहीं थी या मौलिकता थी तो वह बहुत विवेचनापूर्ण नहीं थी. जिससे तथ्यात्मक बहस पुनर्जीवित नहीं हो पाई. आज जेएनयू की घटना इस बहस को पुनर्जीवित करने का एक निमित्त बन गई. मैं एक संदर्भ तो यह मानता हूं.

मैंने यूरोप की बात इसलिए की, क्योंकि यूरोप और भारत की राष्ट्रवाद की परिभाषा में एक बुनियादी अंतर है. ऐसा नहीं है जो मैं कह रहा हूं यूरोप में सब लोग वही मानते हैं पर मोटे तौर पर, यूरोप के राष्ट्रवाद को पढ़ने से समझ में आता है कि राष्ट्रवाद ने राष्ट्र पैदा किया. साधारणतया देखें तो वहां राष्ट्रवाद पर विमर्श तब शुरू हुआ जब प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रों का टूटना और जुड़ना शुरू हुआ. भाषा के आधार पर राष्ट्र बनते गए, जातीयता के आधार पर राष्ट्र बनते गए. इसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वहां राष्ट्रवाद पर विमर्श बहुत तेज हो गया. राष्ट्रवाद पर बहुत-सी किताबें लिखी गईं.

भारतीय राष्ट्रवाद की प्रकृति अलग है. भारत में हमारा मानना है कि राष्ट्र ने राष्ट्रवाद को पैदा किया. वे मानते हैं कि राष्ट्रवाद आधुनिकता का प्रतीक है, आधुनिकता का उत्पाद है और हम मानते हैं कि राष्ट्रवाद एक सनातन सत्य है. इसका आधुनिकता से और पुरातनता से कोई लेना-देना नहीं. इसका मैं एक प्रमाण देता हूं. राधा कुमुद मुखर्जी ने आजादी के बाद जब इस बहस को पुनर्जीवित करने की कोशिश भारतीय विद्या भवन में शुरू की थी तो उन्होंने एक पुस्तिका लिखी और उस पुस्तिका में वेदों में 68 श्लोकों का एक संग्रह प्रस्तुत किया जिसमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद यानी मातृभूमि का विशेष उल्लेख है. इस तरह भारत की कल्पना यूरोप की कल्पना से भिन्न है.

कभी-कभी किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए तमाम  हथकंडे अपनाए जाते हैं. मैं यह मानता हूं कि जो लोग आरएसएस के खिलाफ जहर उगलते हैं, अनर्गल बातें करते रहते हैं, क्या वह अभिव्यक्ति पर हमला नहीं है?

दूसरी बात, महर्षि वाल्मिकी ने जो लिखा ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, इससे एक सकारात्मक राष्ट्रवाद का संकेत  मिलता है कि हम अपनी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी ज्यादा बहुमूल्य और महत्वपूर्ण मानते हैं. तो अब मैं कहता हूं कि भारतीय परिवेश में राष्ट्रवाद का तात्पर्य होता है कि राष्ट्र के प्रति सरोकार रखना. राष्ट्र के प्रति सरोकार रखने में सिर्फ भूमि के लिए सरोकार नहीं है बल्कि भूमि, भूमिपुत्र यानी यहां के लोग, यहां की विरासत, यहां का इतिहास, हमारी संस्कृति इन सबके प्रति जब आप सरोकार रखते हैं तो वह राष्ट्रवाद कहलाता है. उस सरोकार का तात्पर्य यह नहीं है कि आप क्रिटिकल नहीं हैं, आप यहां की भूमि, यहां के भूमिपुत्र, यहां की संस्कृति या सरोकार के प्रति क्रिटिकल हों. हमारे पूरे विमर्श में आलोचनात्मकता को बहुत महत्व दिया गया है. लेकिन राष्ट्रवाद में जो विमर्श हो, उसमें सृजनशीलता हो. उसका मैं एक उदाहरण देता हूं. राष्ट्रवाद के महत्व में सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था. बाकी लोगों ने भी राष्ट्रवाद पर बातें कहीं पर रवींद्रनाथ टैगोर जी का हस्तक्षेप सैद्धांतिक हस्तक्षेप है. यूरोपियन राष्ट्रवाद के समांतर उन्होंने उस विवेचन को देखने की कोशिश की.

उस वक्त राष्ट्रवाद शब्द इसलिए नकारात्मक बन गया था क्योंकि यूरोप ने राष्ट्रवाद का ही इस्तेमाल करके द्वितीय विश्वयुद्ध में मानवता को धकेल दिया था. राष्ट्रवाद का जो यूरोपीय दृष्टिकोण है उसने ही फासीवाद को पैदा किया, नाजीवाद को पैदा किया, जापानी सैन्यवाद को पैदा किया. इस कारण राष्ट्रवाद के प्रति एक भ्रांति बनी.

टैगोर ने उस संदर्भ में राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए एक वैकल्पिक स्वरूप दिया. उन्होंने राष्ट्रवाद का तात्पर्य बताया और उन्होंने उस शब्द को छोड़कर एक नई शब्दावली देने की कोशिश की. उन्होंने राष्ट्रवाद के मूल तत्व जो भारत का मूल तत्व है, जो तिलक में दिखाई दिया, जो विपिन चंद्र पाल में दिखाई पड़ा, बंकिमचंद्र में दिखाई पड़ा, उन तत्वों को ही उभारने की कोशिश की इसलिए मैं उनकी आलोचनाओं को उस पृष्ठभूमि में जो यूरोपीय राष्ट्रवाद की विसंगतियां थीं, उसकी आलोचना मानता हूं. उसे भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचना नहीं मानता. शब्द भले ही दोनों जगह एकसमान थे पर उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचना नहीं की. भारत में राष्ट्र की जो एक सांस्कृतिक विरासत है, यह सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक बहुलतावाद विश्व में कहीं और नहीं मिलता है. आध्यात्मिक लोकतंत्र जो भारत के समाज में मौजूद है वह राष्ट्रवाद को वैश्विक परिवेश में ले जाता है. इसी कारण से हिंदू राजा चिरामन ने केरल में मंदिर को मस्जिद में बदल दिया ताकि अरब से आने वाले व्यापारियों को पूजा का स्थान मिल सके और यह दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी मस्जिद है. जिसकी चर्चा भारत की टेक्स्टबुक में नहीं होती है. जैसे दारा शिकोह की बहुत चर्चा नहीं होती है, जो तत्व भारत में धर्मों के बीच संवाद, धर्मों के बीच सत्संग की बात करते हैं उन तत्वों को मार्क्सवादी इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने बाहर रखा है. इसके दो उदाहरण हैं, चिरामन और दाराशिकोह.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 5, Dated 15 March 2016)

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