असम राइफल्स : सेना में सड़ांध | Tehelka Hindi

असम राइफल्स : सेना में सड़ांध

तहलका की पड़ताल बताती है कि कैसे देश के सबसे बड़े अर्द्धसैन्य बल- असम राइफल्स में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया है

देश के पूर्वोत्तर इलाके में स्थित सात राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा की बात की जाए तो वहां अशांति या कहें तो किसी छोटे-मोटे युद्ध जैसी परिस्थितियां हर वक्त बनी रहती हैं. यहां एक तरफ विद्रोही गुट हैं तो दूसरी तरफ सुरक्षा बल. इनके बीच सालों से चल रहे संघर्ष की आम नागरिकों ने बड़ी कीमत चुकाई हैै. इस मायने और कई सामाजिक आयामों में सुदूर उत्तर-पूर्व के ये राज्य शेष भारत से काफी अलग हैं. पर तहलका की हालिया तहकीकात बताती है कि कम से कम एक मामले यानी भारतीय संस्थानों की व्यवस्थागत बुराइयों में यहां तैनात संगठन भी शेष भारत से अलग नहीं हैं. हम भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैैं. छिपे हुए कैमरों से जरिए की गई हमारी पड़ताल बताती है कि इस इलाके में अशांति दूर करने के लिए तैनात असम राइफल्स में भ्रष्टाचार नीचे से लेकर ऊपर तक, हर स्तर पर है.

अतीत में भी देश के इस सबसे पुराने अर्द्धसैन्य बल पर विवेकाधीन फंड के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं. तहलका ने अपने छिपे कैमरे के जरिए यह खुलासा किया है कि कैसे असम राइफल्स के कुछ अधिकारी निर्माण कार्यों के लिए जारी निविदाओं आदि को आसानी से पास करने के लिए ठेकेदारों से हिस्सा ले रहे हैं. असम राइफल्स में अनेक अधिकारी सेना से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं. तहलका को अपनी पड़ताल में यह भी पता चला कि ये अधिकारी जब वापस अपने मूल संस्थान में लौटते हैं तो इनके पास अकूत अवैध संपत्ति जमा हो जाती है. चौंकाने वाली बात यह है कि सुरक्षाबल में यह काम संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. इस रैकेट में क्लर्क और उच्चाधिकारी तक सभी समान रूप से शामिल हैं.

मुश्किल लड़ाई मोर्चों पर तैनात जवानों की जान हमेशा जोखिम में रहती है जबकि उनके अधिकारी पैसा बनाने में लगे रहते हैं. फोटोः एएफपी

imgयह कैसे होता है
हर वित्त वर्ष में केंद्र सरकार सुरक्षा बलों के लिए बजटीय आवंटन करती है. इस वर्ष (2014-15) के बजट में असम राइफल्स को 3,580 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इससे पहले के दो सालों में यह आवंटन क्रमश: 3,358 करोड़ और 2,966 करोड़ रुपये था.

सालाना बजट में जिन निर्माण परियोजनाओं का उल्लेख होता है उनका क्रियान्वयन निविदाओं के जरिए किया जाता है. हर स्तर पर अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें हर प्रस्ताव (निर्माण ठेके के लिए) को एक जगह से दूसरी जगह भेजते समय उनके हिस्से का पैसा मिले. रिश्वत देने वाले ठेकेदार बताते हैं कि किसी भी परियोजना की लागत अधिकारियों की जेब भरने के क्रम में सीधे 30 फीसदी तक बढ़ जाती है. इसका असर निर्माणकार्य की गुणवत्ता पर पड़ता है. असम राइफल्स में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि अधिकारी अपने कार्यालयों में खुले आम रिश्वत लेने से नहीं हिचकते.

इन भ्रष्ट सैन्कर्मियों के काम करने का तरीका एकदम साधारण है. जब भी कोई ठेकेदार असम राइफल्स के प्रशासन और उसकी निगरानी वाले इलाके में किसी निर्माण कार्य के लिए निविदा भरता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह एक खास नेटवर्क से संपर्क करेगा. इसके जरिए ही हर स्तर पर धन पहुंचाया जाता है. लूट का माल छोटे क्लर्कों से लेकर महानिदेशक तक बंटता है. महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल के रैंक के अधिकारी हंै. बड़े अधिकारी सीधे नकदी नहीं लेते हैं बल्कि उनके लिए उनके अधीनस्थ अधिकारी धन लेते हैं.

एक पुराना ठेकेदार जो इस काम में पिछले सात सालों से है, उस दिन को याद करके अफसोस करता है जब उसने इस पेशे में आने की ठानी थी. यह अफसोस स्वाभाविक है. अगर कोई निविदा एक करोड़ रुपये की है तो करीब 30 फीसदी यानी 30 लाख रुपये यह सुनिश्चित करने में खर्च करने पड़ते हैं कि आगे कोई गतिरोध न आए और पूरा काम सहज ढंग से संपन्न हो. दूसरे शब्दों में कहें तो परियोजना की 30 फीसदी राशि काम शुरू होने के पहले ही खर्च हो जाती है. वह ठेकेदार कहता है, ‘प्रस्तावित निविदा का 30 फीसदी हिस्सा असम राइफल्स के विभिन्न अधिकारियों को देना पड़ता है. कई बार तो यह राशि 35 फीसदी तक हो जाती है. हमें बचे हुए पैसे से ही कच्चे माल, श्रमिकों और मुनाफे का जुगाड़ करना होता है.’ स्पष्ट है कि इसका असर काम की गुणवत्ता पर पड़ता है.

ठेकेदार आगे समझाता है, ‘पहले आप एक निविदा भरते हैं ताकि वह पास हो जाए. वह शिलॉन्ग जाती है. वहां आपको पांच से आठ फीसदी रिश्वत देनी होती है. अगर आप रिश्वत नहीं देंगे निविदा वहां से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी. आपकी परियोजना शुरू होने के पहले ही समाप्त हो जाएगी. लब्बोलुआब यही कि किसी भी हालत में 30 फीसदी राशि देनी ही होगी. कुल खर्च 30 फीसदी है लेकिन रिश्वत की राशि एक बार में नहीं देनी होती. वह चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ती है. पहले निविदा के स्तर पर, फिर बिलिंग के स्तर पर और इसी तरह आगे. इसका एक बड़ा हिस्सा विशेष अधिकारी के पास जाता है, जहां से निविदा आरंभ होती है.’

ठेकेदार
असम राइफल्स के साथ कुल मिलाकर 543 ठेकेदार पंजीकृत हैं. मोटेतौर पर उनकी पांच श्रेणियां हैं. उनको स्पेशल, ए, बी,सी और डी श्रेणियों में बांटा गया है. यह वर्गीकरण पैसे के आधार पर किया जाता है. जो स्पेशल यानी खास श्रेणी में होते हैं, वे ऐसी परियोजनाओं में शामिल होते हैं जिसमें बेशुमार पैसा होता है. ए और बी श्रेणी में वे ठेकेदार होते हैं जो क्रमश: दो करोड़ और एक करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं के लायक होते हैं. सी और डी श्रेणी में इससे कम पैसे वाले ठेकेदार होते हैं. नए ठेकेदार स्वत: डी श्रेणी में आते हैं. बाद में उनको उनके प्रदर्शन के मुताबिक आगे बढ़ाया जाता है.

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साड़ी, केक और स्कॉच

असम राइफल्स पर सरकारी फंड के हेरफेर के आरोप नए नहीं हैं. दस्तावेज बताते हैं कि सरकारी पैसे का सबसे ज्यादा दुरुपयोग गृह मंत्रालयों और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को तोहफे देने के लिए किया गया है. इनमें साड़ियों से लेकर केक, मिठाई और स्कॉच की बोतल तक शामिल हैं. इन सामानों के लिए खर्च किया गया पैसा असम राइफल्स के विवेकाधीन फंड से आता है. हालांकि विवेकाधीन फंड के तहत भी पैसे का इस्तेमाल अर्द्धसैन्यबल के कल्याण कार्याें और अन्य जरूरतों  के लिए ही खर्च किया जाना चाहिए. इस साल के बजटीय प्रावधानों में असम राइफल्स को 3,580 करोड़ रुपये  आवंटित किया गया है. खबरें हैं कि विवेकाधीन फंड जो अर्द्धसैन्यबल के महानिदेशक (डीजी) के जिम्मे होता है, से लगभग हर दिन पैसे का दुरुपयोग किया गया है. सूत्रों का कहना है कि इस फंड के तहत एक अधिकारी के निजी खर्च, विशेषतौर पर उनकी पत्नी के लिए 23 हजार रुपये  खर्च किए गए थे. सेना मुख्यालय द्वारा इस मामले की शुरुआती जांच के दौरान दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि हुई है.

कैसे होता है बंटवारा

अवैध रूप से हासिल की गई धनराशि को बांटने का तरीका एकदम व्यवस्थित है. पांच फीसदी पैसा उस क्षेत्र को जाता है जहां परियोजना होनी होती है. कुछ मामलों में तो यह राशि 10 फीसदी तक होती है. इसके अलावा पांच फीसदी धन राशि डीजीआर (पुनर्वास महानिदेशक या डायरेक्टर जनरल रीसेटलमेंट) को जाती है. इसके बाद उस यूनिट को पांच फीसदी जहां बिल जाता है. जब बिल संबंधित क्षेत्र में वापस आता है तो तीन फीसदी राशि अधिकारियों को दी जाती है और पांच फीसदी अन्य राशि डीजीआर को. आखिर में सात फीसदी मूल्यवर्धित कर (वैट) भी इस खर्च में जुड़ता है. इस तरह कुल मिलाकर 30 फीसदी राशि खर्च हो जाती है. इसके अलावा एक फीसदी राशि लेखा विभाग को भी देनी होती है क्योंकि पैसा वहीं से जारी होता है.

ऑपरेशन ‘हिलटॉप’
इसकी शुरुआत सी श्रेणी के एक ठेकेदार के साथ हुई जो असम राइफल्स के लिए काम करता था. केरल निवासी सीसी मैथ्यू नाम के इस शख्स ने तहलका से संपर्क किया. मैथ्यू एक भूतपूर्व जवान हैं और वे असम राइफल्स के भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहते थे. तहलका से संपर्क करने से पहले वे विभिन्न मीडिया संस्थानों के पास मदद के लिए गए लेकिन उनको हर जगह से निराश होकर लौटना पड़ा. इसके बाद तहलका की विशेष खोजी टीम ने इस व्हिसलब्लोअर का साथ देने की ठानी.

बीते साल इस ठेकेदार ने मणिपुर के तमांगलॉन्ग जिला मुख्यालय में एक शेल्टर खड़ा किया था. 24 लाख रुपये के इस अनुबंध में वह निविदा लेने के लिए ही 16 फीसदी राशि रिश्वत के रूप में दे चुका था. अब वह 18 फीसदी और राशि रिश्वत के रूप में अधिकारियों को देने जा रहा था ताकि उसका बिल पास हो सके. इस बार तहलका का यह संवाददाता, मैथ्यू का रिश्तेदार बनकर उनके साथ गया और देश के इतिहास में पहली बार सैन्य वर्दियों में सजे अधिकारी कैमरे पर रंगे हाथ रिश्वत स्वीकार करते पकड़े गए! इसमें एक कर्नल और दो लेफ्टिनेंट कर्नल शमिल थे. स्तब्ध करने वाली बात यह है कि असम राइफल्स के प्रमुख ने भी अप्रत्यक्ष रूप से अपने अधीनस्थ के जरिये अपना हिस्सा लिया. जूनियर कमीशंड ऑफिसर एच देब ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के लिए धन लिया. इन अधिकारियों में डीजी, एडीजी और चीफ इंजीनियर शामिल थे.

देब: मुझे तीन (हजार) और दीजिए.
ठेकेदार: सर प्लीज, तीन रहने दीजिए.
देब: मुझे देना होगा, प्लीज समझिए.
ठेकेदार: (हंसता है)
देब: मुझे लिंबू (सूबेदार, इंजीनियर जेसीओ) और अन्य लोगों को देना होगा. इसमें वो लोग भी शामिल हैं जो पांच फीसदी लेते हैं.

peeहमारा स्टिंग ऑपरेशन क्लर्क कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ और एकदम शीर्ष तक पहुंचा. सूबेदार गौतम चक्रवर्ती ने न केवल बिल पास करने के लिए अपना हिस्सा लेने पर जोर दिया बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि ठेकेदार एक पुरानी परियोजना के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल कक्कड़ का बकाया पैसा भी दे जिनका अब दूसरी जगह स्थानांतरण हो चुका है. लेफ्टिनेंट कर्नल कक्कड़ की ओर से पैसा लेने के बाद चक्रवर्ती ने उनको फोन करके ‘अच्छी खबर’ भी दी.

2 Comments

  • koi assam regiment mai bhi sting karo yaar…….!!!

  • एकदम सही पड़ताल है । मैं तो यह कहूँगा कि इस बल में आर्मी का डेप्यूटेशन बंद कर दिया जाना चाहिए । आर्मी आफिसर इसे दुधारू गाय समझते हैं । असम राइफल्स का जवान विपरीत परिस्थितियों के साथ-साथ सेना के अधिकारियों का हमेशा शिकार होता है । असम राइफल्स कैडर के अधिकारियों के साथ भेदभाव भी करते हैं सेना के अधिकारी ।