Volume 7 Issue 15 Archives | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi

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कभी रवीश कुमार मत बनना

अपने आप को नौजवानों की आंखों में चमकते देखना किसे नहीं अच्छा लगता होगा. कोई आप से मिलकर इतना हैरान हो जाए कि उसे सबकुछ सपने जैसा लगने लगे तो आप भी मान लेंगे कि मुझे भी अच्छा लगता होगा. कोई सेल्फी खींचा रहा है कोई ऑटोग्राफ ले रहा है.  

पत्रकारिता या पीआर

क्या नेटवर्क 18, दैनिक भास्कर समूह, जी नेटवर्क, टाइम्स ग्रुप या ऐसे तमाम मीडिया समूह जनतंत्र की मूल आत्मा और उसके ढांचे के लिए खतरनाक हैं जो एक ही साथ दर्जनभर से ज्यादा ब्रांड को चमकाने और उनसे अपने मीडिया बिजनेस का प्रसार करने में लगे हैं? देश के इन  

इस पेशे में हर शख्स बीमार सा

अनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कुछ साल पहले मीडिया स्टडीज ग्रुप की ओर से देश में कार्यरत मीडियाकर्मियों की कार्यस्थिति और जीवन-स्तर का अंदाजा लगाने के उद्देश्य से एक सर्वेक्षण किया गया. 13  

पत्रकारिता : प्रतिनिधित्व का पाखंड

मीडिया के भीतर जब एक साथ धर्म, जाति और लैंगिक आधार पर भेदभाव और उनके प्रतिनिधित्व के अभाव को लेकर बातचीत करनी होती है तो ये कहना पड़ता है कि 8 प्रतिशत हिंदू सवर्ण पुरुषों का मीडिया के भीतर वर्चस्व है. मीडिया स्टडीज ग्रुप के एक अध्ययन में ये साफ  

मुद्दों की लड़ाई से दूर पत्रकार यूनियन

पिछले दिनों एक मीडिया समूह ने 50 पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. मीडिया समूहों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. इससे पहले भी अलग-अलग संस्थानों से कभी 150 तो कभी 350 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट  

जन मीडिया नहीं अभिजन मीडिया कहें

अपने एक लेख ‘मीडिया एंड गवर्नेंस’ की शुरुआत करते हुए पत्रकार मुकुल शर्मा आधुनिक राजनीति के बारे में दिलचस्प बातें कहते हैं. उनका कहना है कि आधुनिक राजनीति एक मध्यस्थता करने वाली राजनीति है, जो ज्यादातर नागरिकों द्वारा ब्रॉडकास्ट और प्रिंट मीडिया के जरिए अनुभव की जाती है. जाहिर सी  

कारतूस के साये में कलम

तकरीबन तीन हफ्ते पहले कश्मीर घाटी के सोपोर में जब छह लोगों की अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी तो 1990 के दशक की याद आ गई जब इस तरह की घटनाएं आम थीं. उस वक्त बहुत सारे लोग मारे गए, किसी ने न तो इसकी जिम्मेदारी ली थी और  

गांव का पत्रकार, चुनौतियां हजार

खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ काम नहीं हैं. ग्रामीण पत्रकारिता बहुत आसान नहीं है. संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है. कई बार तो इन  

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ज्यादा वक्त नहीं बीता जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने सोशल मीडिया पर फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को लेकर कामुक टिप्पणी की और वीडियो अपलोड किया. इसे ‘ओह माय गॉड! दीपिका’ज़ क्लीवेज शो’ जैसे घटिया शीर्षक के साथ लगाया गया था, जिसके बाद इस हरकत की आलोचना का दौर शुरू हुआ  

तथ्यों पर भारी तेजी

बहुत से लोगों को ये पता भी नहीं होगा कि प्रसारण पत्रकारिता के इतिहास के सबसे बड़े क्षण ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था. 1967 में डेविड फ्रॉस्ट अपने शो ‘फ्रॉस्ट प्रोग्राम’ में एमिल सवुंद्रा से सवाल-जवाब कर रहे थे. सवुंद्रा श्रीलंकाई काले बाजार के एक व्यापारी थे