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जाति, रंग, धर्म और गरीबी संबंधी फब्तियां भी रैगिंग

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जूनियर छात्र की जाति, रंग और धर्म पर फब्तियां कसना भी अब रैगिंग की श्रेणी में आएगा. इतना ही नहीं, आर्थिक आधार पर मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना भी रैगिंग कहलाएगी. यह प्रावधान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग अपराध  

‘नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है’

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों  

जाने चले जाते हैं कहां…

संजय तिवारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ में 2003-04 में अध्यक्ष चुने गए थे. इसके पहले वे महामंत्री भी रह चुके थे. वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय थे. उन्हें भाषण कला अच्छी आती थी. वे समय-समय पर छात्रों का मुद्दा उठाते रहते थे. छात्रों के बीच अक्सर चर्चा हुआ करती थी  

‘हमने तय किया था कि चुनाव लड़ेंगे अगर नहीं भी जीत पाए तो इतिहास बनेगा’

जिस छात्रसंघ में लड़कियों की मौजूदगी बिल्कुल नहीं थी, वहां पर चुनाव लड़ने का फैसला कैसे किया? यहां का पूरा चुनाव धनबल और बाहुबल से लड़ा जाता है जैसे विधानसभा या संसद का चुनाव हो. हमारे छात्रसंघ चुनाव का स्वरूप लगातार बदलता जा रहा था. लोग छात्रनेता होकर तुरंत राजनीति  

‘कांग्रेस ने छात्रसंघों का अपराधीकरण किया’

छात्र राजनीति के लगभग खात्मे की कोई एक वजह नहीं है. ऐसी बड़ी सामाजिक-राजनीतिक परिघटना के अनेक कारण होते हैं. 70 के दशक के बाद बदलाव का बड़ा बिंदु है आपातकाल. उस दौरान दो चीजें हुईं. एक तो आपातकाल के खिलाफ बड़ा आंदोलन उठ खड़ा हुआ. जिसमें समाजवादी छात्र संगठन,  

शिक्षा बचाने का संघर्ष

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नॉन नेट फेलोशिप खत्म करने का निर्णय लेने के बाद देश के कई विश्वविद्यालयों में शुरू हुआ आंदोलन खत्म होने की जगह बढ़ता जा रहा है. हालांकि, बाद में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फेलोशिप खत्म न करने की बात कही, लेकिन छात्र-छात्राओं ने फेलोशिप  

यूजीसी का स्वप्न, छात्रों का दुःस्वप्न

वे छात्र जो मतदान करके सरकार चुन सकते हैं, उच्च स्तरीय शोध पत्र लिख सकते हैं, वे शैक्षिक टूर पर जाने जैसे निर्णय खुद नहीं ले सकते. इसके लिए उन्हें अभिभावक के अनुमति लेना अनिवार्य है. इसके अलावा उन्हें खुफिया निगरानी में रखा जाना चाहिए ताकि उनके लिए ‘सुधारात्मक कदम’