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पंजाब की राजनीति का ‘गुरु’ फैक्टर

दुनिया भर के गेंदबाजों की नाक में दम करने वाले क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू राजनीति की पिच पर अपने खेल से सबको चौंका रहे हैं. अपनी कंमेंट्री, अपने हंसने के अंदाज और चुटीले संवाद के लिए मशहूर पूर्व सलामी बल्लेबाज सिद्धू का गेम प्लान विश्लेषकों की समझ  

‘हां, मैं चाहती हूं कि चुनाव प्रचार की कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह ही संभाले’

आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत की क्या संभावनाएं देखती हैं? कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने के लिए तैयार है. जीत के लिए अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं. पिछले चुनावों में भी करीब 20 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का मार्जिन बहुत कम था. हम पंजाब चुनावों के इतिहास में  

‘गांधी’ जो नाव डुबोए…

कहावत है कि राजनीति में कुछ भी पुराना नहीं होता है. भारतीय राजनीति में तो नारे, जुमले, भाषण आदि में से कुछ भी पुराना नहीं हो रहा है. गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसी बातों पर साठ-सत्तर के दशक में जैसे नारे और भाषण दिए जाते थे वैसे आज भी दिए जा  

‘23 साल का वह क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी फिट नहीं हो सकती’

भगत सिंह पर दावेदारी कोई नई बात नहीं है. यह काफी समय से जारी है. खास तौर पर जब से भगत सिंह की जन्म शताब्दी आई. जन्म शताब्दी वर्ष यानी 2007 में, पूरे वर्ष भगत सिंह के सिर पर पगड़ी पहनाने का प्रयास हुआ. पहले कभी-कभार हुआ करता था, फिर  

सतलुज-यमुना लिंक नहर सींच रही राजनीति की फसल

पंजाब विधानसभा चुनावों में साल भर से भी कम का समय रह गया है. राज्य भर में फैली सत्ता विरोधी लहर और सरकार के प्रति गुस्से के बीच से निकलने के लिए सतलुज-यमुना लिंक कैनाल (मालिकाना हकों का स्थानांतरण) विधेयक, 2016 को पारित करना सरकार के लिए जनता के खोए  

पंजाब में उम्मीदों भरी ‘आप’

पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं. इसमें सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा गठबंधन के साथ मुख्य विपक्षी कांग्रेस और लोकसभा चुनावों में अपने सफल प्रदर्शन से सबको आश्चर्यचकित कर देने वाली आम आदमी पार्टी (आप) भी शामिल हैं. हालांकि पिछले विधानसभा चुनावों से इस बार  

‘संत की समाधि’ : आस्था या अंधविश्वास

‘केवल महाराज जी (आशुतोष महाराज) ही सच्चे गुरु हैं जो ‘ब्रह्मज्ञान’ दे सकते हैं. मीडिया वालों ने उनके बारे में काफी उल्टी-सीधी बातें फैला दी हैं. मीडिया वाले समाधि का अर्थ नहीं समझते. हम बार-बार कह रहे हैं कि महाराज जी समाधि में हैं और वे वापस आएंगे.’ ये बयान  

आजादी तो मिल गई है पर हमें पता नहीं कि उसका करना क्या है?

लगभग बीस साल पहले की बात है. कलकत्ता के ‘फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ की ओर से ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय और हमें यानी उनके साथियों को सम्मान दिया जा रहा था. ये एक साधारण पर रुचिकर समारोह था. बहुत अच्छे भाषण हुए, पर श्रोता बड़ी उत्सुकता के