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समान नागरिक संहिता : एक देश एक कानून

हाल ही में केंद्र सरकार ने विधि आयोग को पत्र लिखकर समान नागरिक संहिता (यूनीफाॅर्म/कॉमन सिविल कोड) यानी सभी के लिए एक जैसे कानून पर सुझाव मांगा है. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा था. इसके  

सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास  

चंपारण सत्याग्रह के 100 साल

न जाने कितनी बार चंपारण जाना हुआ है. दोनों चंपारण. यानी पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण. हमेशा से आकर्षित करता रहा है चंपारण. संघर्ष और सृजन, दोनों एक साथ करने की जो अद्भुत क्षमता है चंपारण में, वही आकर्षण का कारण है. पहली बार फूलकली देवी का काम सुनकर यहां  

‘किसानों की तीन लाख आत्महत्याओं पर कभी कोई बात ही नहीं होती’

मुझे लगता है कि सरकार कृषि के बारे में शायद भूल ही गई है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के पहले सरकारें किसानों की बात करती हैं और सत्ता में आने के बाद सिर्फ कॉरपोरेट की बात करती हैं. बहुत उम्मीद थी मुझे कि सरकार किसानों की तरफ ध्यान  

‘गांधी’ जो नाव डुबोए…

कहावत है कि राजनीति में कुछ भी पुराना नहीं होता है. भारतीय राजनीति में तो नारे, जुमले, भाषण आदि में से कुछ भी पुराना नहीं हो रहा है. गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसी बातों पर साठ-सत्तर के दशक में जैसे नारे और भाषण दिए जाते थे वैसे आज भी दिए जा  

‘नक्सलवाद की लड़ाई खत्म हुई तो पैसे आने बंद हो जाएंगे, फिर नेता का जेब कैसे भरेगा?’

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म करने की लड़ाई की पहली कीमत जनता चुका रही है. नक्सलियों के साथ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लंबे संघर्ष के बीच जनता का भी अपना संघर्ष है, जिसे सबसे कम महत्व मिलता है. जो लोग इसे कहने की कोशिश करते हैं, उन पर न सिर्फ