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प्रकाशन की मंडी में जिसके पास कलम है, लेकिन पैसा नहीं, वह नहीं छपेगा : नीलोत्पल मृणाल

डार्क हॉर्स आपकी पहली किताब है. पुरस्कार की दौड़ में तमाम किताबें रही होंगी, लेकिन साहित्य अकादेमी पुरस्कार आपको मिला. इस बारे में क्या कहेंगे? निश्चित रूप से यह किसी नए लेखक के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. पहली किताब वाले सवाल पर तो कहूंगा कि किसी भी रचनाकार को उसकी  

मुद्राराक्षस : एक योद्धा लेखक का चले जाना…

प्रख्यात नाटककार, कथाकार, जाने-माने संस्कृतिकर्मी और चिंतक मुद्राराक्षस का बीते 13 जून को लखनऊ में देहावसान आज के इस आक्रांता समय में हिंदी समाज के एक बुलंद प्रतिरोधी स्वर का मौन हो जाना है. दरअसल मुद्राराक्षस मात्र एक लेखक न होकर एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे जो हाशिये के समाज  

सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास  

‘अगर लिंग परीक्षण पर सजा का प्रावधान है तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं?’

आपका  ‘थर्ड जेंडर’  यानी किन्नरों की जिंदगी पर आधारित  उपन्यास  ‘नालासोपारा पो. बॉक्स नं. 203’  हाल ही में प्रकाशित हुआ है. किन्नरों की जिंदगी पर उपन्यास लिखने का विचार कहां से आया? इस उपन्यास में खास क्या है? इस उपन्यास में मैंने आजाद भारत में किन्नरों की स्थिति पर प्रकाश  

‘शब्दों में लिंग निर्धारण और उसे याद करने में भारत की जितनी ऊर्जा लग रही है, उतने में रॉकेट बनाया जा सकता है’

आप निरंतर भाषा पर काम करते रहते हैं. कई भाषाओें पर काम करने के अलावा आपने तमाम भाषाओं के शब्दकोश भी तैयार किए हैं. इन दिनों क्या नया कर रहे हैं? भाषा पर निरंतर काम करते रहने से ही जड़ता दूर होगी. भाषा विज्ञान के सामने चुनौतियों का जो पहाड़  

हिंदी साहित्य में स्वेतलाना एलेक्सीविच की जरूरत

इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बेलारूस की खोजी पत्रकार और नॉन फिक्शन (गैर काल्पनिक) लेखिका स्वेतलाना एलेक्सीविच की सबसे चर्चित किताब ‘वॉयसेज फ्रॉम चर्नोबिल’ के बारे में पढ़ते हुए मेरा ध्यान सबसे पहले भोपाल गैस त्रासदी के साहित्यिक दस्तावेजीकरण की तरफ गया. यह किताब वर्ष 1986 में  

‘स्त्री की आकांक्षा भी बेहतर दुनिया की आकांक्षा है’

अल्पना मिश्र उन लेखिकाओं में हैं जिनकी कहानियों की महिला पात्र अपने ही अस्तित्व के लिए जूझ रही है. हाशिए की उस स्त्री के सरोकार सामने लाने वाली अल्पना मिश्र से पूजा सिंह की बातचीत  

‘हिंदी साहित्य आलोचकों के लिए रचा जा रहा है’

लंदन में रहने वाले चर्चित कथाकार तेजेंद्र शर्मा हाल ही में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के हाथों केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का हिंदी सम्मान ग्रहण करने भारत आए थे. पूजा सिंह की उनसे बातचीत के अंश  

कुछ समाज ने मारा, बाकी संरक्षण ने

देश के नारी निकेतनों में रखी गईं निरपराध किशोरियों के यहां आने की कहानी जितनी त्रासद है उतनी ही यहां रहने की भी  

‘महाभारत से बेहतर संभवत: दुनिया में कुछ नहीं लिखा गया’

युवा कविता के क्षेत्र में देश का सबसे प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार इस वर्ष भोपाल के युवा कवि आस्तीक वाजपेयी को देने की घोषणा की गई है. उन्हें यह पुरस्कार उनकी कविता ‘विध्वंस की शताब्दी’ के लिए दिया जा रहा है. पूजा सिंह की उनसे बातचीत