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बीमारी की तरह फैल रहा है सोशल मीडिया का दुरुपयोग : ओम थानवी

जब नई तकनीकें आती हैं, तो वे अपने साथ वरदान भी लेकर आती हैं और अभिशाप भी. आपको उसके फायदे नजर आते हैं और नुकसान भी. यहां तक कि लोकतंत्र के भी अपने फायदे और नुकसान हैं और तानाशाही के भी अपने फायदे-नुकसान हैं. ये होता है कि तानाशाही में  

सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास  

चंपारण सत्याग्रह के 100 साल

न जाने कितनी बार चंपारण जाना हुआ है. दोनों चंपारण. यानी पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण. हमेशा से आकर्षित करता रहा है चंपारण. संघर्ष और सृजन, दोनों एक साथ करने की जो अद्भुत क्षमता है चंपारण में, वही आकर्षण का कारण है. पहली बार फूलकली देवी का काम सुनकर यहां  

बस्तर में दोधारी तलवार पर चलते हैं पत्रकार

सोमारू नाग और संतोष यादव की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग करते हुए पत्रकार आंदोलन कर रहे हैं. इसके जरिये राज्यभर के पत्रकारों को कथित पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ एकजुट होने की अपील की जा रही है. पिछले दिनों राजस्थान पत्रिका समूह के  

पंचायत पर पांचवीं पास का पेंच

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता तय किए जाने को सही ठहराते हुए कहा कि शिक्षा ही वह जरिया है जो मनुष्य को सही-गलत और अच्छे-बुरे का फर्क समझने की ताकत प्रदान करता है. शीर्ष अदालत के इस फैसले से अब हरियाणा में  

‘99 फीसदी लोगों को मालूम ही नहीं कि संविधान किस चिड़िया का नाम है’

देश के संविधान ने नागरिकों से जो वादे किए थे, जो लक्ष्य रखे थे, उनमें से बहुत सारे पूरे हुए हैं, बहुत कुछ नहीं पूरे हुए. यह बड़ा सवाल है कि उनका विश्लेषण करके देखा जाए कि क्या पूरा हुआ है और क्या नहीं. मोटी सी बात है कि एक  

इस राजनीति को हिंसा से परहेज नहीं

देश की राजधानी दिल्ली से लगे हुए दादरी के एक गांव में जिस तरह उन्मादी भीड़ ने एक मुस्लिम परिवार के घर में घुसकर मुखिया की हत्या कर दी और फिर उसके बाद उसी उन्माद को और आगे बढ़ाने की जो हरकतें राजनेताओं की फौज ने कीं, वह देश भर  

हिंदू तालिबान बनाने की तैयारी

हाल के दिनों में जिस तरह की घटनाएं लगातार देखने में आ रही हैं, उससे जाहिर है कि मुसलमानों को लोकतंत्र से बाहर किया जा रहा है. उनको यह बताया जा रहा है कि उन्हें सबके बराबर अधिकार नहीं है. उनके मन में भय पैदा किया जा रहा है कि  

रोजे बिना इफ्तार कैसा!

धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र से जुड़ा एक आधुनिक विचार है जिसे भारतीय नेताओं ने अवसरवाद की ट्रिक में बदल दिया है. धार्मिक अवसरों पर राजनीति करने वाले ये चेहरे आजकल जालीदार टोपी में नजर आ रहे हैं  

‘लोकतंत्र के लिए इस्लाम में पूरा स्थान है’

अतिवाद के दो मतलब होते हैं. मेरे हिसाब से इनमें से एक मतलब सही होता है और दूसरा मतलब गलत होता है. इस्लामिक अतिवाद का एक मतलब है धर्म की बुनियादी बातों के साथ टिके रहना या वफादार बने रहना. मौजूदा वक्त मजहबी आजादी का है. अगर कोई इंसान यह