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सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास  

टाइटेनिक की राह पर समाचार चैनल

देश में धड़ाधड़ समाचार चैनल बंद हो रहे हैं, हजारों की संख्या में टेलीविजन प्रोफेशनल बेरोजगार हैं. वॉयस ऑफ इंडिया नाम के टाइटेनिक के डूबने से शुरू हुआ यह सिलसिला बदस्तूर कायम है। सीएनईबी, पी 7, भास्कर न्यूज ,जिया न्यूज और फॉर रियल न्यूज जैसे न जाने कितने नाम हैं  

‘एक आदमी जिससे मैं सिर्फ दो बार मिली और अब इस मोड़ पर खड़ी हूं’

आप पाकिस्तान पर एक किताब लिख रही हैं. यह साधारण पाकिस्तानी लोगों की कहानी है, जो समाज में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं. यह विचार दिमाग में कैसे आया? दरअसल, यह विचार मेरे प्रकाशक की ओर से आया. भारत के बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी के साथ मलाला  

समझ बूझ बन चरना, हिरना

व्यापारिक प्रयोजनों और तटस्थता के बीच संतुलन साधने की कोशिश करते भारतीय मीडिया को सत्ता येन-केन प्रकारेण अपनी ओर झुकाने की कोशिश करती ही रहती है  

असहमति का अधिकार

अपने संस्थानों की नीति से पत्रकारों की असहमतियां सार्वजनिक क्यों न हों?  

गाजा संकट से उपजे सवाल

वैश्विक खबरों की कवरेज के मामले में देसी मीडिया का बौनापन साफ दिखता है  

मीडिया में लड़कियां

तरह-तरह के उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाइयां अकेले नहीं लड़ी जा सकतीं. इन लड़ाइयों को एक सांगठनिक शक्ल देने की जरूरत है.  

‘मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को सिसकते हुए बरतन मांजते देखा’

संदीप कुमार लेखक मीडिया से जुड़े हैं और दिल्ली में रहते हैं  

पत्रकारिता का ‘जनपक्ष-विपक्ष’

कोई पत्रकार किसी नेता-पार्टी से ‘नत्थी’ दिखे तो इसे फिसलन की शुरुआत क्यों न कहें?  

‘दस हजार में टाइपिस्ट तक नहीं मिलेगा’

दिल्ली में सऊदी अरब के दूतावास में स्थायी हिंदी अनुवादक की जरूरत थी. मेरे पास कॉल आई. उस वक्त जिंदगी बुरी तरह से बेपटरी थी. जेब में गिनती के पैसे थे, करने को काम नहीं और रहने को घर नहीं वाली नौबत थी. मैं किसी चमत्कार के इंतजार में था.