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सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा? यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास  

‘नामवर सिंह सुविधानुसार आलोचना कर्म करते हैं’

वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति उन विरले कथाकारों में हैं जिनकी रचनाओं में देश के ग्राम्य जीवन की महक महसूस की जा सकती है.  

‘हिंदी में या तो अश्लीलता बिक रही है या सनसनी’

हिंदी आलोचना की कठिन डगर पर महिलाओं के पदचिह्न कम ही मिलते हैं. निर्मला जैन को उनकी बेबाक आलोचनाओं के लिए जाना जाता है. पेश है निर्मला जैन से बातचीत के संपादित अंश.